ओशो : आसक्ति और प्रेम ‌

आसक्ति और प्रेम ‌

आखिर घृणा क्यों है ? जब तुम्हें घृणा पकड़े है तो उसके कारण की खोज करो। केवल तभी प्रेम का फूल खिल सकता है। तुम्हें घृणा कब महसूस होती है? जब तुम समझते हो कि तुम्हारा अस्तित्व, तुम्हारा जीवन खतरे में है, जब तुम्हें लगता है कि तुम्हारा अस्तित्व मिट सकता है, तो तुम अचानक घृणा से भर जाते हो। जब तुम्हें लगता है कि तुम्हें मिटाया जा सकता है तो तुम दूसरों को मिटाने में लग जाते हो। वह सुरक्षा का इंतजाम है, तुम्हारा ही एक अंश तब जीवित रहने के लिए संघर्ष करने लगता है। जब भी तुम्हें लगता है कि मेरा अस्तित्व खतरे में है, तुम घृणा से भर जाते हो।

इसलिए जब तक तुम्हें यह न लगे कि मेरा अस्तित्व खतरे में नहीं है, कि मुझे मिटाना असंभव है, तब तक तुम्हारे प्राण प्रेम से नहीं भर सकते। जीसस प्रेम कर सकते हैं, क्योंकि वे उसे जानते हैं जो चिन्मय है। तुम प्रेम नहीं कर सकते, क्योंकि तुम उसे ही जानते हो जो मृण्मय है। प्रत्येक क्षण तुम्हारे लिए मृत्यु है। प्रत्येक क्षण तुम भयभीत हो। और जो भयभीत है वह प्रेम कैसे कर सकता है? प्रेम और भय साथ—साथ नहीं चल सकते। और तुम भयभीत हो! इसलिए तुम केवल प्रेम करने का भ्रम पैदा कर सकते हो।

और फिर तुम्हारा प्रेम सुरक्षा—व्यवस्था के सिवाय और कुछ नहीं है। तुम भय से बचने के लिए प्रेम करते हो। जब तुम मानते हो कि तुम प्रेम में हो तो तुम्हारा भय कम हो जाता है। क्षणभर के लिए तुम मृत्यु को भूल सकते हो। एक भ्रम निर्मित होता है जिसमें तुम्हें लगता है कि मुझे अस्तित्व ने स्वीकार कर लिया है, मैं अस्वीकृत नहीं हूं उपेक्षित नहीं हूं।

यही कारण है कि प्रेम की और प्रेम पाने की इतनी आकांक्षा है। जब भी तुम्हें कोई प्रेम करता है तो तुम्हें यह भ्रम होता है कि अस्तित्व को मेरी जरूरत है—कम से कम किसी को तो मेरी जरूरत है। तुम सोचते हो कि मैं व्यर्थ नहीं हूं क्योंकि किसी के लिए तो मैं जरूरी हूं। तुम सोचते हो कि मैं आकस्मिक नहीं हूं क्योंकि कहीं न कहीं मैं पूछा जाता हूं। तुम्हें लगता है कि मेरे बिना अस्तित्व में कुछ कमी रह जाएगी। और इससे तुम्हें अच्छा लगता है; तुम्हें लगता है कि मेरा भी प्रयोजन है, मेरी भी नियति है, अर्थवत्ता है और पात्रता है।

और जब तुम्हें कोई प्रेम नहीं करता है तो तुम अस्वीकृत हो जाते हो और उपेक्षित अनुभव करते हो। तब तुम्हें लगता है कि मैं व्यर्थ हूं मेरा कोई प्रयोजन नहीं है, मेरी कोई अर्थवत्ता नहीं है। अगर कोई तुम्हें प्रेम न करे और तुम मर जाओ तो तुम्हारी अनुपस्थिति का एहसास नहीं होगा, किसी को भी एहसास नहीं होगा कि तुम कभी थे और तुम अब नहीं हो।

प्रेम तुम्हें यह भाव देता है कि मेरी भी जरूरत है। इसी से प्रेम में भय कम हो जाता है। और जब प्रेम नहीं रहता तो तुम ज्यादा भयभीत हो जाते हो और भय में सुरक्षा के लिए तुम घृणा करने लगते हो। घृणा सुरक्षा है। खुद ध्वंस से बचने के लिए तुम ध्वंसात्मक हो जाते हो। प्रेम में तुम्हें लगता है कि मैं स्वीकृत हूं कि मेरा स्वागत है, कि मैं बिनबुलाया मेहमान नहीं हूं कि लोग मेरी प्रतीक्षा में थे, और यह कि अस्तित्व मुझे पाकर प्रसन्न है। तुम्हारा प्रेमी समूचे अस्तित्व का प्रतिनिधि बन जाता है।

लेकिन प्रेम बुनियादी रूप से भय पर खड़ा है। तुम प्रेम के द्वारा भय और मृत्यु से अपना बचाव कर रहे हो, तुम अपने प्रति अस्तित्व की अमानवीय उपेक्षा से अपना बचाव कर रहे हो। सच तो यह है कि अस्तित्व तुम्हारे प्रति उदासीन है; कम से कम ऊपरी तौर पर तो यही दिखाई देता है। सूरज, सागर, ग्रह, नक्षत्र, पृथ्वी, सभी तुम्हारे प्रति उदासीन लगते हैं; कोई भी तो तुम्हारी फिक्र करता नहीं मालूम पड़ता है। देखने में तो यह स्पष्ट है कि तुम जरूरी नहीं हो। तुम्हारे बिना सब कुछ वैसा ही रहेगा जैसा तुम्हारे होने पर है; कुछ भी कम नहीं होगा।

यदि अस्तित्व को ऊपर—ऊपर देखो तो तुम्हें लगेगा कि किसी को भी मेरी चिंता नहीं है। अस्तित्व को शायद तुम्हारा पता भी न हो। चांद—सितारों को तुम्हारा पता नहीं है; इस धरती को भी तुम्हारा पता नहीं है जिसे तुम मां कहकर पुकारते हो। जब तुम मर जाओगे तो धरती दुखी न होगी, कहीं कोई बदलाहट न होगी; सब कुछ वैसा ही रहेगा जैसा है और सदा रहा है। तुम रहो न रहो, कोई फर्क नहीं पड़ता है। इससे तुम्हें लगता है कि मैं महज आकस्मिक हूं मैं जरूरी नहीं हूं। तुम्हें लगता है कि मैं अनामंत्रित आ गया हूं—मात्र संयोगवश।

इससे भय पैदा होता है। और इसको ही कीर्कगार्ड ने संताप कहा है। एक सूक्ष्म भय निरंतर बना रहता है।

जब कोई तुम्हें प्रेम करता है तो तुम्हें लगता है कि मैं जरूरी हूं। तब तुम्हें लगता है कि मेरे जीवन में नए आयाम का उदय हुआ है। अब कम से कम एक मनुष्य तो होगा जो मेरे लिए रोएगा, जो मेरे लिए दुखी होगा, जो मेरे लिए आंसू बहाएगा। तब तुम्हें लगेगा कि मेरी भी जरूरत है। तब कम से कम एक आदमी तो होगा जिसे तुम्हारे न रहने पर सतत तुम्हारी कमी महसूस होगी। कम से कम एक व्यक्ति के लिए तुम्हारे जीवन का अर्थ होगा, सार्थकता होगी।

यही कारण है कि प्रेम की इतनी ज्यादा मांग है। और यदि तुम्हें प्रेम नहीं मिलता है तो तुम उखड़े—उखड़े मालूम पड़ते हो।

लेकिन यह वह प्रेम नहीं है जिसकी मैं चर्चा कर रहा हूं। यह तो एक संबंध है, जिसमें हम परस्पर एक—दूसरे के लिए यह भ्रम निर्मित करते हैं कि मेरे लिए तुम जरूरी हो और तुम्हारे लिए मैं जरूरी हूं।

इस प्रेम में मैं तुम्हें यह भ्रम देता हूं कि तुम्हारे बिना मेरा प्रयोजन, मेरी अर्थवत्‍ता, मेरा जीवन, सब कुछ खो जायेगा। और वैसे ही तुम मुझे यह भ्रम देते हो कि मेरे बिना तुम्हारा सब कुछ खो जाएगा। इस तरह हम एक—दूसरे को भ्रम में पड़े रहने में सहायता करते हैं। हम एक पृथक, निजी दुनिया बना लेते हैं, जिसमें हम फिर से अर्थपूर्ण हो जाते हैं, जिसमें इस विराट जगत की समस्त उदासीनता भूल जाती है।

दो प्रेमी एक निजी जगत बनाकर एक—दूसरे के सहारे जीते हैं। उन्होंने अपनी एक अलग निजी, व्यक्तिगत दुनिया बना ली है। इसलिए प्रेम में एकांत की बहुत जरूरत है। अगर यह एकांत न रहे तो दुनिया तुम पर हावी होने लगती है और कहने लगती है कि तुम्हारा प्रेम महज स्‍वप्‍न है, वहम है, एक पारस्परिक भ्रम है। प्रेम को एकांत चाहिए; क्योंकि एकांत में संसार भूल जाता है। एकांत में सिर्फ दो प्रेमी होते हैं और जगत की उदासीनता, सारी उदासीनता भुला दी जाती है। वहां तुम्हें प्रेम मिलता है, स्वागत मिलता है। वहां तुम्हारे बिना बहुत कुछ सूना हो जाएगा। कम से कम इस निजी दुनिया में तुम्हारे बिना सब कुछ उजाड़ हो जाएगा। तो जीवन अर्थपूर्ण हो जाता है।

मैं इस प्रेम की चर्चा नहीं कर रहा हूं। यह सचमुच भ्रामक है, और यह भ्रम अभ्यासजन्य है। और आदमी इतना कमजोर है कि वह इस भ्रम के बिना जिंदा नहीं रह सकता। कोई विरला ही, कोई बुद्ध ही इस भ्रम के बिना रह सकता है। और उसे यह भ्रम निर्मित करने की जरूरत नहीं है।

और जब किसी का भ्रम—मुक्त होकर जीना संभव होता है तभी प्रेम का दूसरा आयाम पैदा होता है। तब ऐसा नहीं है कि किसी एक व्यक्ति को तुम्हारी जरूरत है। इस प्रेम में यह बोध होता है कि तुम इस उदासीन नजर आने वाले अस्तित्व से भिन्न नहीं हो, कि तुम उसके अंश हो, कि तुम उसके साथ जैविक रूप से जुड़े हो। और फिर जब किसी वृक्ष में फूल लगते हैं तो वह फूलों वाला वृक्ष तुम से भिन्न नहीं है, तुम वृक्ष में फूल बनकर खिले हो और वृक्ष तुम में सचेतन हुआ है। सागर, रेत और सितारे सब तुम्हारे साथ एक हैं। तुम कोई अलग— थलग द्वीप नहीं हो। तुम ब्रह्मांड के साथ जैविक रूप से एक हो। समस्त ब्रह्मांड तुम्हारे भीतर है और तुम समस्त ब्रह्मांड में हो। जब तक तुम इस बात को नहीं जानते, नहीं अनुभव करते, तब तक उस प्रेम को नहीं अनुभव कर सकते हो, जो एक चित्त की अवस्था है।

और जब तुम यह समझ लेते हो, तब तुम्हें यह निजी भ्रम निर्मित करने की जरूरत नहीं रहती कि कोई व्यक्ति मुझे प्रेम करता है। और तब जीवन में अर्थ है। और यदि कोई व्यक्ति तुम्हें प्रेम नहीं करता है तो उससे इस अर्थ में कोई कमी नहीं पड़ती है। तब तुम जरा भी भयभीत नहीं होगे; क्योंकि मृत्यु भी तुम्हें नहीं मिटा सकेगी। मृत्यु तुम्हारे आकार को, शरीर को मिटा सकती है; लेकिन वह तुम्हें नहीं मिटा सकती। क्योंकि तुम अस्तित्व ही हो।

ध्यान से यही घटित होता है। ध्यान का अर्थ ही यही है। इस प्रेम में तुम अंश बन जाते हो, द्वार बन जाते हो; तुम जानते हो कि अस्तित्व और मैं एक हैं। तब तुम्हारा सर्वत्र स्वागत है। तब भय नहीं रह जाता है। तब मृत्यु नहीं बचती है। तब प्रेम तुमसे प्रवाहित होता है। और तब प्रेम प्रयत्न नहीं है। तब तुम प्रेम करने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकते; तब प्रेम श्वास जैसा हो जाता है। तुम अपने भीतर और बाहर प्रेम की ही श्वास लेते हो।

यही प्रेम बढ़कर भक्ति हो जाता है। और अंत में तुम इसे भूल जाओगे, जैसे तुम अपनी श्वास को भूल जाते हो। क्या तुम ने देखा है कि श्वास तुम्हें याद कब आती है? यह याद तब आती है जब श्वास लेने में कोई कठिनाई अनुभव होती है। श्वास. की तकलीफ में ही तुम जानते हो कि मैं श्‍वास लेता हूं। अन्‍यथा जानने की कोई जरूरत नहीं रहती। और अगर तुम्हें अपनी श्वास पता चलती है तो उसका मतलब है कि तुम्हारी श्वास—क्रिया में कुछ गड़बड़ है। अन्यथा श्वास—क्रिया के पता चलने की जरूरत नहीं है; वह अपने आप ही चुपचाप चलती रहती है।

वैसे ही अगर तुम्हें अपने प्रेम का बोध है—उस प्रेम का जिसे हम चित्त की अवस्था कहते है—तो समझना चाहिए कि प्रेम में कोई भूल है। धीरे— धीरे यह बोध चला जाता है और तुम भीतर—बाहर प्रेम की श्वास लेते रहते हो। तुम्हें सब कुछ भूल गया है; यह भी भूल गया है कि तुम प्रेम करते हो। तब यह प्रेम भक्ति बन गया। वह आत्यंतिक शिखर है, परम संभावना है, या जो भी नाम तुम इसे देना चाहो।

जब प्रेम का बोध भी चला जाता है तब भक्ति का उदय होता है। इसका यह मतलब नहीं है कि तुम बेहोश हो गए हो। इसका इतना ही अर्थ है कि प्रक्रिया इतनी मौन हो गई है कि उसके इर्द—गिर्द कोई शोरगुल नहीं है। तुम इसके प्रति बेहोश नहीं हो और इसके प्रति तुम होशपूर्ण भी नहीं हो। प्रेम इतना स्वाभाविक हो गया है कि यह है; लेकिन कोई हलचल पैदा नहीं करता है। यह सहज और लयबद्ध हो गया है।

तो स्मरण रहे कि जब मैं प्रेम की चर्चा करता हूं तो वह तुम्हारे प्रेम की चर्चा नहीं है। लेकिन अगर तुम अपने प्रेम को समझने की कोशिश करो तो वह किसी भिन्न कोटि के प्रेम के विकास में सहयोगी होगा। इसलिए मैं तुम्हारे प्रेम के विरोध में नहीं हूं। मैं सिर्फ इस तथ्य को प्रकट कर रहा हूं कि अगर तुम्हारा प्रेम भय पर खड़ा है तो वह सामान्य पाशविक प्रेम से भिन्न नहीं है। इसमें कोई निंदा या आलोचना की बात नहीं है; यह एक तथ्य भर है।

मनुष्य भयभीत है। उसे किसी की जरूरत है जो उसे यह आश्वासन दे दे कि कोई उसे भी चाहता है, उसे डरने की जरूरत नहीं है। एक प्रेमी उसे आश्वस्त करता है कि कम से कम एक व्यक्ति के साथ तुम्हें भयभीत होने की जरूरत नहीं है। अपनी जगह यह अच्छी बात है, लेकिन यह वही नहीं है जिसे बुद्ध या जीसस प्रेम कहते हैं। वे प्रेम को चित्त की अवस्था कहते हैं, संबंध नहीं। इसलिए संबंध के ऊपर उठो और धीरे—धीरे प्रेमपूर्ण होओ।

यह प्रेम तब तक संभव नहीं है जब तक तुम ध्यान में नहीं उतरते। जब तक तुम अपने भीतर के अमृत को नहीं जान लेते हो, जब तक तुम भीतर और बाहर के बीच की गहरी एकता को नहीं जानते, जब तक तुम यह नहीं जानते कि मैं अस्तित्व हूं तब तक यह प्रेम कठिन होगा। ध्यान की ये विधियां तुम्हें संबंध से चित्त की अवस्था की ओर गति करने में सहयोगी होंगी। और समय की फिक्र मत करो; प्रेम में समय बिलकुल अप्रासंगिक है।

ओशो
तंत्र सूत्र भाग २
प्रवचन २० शरीर और तंत्र
आसक्ति और प्रेम


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