ओशो : आदमी कैसा मूढ़ है! तुम परमात्मा को चाहते हो तो आदमी की मूढ़ता से बचना। और आदमी की मूढ़ता बड़ी शास्त्रों से आवेष्ठित है। बड़ी पांडित्यपूर्ण है। इसलिए तुम पहचान भी न पाओगे।

मैं कलकत्ते में एक घर में मेहमान होता था। पड़ोस में एक पुर्तगीज चर्च था। बड़ा सुंदर चर्च था। पर जिस घर में मैं ठहरता वह जैन घर था। मैं सुबह उठकर चर्च के बगीचे में चला जाता। एक दिन घर के मेजबान को पता चला। वे आए और बड़े नाराज हुए और कहा कि आपको पता नहीं, यह चर्च है। अगर आपको मंदिर ही जाना है, तो मुझसे कहिए। मैं जैन मंदिर ले चलूं।

मैं उनसे कुछ बोला न। नासमझों से बहुत बार न बोलना ही समझदारी है। चला आया चुपचाप उनके घर। उन्हें बड़ा जघन्य अपराध मालूम पड़ा, कि मैं और चर्च गया। और न केवल गया, वहां शांति से बैठा था।

फिर कुछ वर्ष बाद संयोग की बात, उनके घर फिर मेहमान हुआ। और उन्होंने कहा कि आपको एक खुश-खबरी सुनाएं। वह पुर्तगीज चर्च बिक गया और हम लोगों ने खरीद लिया पुर्तगीज लोग छोड़कर चले गए। वह चर्च बिक गया और हमने खरीद लिया। अब तो जैन मंदिर हो गया। आइए, आपको दिखाऊ। वही चर्च! अब वह जैन मंदिर है। तख्ती बदल गई।

वृक्ष वही है। परमात्मा अब भी वही है कहै कबीर हरि ऐसा। लेकिन उनका परमात्मा बदल गया। वृक्ष वही है। फूल अब भी वहां वैसे खिलते हैं। अब वे कुछ ज्यादा रंग रौनक से नहीं खिलते क्योंकि यह जैनियों का मंदिर हो गया। पहले कोई ज्यादा रंग-रौनक से नहीं खिलते थे। क्योंकि यह ईसाइयों का चर्च था।

फूलों को पता ही नहीं है, कि आदमियों की कैसी मूर्खताएं हैं। फूलों को, वृक्षों को, पता ही नहीं चला होगा कि तख्ती बदल गई। तख्ती भर बदली और कुछ न बदला। तख्तियां में परमात्मा नहीं है। वे आदमियों की हैं। तुम्हारे लेबलों में परमात्मा नहीं है; वे तुम्हारे हैं।

अब वे बड़े प्रसन्नता से मुझे ले गए। सब कुछ वही है। दीवालें वही हैं। संगमरमर वही है। पर मैंने उनसे कुछ कहा न। नासमझों से न कहना ही कुछ समझदारी है। वे बड़े प्रसन्न हैं। अब मंदिर है।

आदमी कैसा मूढ़ है! तुम परमात्मा को चाहते हो तो आदमी की मूढ़ता से बचना। और आदमी की मूढ़ता बड़ी शास्त्रों से आवेष्ठित है। बड़ी पांडित्यपूर्ण है। इसलिए तुम पहचान भी न पाओगे।


ओशो

कहे कबीर दीवाना
प्रवचन-9

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