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Showing posts from June, 2020

ओशो : "इसलिए संत बिना इधर-उधर भागे ही जानते हैं, बिना देखे ही समझते हैं, और बिना कर्म किए सब कुछ संपन्न करते हैं।"

"इसलिए संत बिना इधर-उधर भागे ही जानते हैं, बिना देखे ही समझते हैं, और बिना कर्म किए सब कुछ संपन्न करते हैं।" बिना देखे ही समझते हैं! जो भी देखा जा सकता है वह पराया होगा, वह बाहर होगा। आत्मा को देखा नहीं जा सकता। यद्यपि हमारे पास शब्द हैं: आत्म-दर्शन, आत्म-साक्षात्कार, आत्म-ज्ञान। ये सभी शब्द गलत हैं। क्योंकि इन शब्दों से भ्रांति हो सकती है। मैं आपको तो देख सकता हूं, क्योंकि आप मुझसे अलग हैं, मैं स्वयं को कैसे देखूंगा? कौन देखेगा और किसको देखेगा? वहां एक ही है, देखने के लिए दो की जरूरत है। अगर मैं स्वयं को देखूं तो जिसको मैं देखूंगा वह मैं नहीं हूं; जो देख रहा है वह मैं हूं। मैं सदा ही देखने वाला रहूंगा। मैं दृश्य नहीं बन सकता, मैं सदा द्रष्टा ही रहूंगा। इसलिए लाओत्से कहता है, "बिना देखे समझते हैं।" वहां देखने का कोई उपाय नहीं है। आप अपने को कैसे देख सकते हैं? देखने के लिए बंटना जरूरी है: कोई देखे, कोई दिखाई पड़े; कोई दृश्य हो, कोई द्रष्टा हो; कोई आब्जेक्ट, कोई सब्जेक्ट। और आप? आप सदा ही देखने वाले हैं। इसलिए आत्म-दर्शन नहीं हो सकता, आत्म-ज्ञान नहीं हो ...

ओशो: लाओत्से के अनुसार अयोग्यता गहनतम योग्यता का नाम है। वह आलस्य नहीं है, विश्राम की परम दशा है। वह तमस भी नहीं है, ऊर्जा की अत्यंत प्रज्वलित स्थिति है।

पहला प्रश्न: प्रथम दिन की चर्चा में आपने समझाया कि अयोग्यता ताओ चिंतना का कीमती शब्द है, तथा उसका बहुत आध्यात्मिक मूल्य है। इस संदर्भ में ऐसा लगता है कि तामसी व आलसी लोग तो अयोग्यता के गुण से संपन्न होते ही हैं, लेकिन फिर भी उनका आध्यात्मिक विकास होता दिखाई नहीं पड़ता। इस विषय में आपकी क्या दृष्टि है? ओशो: लाओत्से के अनुसार अयोग्यता गहनतम योग्यता का नाम है। वह आलस्य नहीं है, विश्राम की परम दशा है। वह तमस भी नहीं है, ऊर्जा की अत्यंत प्रज्वलित स्थिति है। फर्क को ठीक से समझ लें। भ्रांति स्वाभाविक है, क्योंकि जो व्यक्ति भी निष्क्रिय बैठा है, हमें लगेगा, आलसी है। सभी निष्क्रिय बैठे हुए व्यक्ति आलसी नहीं होते। जिसे हम आलसी कहते हैं, खाली तो वह भी नहीं बैठता; मन का काम जारी रहता है। शायद आलसी आदमी शरीर से कुछ न करता हो, मन से तो पूरी तरह करता है। और जहां शरीर की गति वाले लोग दौड़ रहे हैं वहां वह भी अपनी कामना और वासना से दौड़ता है। उसके मन के संबंध में कोई फर्क नहीं है। हमें आलसी दिखाई पड़ता है, क्योंकि हमारे जैसा नहीं दौड़ रहा है। लेकिन दौड़ तो वह भी रहा है। अगर आलस्य परम हो जाए, जिसको लाओत्से कह ...

ओशो : स्वर्णिम प्रकाश ध्यान

ध्यान विधि     स्वर्णिम प्रकाश ध्यान श्वास भीतर लेते हुए स्वर्णिम प्रकाश को सिर से अपने भीतर आने दो, क्योंकि वहीं पर ही स्वर्ण-पुष्प प्रतीक्षा कर रहा है। वह स्वर्णिम प्रकाश सहायक होगा। वह तुम्हारे पूरे शरीर को स्वच्छ कर देगा और उसे सृजनात्मकता से पूरी तरह भर देगा। यह पुरुष ऊर्जा है... इसे दिन में कम से कम दो बार करो-सबसे अच्छा समय सुबह-सुबह का है, ठीक तुम्हारे बिस्तर से उठने से पहले। जिस क्षण तुम्हें लगे कि तुम जाग गए, इसे कम से कम बीस मिनट के लिए करो। सुबह सबसे पहला यही काम करो!-बिस्तर से मत उठो। वहीं, उसी समय, तत्क्षण इस विधि को करो, क्योंकि जब तुम नींद से जग रहे होते हो तब बहुत नाजुक और संवेदनशील होते हो। जब तुम नींद से बाहर आ रहे होते हो तब बहुत ताजे होते हो और इस विधि का प्रभाव बहुत गहरा जाएगा। जिस समय तुम नींद से बाहर आ रहे होते हो तो उस समय सदा की अपेक्षा तुम बुद्धि में कम होते हो। तो कुछ अंतराल हैं जिनके माध्यम से यह विधि तुम्हारे अंतर्तम सत्व में प्रवेश कर जाएगी। और सुबह-सुबह, जब तुम जाग रहे होते हो और पूरी पृथ्वी जाग रही होती है, उस समय पूरे विश्व में जाग रही ऊर्...

ओशो : मन

मन हम जो भी करते हैं, वह मन का पोषण है। मन को हम बढ़ाते हैं, मजबूत करते हैं। हमारे अनुभव, हमारा ज्ञान, हमारा संग्रह, सब हमारे मन को मजबूत और शक्तिशाली करने के लिए है। बूढ़ा देखें, बूढ़ा आदमी कहता है, मुझे सत्तर साल का अनुभव है। मतलब ?  उनके पास सत्तर साल पुराना मजबूत मन है। और जैसे शराब पुरानी अच्छी होती है, लोग सोचते हैं, पुराना मन भी अच्छा होता है। वैसे शराब और मन में कुछ तादात्म्य है, एकरसता है। जैसे शराब और नशीली हो जाती है, वैसे ही मन जितना पुराना होता है, उतना नशीला हो जाता है। चेतना नहीं बदलती, चेतना तो वही बनी रहती है। मन की पर्त चारों तरफ घिर जाती है। मांग वही बनी रहती है, वासना वही बनी रहती है। शरीर सूख जाता, वासना हरी ही बनी रहती है। नहीं, अनुभव वगैरह से कुछ नहीं। जिसको संसार का अनुभव कहते हैं, वह मन का पोषण है सिर्फ। संन्यासी अ-मन की तरफ चलता। गृहस्थ मन की तरफ चलता।  सभी लोग मन लेकर पैदा होते हैं, लेकिन धन्य हैं वे, जो मन के बिना मर जाते हैं। सभी लोग मन लेकर जन्मते हैं, लेकिन अभागे हैं वे, जो मन को लेकर ही मर जाते हैं। फिर जीवन में कोई फायदा न हुआ। फिर यह यात्रा बे...

ओशो : जिंदगी लूटती है--देती कुछ भी नहीं।

जिंदगी लूटती है--देती कुछ भी नहीं। इस जिंदगी की पूरी अंधेरी रात का एक ही परिणाम है--दुख। बस एक ही संपत्ति है--आंसू! यहां कुछ आदमी पाता नहीं, कुछ गंवाता जरूर है। हम जितने खाली हाथ आते हंै संसार में, उससे कहीं ज्यादा खाली हाथ जाते हैं। हम कुछ गंवा कर जाते हैं। आते तो खाली हैं ही, लेकिन कम से कम मुट्ठी बंद होती है। बच्चा पैदा होता है, तो मुट्ठी बंद होती है। हालांकि खाली--पर कम से कम बंद होती है। और जब जाता है, तब भी खाली होती है। लेकिन तब खुली होती है। सब लुट गया। जिंदगी लूटती है--देती कुछ भी नहीं। और जिंदगी लूट लेती है इस तरकीब से कि पता भी नहीं चलता। और तुम तो इसी खयाल में रहते हो कि कमा रहे हो; तुम तो इसी भ्रम में रहते हो कि कमा लिया है। और कमाए जा रहे हो। यह अपना हो गया; वह अपना हो गया; इतनी जमीन इतनी जायदाद, इतना नाम, इतनी प्रतिष्ठा! इसी कमाने के धोखे में तुम सब गंवा देते हो। धनी से ज्यादा गरीब आदमी खोजना कठिन है। और जो बड़े पदोें पर बैठे हैं, उनसे ज्यादा रिक्त आत्माएं खोजनी कठिन हैं। भिखमंगे हैं; भ्रांति भर है कि भिखमंगे नहीं हंै। सौभाग्यशाली है वह, जिसे यह समझ में आ जाए कि जिंदगी लू...

ओशो : जहां है वहीं सुखी है, ऐसे आदमी का नाम ही संन्यासी है ।

जहां है वहीं सुखी है, ऐसे आदमी का नाम ही संन्यासी है ।      मेरे सारे ध्यान के प्रयोग मौलिक रूप से थकाने के प्रयोग हैं, ताकि इंद्रियां थककर बैठ जाएं। एक रास्ता है जबरदस्ती बिठाने का। मैं उसके पक्ष में नहीं हूं क्योंकि जबरदस्ती कोई भी इंद्रियों को बैठा नहीं सकता। हालत वैसी हो जाती है, जैसे छोटे बच्चे को कह दो कि बैठो शाति से। तो वह बैठ जाता है, लेकिन उसकी सारी ताकत शांति से बैठने में लग रही है। एक एक चीज को खींचे हुए है। तना हुआ है। शिथिल भी नहीं हो पाता। विश्राम भी नहीं कर पाता। तनावग्रस्त है।    बच्चे को कहो कि दौड़ो, एक पच्चीस चक्कर लगाओ। फिर कहने की जरूरत नहीं कि शांत बैठ जाओ। पच्चीस चक्कर के बाद वह खुद ही शांत बैठ जाएगा। वह शांति बड़ी अलग होगी। उस शाति में कोई तनाव नहीं होगा, कोई बेचैनी नहीं होगी। बल्कि शांति में एक सुख होगा, एक राहत होगी, एक झलक होगी विश्राम की। इंद्रियों को थका डालें, इतना थका डालें कि क्षणभर को भी अगर वे विश्राम में पहुंच जाएं, तो उतने क्षणभर को आपका प्रवेश भीतर हो जाए। जो बाल बुद्धि वाले बाह्य भोगों का अनुसरण करते हैं वे सर्वत्र फैले हुए म...

ओशो : एक पुरानी कथा है। एक खोजी ने विष्णु को खोजते—खोजते एक दिन पा लिया। चरण पकड़ लिए। बड़ा आह्लादित था, आनंदित था। जो चाहिए था, मिल गया था। खूब—खूब धन्यवाद दिए विष्णु को और कहा कि बस एक बात और: मुझसे कुछ थोड़ा सा काम करा लें, कुछ सेवा करा लें।

एक पुरानी कथा है।  एक खोजी ने विष्णु को खोजते—खोजते एक दिन पा लिया। चरण पकड़ लिए। बड़ा आह्लादित था, आनंदित था। जो चाहिए था, मिल गया था। खूब—खूब धन्यवाद दिए विष्णु को और कहा कि बस एक बात और: मुझसे कुछ थोड़ा सा काम करा लें, कुछ सेवा करा लें।  आपने इतना दिया, जीवन दिया, जीवन का परम उत्सव दिया और अब यह परम जीवन भी दिया। मुझसे कुछ थोड़ी सेवा करा लें! मुझे ऐसा न लगे कि मैं आपके लिए कुछ भी न कर पाया, आपने इतना किया! मुझे थोड़ा सा सौभाग्य दे दें! जानता हूं, आपको किसी की जरूरत नहीं, किसी बात की जरूरत नहीं। लेकिन मेरा मन रह जाएगा कि मैं भी प्रभु के लिए कुछ कर सका! विष्णु ने कहा: कर सकोगे? करना बहुत कठिन होगा। मगर भक्त जिद्द अड़ गया। तो कहा: ठीक है, मुझे प्यास लगी है। क्षीरसागर में तैरते हैं विष्णु, वहां कैसी प्यास! पर इस भक्त के लिए कहा कि चल ठीक, मुझे प्यास लगी है। तू जाकर एक प्याली भर पानी ले आ। भक्त भागा। तुम कहोगे क्षीरसागर था, वहीं से भर लेता। लेकिन जो पास है, वह तो किसी को दिखाई नहीं पड़ता। पास तो दिखाई ही नहीं पड़ता। पास के लिए तो हम बिलकुल अंधे हैं। हमें दूर की चीजें दिखाई पड़ती हैं। जित...

ओशो : जिंदा परमात्मा को पूजो

जिंदा परमात्मा को पूजो  तुम अगर गौर से देखोगे तो तुम परमात्मा को हर जगह गत्यात्मक पाओगे। लेकिन तुमने झूठे परमात्मा खड़े किए हैं। मंदिरों में पत्थरों की मूर्तियां बना ली हैं, वे ठहरी हैं वहीं की वहीं। उनसे तो तुम्हीं थोड़े ज्यादा परमात्मा हो। चलते तो हो;उठते-डोलते तो हो; तुम्हारे जीवन में कुछ गीत तो है--सुबह कहीं, सांझ कहीं! मंदिर का तुम्हारा भगवान तो वहीं का वहीं पड़ा है। अच्छा हो कि तुम फूलों को पूजो! लेकिन तुम उलटे आदमी हो। तुम जिंदा फूलों को तोड़कर मुर्दा परमात्माओं के चरणों में रख आते हो। इससे तो अच्छा होता कि अपने मुर्दा परमात्मा को उठा कर फूलों के चरणों में रख देते। गति को पूजो, अगति को नहीं! अगति जड़ता है। प्रवाह को पूजो, पत्थरों को नहीं! लेकिन पत्थर से तुम्हारा रास बैठ जाता है, क्योंकि तुम जड़ हो। तुमने अकारण ही पत्थर के भगवान नहीं बना लिए हैं; वे तुम्हारी जड़ता के सूचक हैं, सबूत हैं। तुमने अपनी ही छवि में उनको ढाल लिया है। तुमने अपनी ही प्रतिमाएं गढ़ ली हैं--तुमसे भी ज्यादा मुर्दा! थोड़ा पहचानो! थोड़ा जागो! गत्यात्मक को पूजो! देखो! चांद चलता है, सूरज चलता है, तारे चलते हैं। कुछ ठहरा...

ओशो : क्या मुझे किसी और से प्रेम करने से पहले खुद से प्रेम करना चाहिए?

क्या मुझे किसी और से प्रेम करने से पहले खुद से प्रेम करना चाहिए? “हां, आपको यह समझना होगा कि करुणामय होने के लिए, व्यक्ति को सबसे पहले खुद के प्रति करुणा जगानी होगी। अगर आप खुद से प्रेम नहीं करते हैं, तो आप कभी किसी और से प्रेम नहीं कर पाएंगे। यदि आप स्वयं के प्रति करुणापूर्ण नहीं हैं, तो आप किसी और के प्रति करुणापूर्ण नहीं हो सकते। आपके तथाकथित संत जो खुद पर बहुत कठोर हैं, वे सिर्फ दिखावा करते हैं कि वे दूसरों के प्रति करुणापूर्ण हैं। यह संभव नहीं है। मनोवैज्ञानिक रूप से यह असंभव है। यदि आप स्वयं के प्रति करुणापूर्ण नहीं हैं, तो आप दूसरों के प्रति करुणापूर्ण कैसे हो सकते हैं? “पहला कदम खुद को स्वीकार करना है जैसे आप हैं; सभी आदर्श छोड़ दें। अपने दिल में कोई शर्तें न रखें कि ऐसा ही 'होना चाहिए'। आप कोई और नहीं हैं। आपसे कुछ ऐसा करने की अपेक्षा नहीं की जाती है जो आपसे संबंधित नहीं है। आप सिर्फ अपने होने के लिए हैं। रिलैक्स करें और बस खुद बनें। अपने व्यक्तित्व के प्रति सम्मान रखें और अपने स्वयं के हस्ताक्षर करने का साहस रखें। दूसरों के हस्ताक्षरों की नकल पर मत जाइए। ” ओशो ए सडेन ...

ओशो : बुद्ध हो जाने की कीमत भी चुकानी पड़ती है

बुद्ध हो जाने की कीमत भी चुकानी पड़ती है वास्तव में, एक यंत्र की भांति जीना आपको सुविधापूर्ण लगता है। सचमुच एक यंत्र की भांति जीना आरामदेह है आप एक यांत्रिक प्रक्रिया में जीते हैं। आपको अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। आपका शरीर, आपका मन एक मशीन की तरह काम करता है और इसमें वह कुशल भी है। और यह सजग न होना काफी सुविधापूर्ण है, क्योंकि जो वस्तुएं आपके चारों ओर फैली हैं, उनके प्रति सजग होना एक ऐसी संवेदनशीलता प्रदान करता है कि वह आपको बड़ी दुःख पूर्ण लगेगी। बुद्ध हो जाना केवल आनंदपूर्ण हो जाना ही नहीं हैं, जहां तक बुद्ध का अपना संबंध है, वे आनंदपूर्ण हैं। वे आनंद के उच्चतम अनुभव कोप्राप्त करते हैं। किंतु साथ ही उन्हें इसकी बहुत बड़ी कीमत भी चुकानी पड़ती है, क्योंकि अब वे इतने संवेदनशील हो जाते हैं कि उनके चारों तरफ जो चीजें फैली हैं, वे उन्हें दुःख देती हैं। वे दूसरों के दुःख से पीड़ित होने लगते है। एक भिखारी आपको मिलता है। आप उसे बिना जाने ही निकल जाते हैं, कोई समस्या नहीं है। यह बिल्कुल सुविधापूर्ण है। यदि आज सजग हो जाते हैं, तब यह इतना आसान नहीं होगा। तब आपको ऐसा अनुभव होगा ही कि इसमें...

ओशो : जागरण

जागरण तुम्हारे स्वपन में भी सत्य कि छाया पड रही है और तुम्हारी नींद में भी जागरण का बीज पडा़ है । वहीं से अंकुरित होगा । और जीवन ही एकमात्र अवसर है । भागो मत, भागना आसान है । इस जीवन को ही जीओ। और धीरे धीरे समझपूर्वक जीओ : -- कि मैं क्या कर रहा हूँ?  क्यों कर रहा हूँ?  और मुझे इस जीवन से क्‍या मिल रहा है?  अगर सुख मिल रहा है तो खूब जीओ, जी भर कर जीओ! और अगर दुख मिल रहा है, तो जिस जिस चीज से दुख मिल रहा है, उसको विसर्जित करो। काश, तुम जरा चुनाव करने लगो! ओशो रहिमन धागा प्रेम का

ओशो : चौबीस घंटे के लिए सारी वासना छोड़ दो। कुछ पाने की आशा मत रखो। कुछ होने की आशा मत रखो।

एक बार जरा क्षण भर को ऐसा सोचो कि चौबीस घंटे के लिए सारी कामना छोड़ दो -सुख की कामना भी छोड़ दो। चौबीस घंटे में कुछ हर्जा नहीं हो जाएगा, कुछ खास नुकसान नहीं हो जाएगा। ऐसे भी इतने दिन वासना कर-कर के क्या मिल गया है? चौबीस घंटे मेरी मानो। चौबीस घंटे के लिए सारी वासना छोड़ दो। कुछ पाने की आशा मत रखो। कुछ होने की आशा मत रखो। एक क्रांति घट जाएगी चौबीस घंटे में। तुम अचानक पाओगे, जो है, परम तृप्तिदायी है। जो भी है। रूखी-सूखी रोटी भी बहुत सुस्वादु है, क्योंकि अब कोई कल्पना न रही। अब किसी कल्पना में इसकी तुलना न रही। जैसा भी है, परम तृप्तिदायी है! यह अस्तित्व आनंद ही आनंद से भरपूर है। पर हम इसके आनंद भोगने के लिए कभी मौका ही नहीं पाते। हम दौड़े-दौड़े हैं, भागे-भागे हैं। हम ठहरते ही नहीं। हम कभी दो घड़ी विश्राम नहीं करते! इस विश्राम का नाम ही ध्यान है। वासना से विश्राम ध्यान है। तृष्णा से विश्राम ध्यान है। अगर तुम एक घंटा रोज सारी तृष्णा छोड़कर बैठ जाओ, कुछ न करो, बस बैठे रहो -- मस्ती आ जाएगी! आनंद छा जाएगा! रस बहने लगेगा! धीरे-धीरे तुम्हें यह बात दिखाई पड़ने लगेगी, जब घंटे भर में रस बहने लगता है, तो फि...

ओशो : आशा रखोगे तो निराशा ही हाथ लगेगी

आशा रखोगे तो निराशा ही हाथ लगेगी जीवन में न तो उदासी है और न निराशा है। उदासी और निराशा होगी–तुममें। जीवन तो बड़ा उत्फुल्ल है। जीवन तो बड़ा उत्सव से भरा है। जीवन जीवन तो सब जगह–नृत्यमय है; नाच रहा है। उदास…? तुमने किसी वृक्ष को उदास देखा? और तुमने किसी पक्षी को निराश देखा? चांदत्तारों में तुमने उदासी देखी? और अगर कभी देखी भी हो, तो खयाल रखना: तुम अपनी ही उदासी को उनके ऊपर आरोपित करते हो। अहंकार है कारण–उदासी और निराशा का। निराशा का क्या अर्थ होता है? निराशा का अर्थ होता है: तुमने आशा बांधी होगी, वह टूट गई। अगर आशा न बांधते, तो निराशा न होती। निराशा आशा छी छाया है। आदमी भर आया बांधता है; और तो कोई आशा बांधता ही नहीं। आदमी ही कल की सोचता है, परसों की सोचता है, भविष्य को सोचता है। सोचता है, आयोजन करता है बड़े कि कैसे विजय करूं, कैसे जीतूं?कैसे दुनिया की दिखा दूं कि मैं कुछ हूं? कैसे सिकंदर बन जाऊं? फिर नहीं होती जीत, तो निराशा हाथ आती है। सिकंदर भी निराश होकर मरता है; रोता हुआ मरता है। जो भी आदमी आशा से जीएगा, वह निराश होगा। आशा का मतलब है: भविष्य में जीना; अहंकार की योजनाएं बनाना; और अहंकार...

ओशो : जन्म दिन पर मृत्यु को भी याद कर लें

जन्म दिन पर मृत्यु को भी याद कर लें   आज जन्म दिन के बहाने हम यहां इकट्ठा हुए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किस आदमी के नाम के बहाने से। इससे फर्क नहीं पड़ता कि आज अ का जन्मदिन है या ब का या स का। असल में समझना यह है कि जन्मदिन को हम उत्सव क्यों बना लेते हैं? उत्सव इसीलिए बना लेते हैं कि जीवन का तो कोई पता नहीं। अगर जीवन का पता हो तो प्रतिपल उत्सव हो जाए, फेस्टिवल हो जाए। लेकिन जीवन तो महोत्सव है। और जन्म उस महोत्सव की शुरुआत भर है। और यदि जो जीवन हम जी रहे हैं, वह आनंदमय नहीं है, तो फिर ऐसे जीवन की शुरुआत आनंद की बात कैसे हो सकती है? जीवन यदि दुखों से भरा हुआ है तो सिर्फ जन्म हो जाना आनंदपूर्ण नहीं हो सकता। लेकिन हम इस सच को झुठलाने में कुशल हैं। जीवन में दुख है, तो हम झूठे सुख कल्पित करते हैं कि जन्मदिन में बड़ा सुख है! क्योंकि अगर कहें कि जीवन में बड़ा सुख है, तो हमारी आंखें कह देंगी कि कहां है? अगर कहें कि जीवन में बड़ा आनंद है, तो हमारे पैर बता देंगे कि कैसे भला, हम तो नहीं नाच-गा रहे हैं। फिर हम सब एक-दूसरे को धोखा देने की योजना बनाते हैं। यह जो हमारी दुनिया है, यह झूठ की...

ओशो : समय रहते जाग जाओ तो ठीक। क्योंकि जो समय हाथ से चला गया उसे वापस नहीं लौटाया जा सकता।

समय रहते जाग जाओ तो ठीक। क्योंकि जो समय हाथ से चला गया उसे वापस नहीं लौटाया जा सकता। जो क्षण बीत गए, वे बीत ही गए; उन्हें फिर से जीने की कोई सुविधा नहीं है। समय कोई ऐसी संपत्ति नहीं है जिसे तुम खोकर फिर पा सकोगे। इस संसार में सभी चीजें खो कर पाई जा सकती हैं, समय नहीं पाया जा सकता।  इसलिए समय इस संसार में सबसे ज्यादा बहुमूल्य हैः गया, तो गया। और उसी के संबंध में हम सबसे ज्यादा लापरवाह हैं। लापरवाह ही नहीं हैं; लोग बैठ कर ताश खेल रहे हैं, शराब पी रहे हैं। पूछो, क्या कर रहे हो; वे कहते हैं, समय काट रहे हैं, समय काटे नहीं कटता। समय तुम्हें काट रहा है, पागलो! तुम समय को न काट सकोगे। समय को तुम क्या काटोगे? तुम समय को कैसे काटोगे? समय पर तो तुम्हारी कोई पकड़ ही नहीं है। समय तुम्हें काट रहा है; तुम सोचते हो तुम समय को काट रहे हो। अखीर में पाओगे, समय तो नहीं कटा, तुम ही कट गए। अखीर में पाओगे, समय तो नहीं मरा, तुम्हीं मर गए। ध्यान रखना, समय नहीं बीत रहा है, तुम ही बीत रहे हो। समय नहीं जा रहा है, तुम ही बहे जा रहे हो। समय तो एक अर्थ में वहीं का वहीं हैः लेकिन तुम आते हो, चले जाते हो; तुम्हारी...

ओशो : बड़ी मीठी कथा है झेन में ...

बड़ी मीठी कथा है झेन में ... एक छोटा बच्चा एक सदगुरु की सेवा में आया करता था। और भी बड़े साधक आते थे। वह बैठ कर चुपचाप सुनता था। जैसा वह साधक छोटा-सा बच्चा गुरु के पास आता था। वह बैठता था अपनी चटाई बिछा कर, सुनता था गुरु की बातें--दूसरों से जो गुरु कहता था। एक दिन वह आया, उसने चटाई बिछाई, गुरु के चरणों से सिर झुका कर कहा कि मुझे भी ध्यान की विधि दें। गुरु थोड़ा हंसा होगा। उस जगत में बड़े-बड़े छोटे बच्चों जैसे हैं। छोटा बच्चा! लेकिन जब इतनी सरलता से पूछा गया है तो इनकार नहीं किया जा सकता। गुरु ने कहा कि तू ऐसा कर, एक हाथ की ताली को सुनने की कोशिश कर। उसने झुक कर नमस्कार किया विधिवत। वह गया, बड़ी चिंता में पड़ गया। वह बैठा। उसने सब तरफ से सुनने की कोशिश की। सांझ का सन्नाटा था, कौए वापस लौटे थे दिन भर की यात्रा और थकान से और कांव-कांव कर रहे थे। उसने कहा कि हो न हो, यही एक हाथ ही आवाज है। वह भागा, दूसरे दिन सुबह गुरु के पास आया। उसने कहा पा ली! कौओं की आवाज? गुरु ने कहा कि नहीं, यह भी नहीं है। और खोजो। वह गया रात के सन्नाटे में मौन बैठा रहा झींगुर बोलते थे, उसने कहा, हो न हो सन्नाटे की आवाज--यही...

ओशो : दूध और कामवासना

दूध और कामवासना दूध असल में अत्‍यधिक कामोत्तेजक आहार है और मनुष्‍य को छोड़कर पृथ्‍वी पर कोई पशु इतना कामवासना से भरा हुआ नहीं है। और उसका एक कारण दूध है। क्‍योंकि कोई पशु बचपन के कुछ समय के बाद दूध नहीं पीता, सिर्फ आदमी को छोड़ कर। पशु को जरूरत भी नहीं है। शरीर का काम पूरा हो जाता है। सभी पशु दूध पीते है अपनी मां का, लेकिन दूसरों की माताओं का दूध सिर्फ आदमी पीता है और वह भी आदमी की माताओं का नहीं जानवरों की माताओं का भी पीता है।        दूध बड़ी अदभुत बात है, और आदमी की संस्‍कृति में दूध ने न मालूम क्‍या-क्‍या किया है, इसका हिसाब लगाना कठिन है। बच्‍चा एक उम्र तक दूध पिये,ये नैसर्गिक है। इसके बाद दूध समाप्‍त हो जाना चाहिए। सच तो यह है, जब तक मां का स्‍तन से बच्‍चे को दूध मिल सके, बस तब तक ठीक हे। उसके बाद दूध की आवश्‍यकता नैसर्गिक नहीं है। बच्‍चे का शरीर बन गया। निर्माण हो गया—दूध की जरूरत थी, हड्डी थी, खून था, मांस बनाने के लिए—स्‍ट्रक्‍चर पूरा हो गया, ढांचा तैयार हो गया। अब सामान्‍य भोजन काफी है। अब भी अगर दूध दिया जाता है तो यह सार दूध कामवासना का निर्माण करता है। अ...

ओशो : सदगुरुओं ने सिद्धात नहीं दिये हैं, सदगुरुओं ने दृष्टि दी है।

सदगुरुओं ने सिद्धात नहीं दिये हैं, सदगुरुओं ने दृष्टि दी है। सिद्धात थोड़ी दूर काम पड़ सकते हैं। ऐसा समझो एक अंधा आदमी तुम से पूछता है कि मुझे स्टेशन जाना है, कैसे जाऊं? तुम उसे सब समझा देते हो कि पहले बाएं रास्ते से चलना मील भर, फिर दाएं मुंडू जाना, फिर मील भर चलना, फिर बाएं मुड़ जाना; तुम उसे सब समझा देते हो; फिर भी पक्का नहीं है कि अंधा पहुंच पाएगा— अंधा आखिर अंधा है। कब मील पूरा हुआ, कैसे जानेगा? आधा मील पर ही मुड़ जाए, कि डेढ़ मील तक चलता चला जाए! सदगुरु अंधे को सूचनाएं नहीं देते, सदगुरु कहते है—यह अंजन लो, आंख पर आज लो, इससे तुम्हें दिखायी पड़ेगा। फिर तुम खुद ही जानोगे, राह के किनारे पत्थर लगे हैं वह इशारा बताते है कि स्टेशन कितनी दूर, तुम खुद ही पहुंच जाओगे। दृष्टि चाहिए।       मैं तुमसे दृष्टि की बात कर रहा हूं। तुम इस तरह से अपने जीवन की परीक्षा में लग जाओ—जो भी करते हो, इतनी ही बात सोचकर करो कि इससे मेरा संगीत गहन होगा? बस। अगर संगीत गहन होता है, फिकर छोड़ो दुनिया के शास्त्रों की और फिकर छोड़ो दुनिया के सिद्धातो की, उनका कोई मूल्य नहीं है; वे तुम्हारे लिए बनाये भी नहीं ...

ओशो : तंत्र विज्ञान है

तंत्र विज्ञान है  एक प्रश्न अपने साथ एक उत्तर लाता है और साथ ही अनेक प्रश्न भी । संदेह करने वाला मन ही समस्या है ।  पार्वती कहती हैं : मेरे प्रश्नों की फिकर न करें । मैंने अनेक प्रश्न पूछ लिए : आपका सत्य रूप क्या है ? समय और स्थान से परे होकर हम उसमें पूरी तरह प्रवेश कैसे करें ? लेकिन मेरे प्रश्नों की फिकर न करें । मेरे संशय निर्मूल करें । ये प्रश्न तो मैं इसलिए पूछती हूं कि वे मेरे मन में उठते हैं । मैं आपको केवल अपना मन दिखाने के लिए ये प्रश्न पूछती हूं । उन पर बहुत ध्यान मत दें । उत्तरों से मेरा काम नहीं चलेगा । मेरी जरूरत तो है कि मेरे संशय निर्मूल हों ।   लेकिन संशय निर्मूल कैसे होंगे ? किसी उत्तर से ? क्या कोई उत्तर है जो कि मन के संशय दूर कर दे ? मन ही तो संशय है । जब तक मन ही मिटता है , संशय निर्मूल कैसे होंगे ?   शिव उत्तर देंगे । उनके उत्तर में सिर्फ विधियां हैं - सबसे पुरानी , सबसे प्राचीन विधियां । लेकिन तुम उन्हें अत्याधुनिक भी कह सकते हो , क्योंकि उनमें कुछ भी जोड़ा नहीं जा सकता । वे पूर्ण हैं - एक सौ बारह विधियां । उनमें सभी संभावनाओं का समाव...

ओशो : मृत्यु कीमती चीज है। अगर दुनिया में मृत्यु न होती तो संन्यास न होता।

मृत्यु कीमती चीज है। अगर दुनिया में मृत्यु न होती तो संन्यास न होता। अगर दुनिया में मृत्यु न होती तो धर्म न होता। अगर दुनिया में मृत्यु न होती तो परमात्मा का कोई स्मरण न होता, प्रार्थना न होती, पूजा न होती, आराधना न होती ; न होते बुध्ध, न महावीर, न कृष्ण, न क्राइस्ट, न मोहम्मद। यह पृथ्वी दिव्य पुरुषों को तो जन्म ही न दे पाती, मनुष्यों को भी जन्म न दे पाती। यह पृथ्वी पशुओं से भरी होती। यह तो मृत्यु ने ही झकझोरा। मृत्यु की बड़ी कृपा है, उसका बड़ा अनुग्रह है। मृत्यु ने झकझोरा, याद दिलाई। बुध्ध को भी स्मरण आया था मृत्यु को ही देख कर। एक मरे हुए आदमी की लाश को देख कर पूछा था अपने सारथी से, इसे क्या हो गया? उस सारथी ने कहा कि यह आदमी मर गया। बुध्ध ने कहा, क्या मुझे भी मरना होगा? सारथी झिझका, कैसे कहें? बुध्ध ने कहा, झिझको मत। सच--सच कहो, झूठ न बोलना। क्या मुझे भी मरना होगा? मजबूरी में सारथी को कहना पड़ा कि कैसे छिपाऊं आपसे! आग्या तो यही है आपके पिता की कि आपको मौत की खबर न होने दी जाए, क्योंकि बचपन में आपके ज्योतिषियों ने कहा था कि जिस दिन इसको मौत का स्मरण आएगा, उसी दिन यह संन्यस्त हो जाएगा...

ओशो : प्रेम करना, पूजा नहीं। क्योंकि पूजा दूसरा ही अर्थ रखती है।

प्रेम करना, पूजा नहीं।  क्योंकि पूजा दूसरा ही अर्थ रखती है।  पूजा यह कहती है कि इस पत्थर की मूर्ति के सामने हाथ जोड्ने से मुझे मुक्ति मिल सकती है।  यह बेवकूफी की शुरुआत हो गई।  किसी मूर्ति के और किसी चित्र के सामने  बैठने से मुक्ति नहीं मिल सकती।  और कोई मूर्ति और कोई चित्र भगवान  तक पहुंचने का रास्ता नहीं बन सकता।  कोई मूर्ति भगवान नहीं है।  मूर्ति और चित्र उन प्यारे लोगों की स्मृतियां हैं  जो जमीन पर हो चुके हैं। और उनकी स्मृति न रखी जाए,  यह मैंने कभी भी नहीं कहा है। मैं मूर्तियों के मंदिर बनाने के खिलाफ हूं।  लेकिन घर—घर में मूर्तियां हों, इसके पक्ष में हूं।  एक—एक घर में मूर्तियां हों। लेकिन मूर्तियां  भगवान की तरह नहीं, एक पवित्र स्मरण की तरह,  एक सैक्रेड रिमेंबरिंग की तरह।  जमीन पर कुछ फूल हुए हैं मनुष्य के जीवन में,  कुछ मनुष्य हुए हैं जो खिल गए हैं पूरे,  उनकी याद अगर आदमी रखे तो मैं  कैसे उसके खिलाफ हो सकता हूं? एक अदभुत घटना सुनाता हूं। सुन कर बहुत हैरानी होगी। रामकृष्ण परमहंस का कि...

ओशो : बुद्ध ने कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने कहा है, होश से चले, होश से बैठे, होश से उठे।

बुद्ध ने  कहा है, कि न कोई परमात्मा है, न कोई आकाश में बैठा हुआ नियंता है। तो साधक क्या करें? तो बुद्ध ने कहा है, होश से चले, होश से बैठे, होश से उठे। बुद्ध का एक भिक्षु आनंद पूछने लगा; वह एक यात्रा पर जा रहा था और उसने पूछा कि भगवान, कुछ मुझे पूछना है। स्त्रियों के संबंध में मन में अभी भी काम-वासना उठती है; तो स्त्रियां मिल जाएं तो उनसे कैसा व्यवहार करना? तो बुद्ध ने कहा, “स्त्रियां अगर मिल जाएं तो बचकर चलना। दूर से निकल जाना।” आनंद ने कहा, “और अगर ऐसी स्थिति आ जाए कि बचकर न निकल सकें? तो बुद्ध ने कहा, ” आंख नीची झुकाकर निकल जाना। आनंद ने कहा, और यह भी हो सकता है कि ऐसी स्थिति आ जाए कि आंख भी झुकाना संभव न हो। समझो, कि कोई स्त्री गिर पड़ी हो और उसे उठाना पड़े। या कोई स्त्री कुएं में गिर पड़ी हो और जाकर उसको सहारा देना पड़े; या कोई स्त्री बीमार हो; ऐसी स्थिति आ जाए कि आंख बचाकर भी चलना मुश्किल हो जाए? तो बुद्ध ने कहा, “छूना मत।” और आनंद ने कहा, “अगर ऐसी अवस्था आ जाए कि छूना भी पड़े?तो बुद्ध ने कहा, कि जो मैं इन सारी बातों से कह रहा हूं, उसका सार कहे देता हूं : छूना, देखना, जो करना हो कर...

ओशो : "गति से ठंडक दूर होती है, लेकिन अगति से गर्मी परास्त होती है। जो निश्चल और प्रशांत है, वह सृष्टि का मार्गदर्शक बन जाता है।"

"गति से ठंडक दूर होती है, लेकिन अगति से गर्मी परास्त होती है। जो निश्चल और प्रशांत है, वह सृष्टि का मार्गदर्शक बन जाता है।" निश्चल और प्रशांत! जो इस भीतर के तत्व को पकड़ लेता है जो न कभी चला और न चलता है, चलना जिसके आस -पास हो रहा है, सारा परिवर्तन का चाक जिस कील के आस-पास घूम रहा है, लेकिन जो कील ठहरी हुई है, वह जो अनमूविंग सेंटर है जिसके आस-पास सारी गति और परिवर्तन हो रहा है, उस परम स्थिर को जो पहचान लेता है, वह प्रशांत हो गया, वह निश्चल हो गया। इसका यह मतलब नहीं है कि वह जड़ हो गया। इसका यह मतलब नहीं है कि वह बैठ गया, पत्थर की मूर्ति हो गया। वह काम के जगत में होगा, क्रिया के जगत में होगा, वह संसार में खड़ा होगा। लेकिन अब संसार ही चलेगा, वह नहीं चलेगा। उसका शरीर चलेगा, वह नहीं चलेगा। उसका यंत्र काम करेगा, लेकिन यंत्र के भीतर छिपा हुआ मालिक शांत ही रहेगा। लाओत्से कहता है, ऐसा व्यक्ति, ऐसी चेतना सृष्टि की मार्गदर्शक हो जाती है। सहज, स्वभावतः, ऐसे व्यक्ति के पास लोग आने लगते हैं। कोई अनजानी शक्ति उन्हें खींचने लगती है; कोई अदृश्य पुकार उन्हें उसके पास लाने लगती है। वह उसके भीतर ज...

ओशो : लाओत्से का प्रसिद्ध सूत्र है कि जब जगत में ताओ था तो धर्म नहीं था, धर्म-उपदेशक नहीं थे, धर्मगुरु नहीं थे। जब जगत से ताओ नष्ट हो जाता है, स्वभाव खो जाता है, तब धर्म का जन्म होता है।

लाओत्से का प्रसिद्ध सूत्र है कि जब जगत में ताओ था तो धर्म नहीं था, धर्म-उपदेशक नहीं थे, धर्मगुरु नहीं थे। जब जगत से ताओ नष्ट हो जाता है, स्वभाव खो जाता है, तब धर्म का जन्म होता है। सीधी बात है। क्योंकि धर्म औषधि है। पहले बीमारी चाहिए, बीमारी के पीछे डाक्टर प्रवेश करता है। फिर हम डाक्टर के बड़े अनुगृहीत होते हैं। लाओत्से का जोर चिकित्सा पर नहीं है। पहले बीमारी पैदा करो, फिर इलाज करो, इस पर उसका जोर नहीं है। लाओत्से का जोर है, बीमारी पैदा मत करो। बीमारी हमारी पैदा की हुई है। फिर हजारों औषधियां पैदा होती हैं। बीमारी को ठीक करने के लिए हजारों औषधियां अस्तित्व में आती हैं। फिर औषधियों के रिएक्शंस और उनसे पैदा हुई बीमारियां हैं। और फिर उनके सिलसिले का कोई अंत नहीं है। फिर चिकित्सक जिस बीमारी का इलाज कर सकता है, उसी बीमारी को खोजता है। इधर मेरा अनुभव यही है। आपकी तकलीफ क्या है, चिकित्सक का इससे कम संबंध है। मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन ने एक बार चिकित्सा का काम शुरू किया था। सारा आयोजन कर लिया, द्वार पर तख्ती लगा दी और मरीज की प्रतीक्षा में था। पहला मरीज आया और उस मरीज ने कहा कि मैं बड़ी म...

ओशो : ध्यान के लिए समय कहां !

ध्यान के लिए समय कहां ! मेरे पास लोग आते हैं। कहते हैं : मन अशांत है, शांति चाहिए। अगर मैं उन्हें कहूं ध्यान करो, वे कहते हैं : समय कहां! अशांत होने को समय है, अशांत होने में चौबीस घंटे लगाते हैं-शांत होने को समय कहां! मैं उनसे पूछता हूं : ‘कभी फिल्म देखते है?’ ‘हां -हां, कभी जाना पड़ता है। बच्चे हैं, पत्नी है, मित्र हैं। ‘ ‘रोटरी क्लब जाते हैं?’ ‘जाना ही पड़ता है; सदस्य हूं। ‘ रोटरी क्लब भी जा सकते हैं, फिल्म भी देख सकते हैं, क्रिकेट मैच भी देखते हैं, रेडियो भी सुनते हैं, टेलीविजन भी देखते हैं, अखबार भी पढ़ते हैं-कचरा अखबार! जिसमें सिवाय कचरे के और कुछ भी नहीं होता। और वही कचरा दोहरता रहता है रोज। सबके लिए समय है और ध्यान की बात उठती है तो बस एकदम से समय कहां है! और ये वे ही लोग हैं जिनको तुम ताश खेलते देखोगे और अगर पूछो कि क्या कर रहे हो, तो कहते हैं : समय नहीं कटता, समय काट रहे हैं! एक तरफ समय नहीं कटता, ताश के पत्ते खेलते हैं, ताश के राजा-रानी उनसे उलझते हैं। समय नहीं कटता, शतरंज बिछाते हैं। लकड़ी के हाथी- घोड़े, उनको दौड़ाते हैं। कहो ध्यान; समय कहां है। और जब वे कहते हैं समय कहां है, तो...