ओशो : जलालुद्दीन रूमी की बड़ी प्रसिद्ध कविता है, मुझे बड़ी प्यारी है...
जलालुद्दीन रूमी की बड़ी प्रसिद्ध कविता है, मुझे बड़ी प्यारी है। एक प्रेमी अपनी प्रेयसी के द्वार पर दस्तक देता है। भीतर से आवाज आती है, "कौन है?'' "प्रेमी कहता है, "मैं हूं तेरा प्रेमी। पहचाना नहीं? मेरी पगध्वनि विस्मृत हो गयी! मेरी आवाज पहचान से उतर गयी।'' लेकिन भीतर से आवाज आयी, "अभी तुम इस योग्य नहीं कि द्वार खुलें। अभी तुम अधिकारी नहीं।''
प्रेमी बड़ा हैरान हुआ। क्योंकि प्रेमी तो सदा सोचता है कि अधिकारी है ही। हर व्यक्ति की यही भूल है कि हर व्यक्ति जन्म से ही समझता है कि वह प्रेम का अधिकारी है। इसलिए प्रेम को कोई सीखता ही नहीं, बिना सीखे ही प्रेम करने लगते हैं। और इसलिए फिर प्रेम में इतनी भूलें होती हैं और प्रेम में इतना उपद्रव होता है, सारा जीवन बर्बाद हो जाता है।
प्रेम संभावना है, सत्य नहीं। प्रेम को प्रगटना है; वह प्रगट नहीं है। प्रेम कोई मिली हुई संपदा नहीं है; खोजनी है; सृजन करना है उसका।
प्रेमी लौट गया; वर्षों भटकता रहा; प्रेम की खोज करता रहा; प्रेम का अर्थ समझने की चेष्टा करता रहा; ध्यान किया, प्रार्थना की--धीरे-धीरे प्रेम का आविर्भाव हुआ, वह लौटा। फिर उसने दस्तक दी। भीतर से आवाज आयी, "कौन?'' तो, जलालुद्दीन कहता है कि अब प्रेमी ने कहा: "तू ही है।'' और द्वार खुल गये।
जलालुद्दीन से अगर मेरी कभी मुलाकात हो जाए--कभी-न-कभी हो सकती है, क्योंकि जो रहा है वह कहीं होगा; जो है वह मिटता नहीं--तो उससे मैं कहूं कि कविता पूरी कर दो, यह अधूरी है। अभी भी द्वार खुलने नहीं चाहिए। क्योंकि जहां "तू'' है वहां "मैं'' मिट नहीं सकता।
प्रेमी ने पहले कहा, "मैं''! अब उसने बदल लिया पहलू; लेकिन पहलू बदलने से कुछ फर्क नहीं पड़ता। अब वह कहता है, "तू''! लेकिन "तू'' का क्या अर्थ है अगर "मैं'' मिट गया हो? किसको कहोगे "तू''? किस प्रसंग में कहोगे "तू''?
"तू'' का सारा अर्थ "मैं'' में छिपा है। जब तक "मैं'' हूं, तभी तक "तू'' में अर्थ है। जब "मैं'' ही न रहा तो "तू'' कौन?
जलालुद्दीन से मैं कहूं कि इसे थोड़ा और आगे बढ़ा, एक दफा और लौटा इस प्रेमी को। जल्दी मत कर। कविता खत्म करने की इतनी जल्दी भी क्या है; और चार लाइन जोड़ी जा सकती हैं। जाने दे वापस। प्रेयसी से कहलवा दे कि कुछ-कुछ तैयार हुआ, लेकिन पूरा नहीं। थोड़ी अधिकारी होने की क्षमता आयी; लेकिन अभी प्रारंभ है। थोड़ा और भटक। थोड़ा और खोज। इतना पहुंचा है तो आगे भी पहुंच ही जाएगा। रास्ता ठीक है, जिस पर चल पड़ा है, मंजिल अभी नहीं आयी। आधी यात्रा हो गयी है--"मैं'', खो गया; आधी और होनी चाहिए--"तू'' भी खो जाए! फिर ला, कुछ वर्षों बाद! फिर लाने की वैसे जरूरत भी नहीं है। फिर तो प्रेयसी वहीं चली आएगी जहां प्रेमी है।
परम प्रेम तब है जब न प्रेमी रहा न प्रेयसी रही, जब द्वंद्व खो गया।
ओशो
भक्तिसूत्र
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