ओशो : प्रश्न : आप का संदेश क्या है ?
प्रश्न : आप का संदेश क्या है ?
वही जो सदा से सभी बुद्धों का रहा है: अप्प दीपो भव! अपने दीए खुद बनो। अपने माझी खुद बनो। किसी और के कंधे का सहारा न लेना। खुद खाओगे तो तुम्हारी भूख मिटेगी। खुद पियोगे तो तुम्हारी प्यास मिटेगी। सत्य को स्वयं जानोगे, तो ही, केवल तो ही संतोष की वीणा तुम्हारे भीतर बजेगी! मेरा जाना हुआ सत्य, तुम्हारे किसी काम का नहीं।
मैं तुम्हें सत्य नहीं दे सकता। मैं तो सिर्फ तुम्हारे भीतर सत्य को पाने की अभीप्सा को प्रज्वलित कर सकता हूं। मैं तुम्हें सत्य नहीं दे सकता लेकिन सत्य की ऐसी आग तुम्हारे भीतर पैदा कर सकता हूं कि तुम पतंग बन जाओ, कि तुम सत्य की ज्योति में जल मिटने को तत्पर हो जाओ।
कौन कहता है
कि मेरी नाव पर माझी नहीं है,
आज माझी मैं स्वयं इस नाव का हूं!
मैं नहीं स्वीकार करता
जलधि की छलनामयी
मनुहारमय रंगीन लहरों का निमंत्रण
आज तो स्वीकार मैंने की जलधि की
अनगिनत विकराल इन उद्दाम लहरों की चुनौती!
आज मेरे सधे हाथों में थमी पतवार।
लहरें नाव को आकाश तक फेंके भले ही,
जाए ले पाताल तक वे साथ अपने,
किंतु पाएंगी न इस को लील!
उनकी हार निश्चित
नाथ लेगी नाग सी विकराल लहरों को
हृदय की आस्था की डोर!
लहरें शीश पर ढोकर स्वयं ले जाएंगी
यह नाव मेरे लक्ष्य तक!
क्योंकि अपनी नाव का माझी स्वयं मैं,
और मेरे सधे हाथों में थमी पतवार!
यही मेरा संदेश है: माझी बनो। पतवार उठाओ। थोड़ी पतवार चलाओ, हाथ सध जाएंगे। परमात्मा ने तुम्हारे हाथ इस योग्य बनाए हैं कि सध सकते हैं। साधना उनकी क्षमता है। बैसाखियां पर न चलो, अपने पैरों पर चलो। अपने माझी बनो।
और घबड़ाओ मत। सागर की जो उद्दाम लहरें तुम्हें पुकार रही हैं, वे ही तुम्हें परमात्मा के किनारे तक ले जाएंगी। चुनौतियां ही अवसर हैं। चूको मत। हर चुनौती को अवसर बना लो।
राह पर पड़े पत्थर ही सीढ़ियां बन जाएंगे—तुम जरा सम्हलो, तुम जरा जागो! तुम्हें पता नहीं कि तुम्हारे भीतर कौन बैठा है! वही, जिसे तुम खोज रहे हो, तुम्हारे भीतर बैठा है। खोजनेवाला और जिसे हम खोज रहे हैं दो नहीं हैं। तुम्हारी अनंत क्षमता है। अमृतस्य पुत्रः! तुम अमृत के पुत्र हो।
ओशो
अमी झरत बिगसत कंवल
प्रवचन 6
वही जो सदा से सभी बुद्धों का रहा है: अप्प दीपो भव! अपने दीए खुद बनो। अपने माझी खुद बनो। किसी और के कंधे का सहारा न लेना। खुद खाओगे तो तुम्हारी भूख मिटेगी। खुद पियोगे तो तुम्हारी प्यास मिटेगी। सत्य को स्वयं जानोगे, तो ही, केवल तो ही संतोष की वीणा तुम्हारे भीतर बजेगी! मेरा जाना हुआ सत्य, तुम्हारे किसी काम का नहीं।
मैं तुम्हें सत्य नहीं दे सकता। मैं तो सिर्फ तुम्हारे भीतर सत्य को पाने की अभीप्सा को प्रज्वलित कर सकता हूं। मैं तुम्हें सत्य नहीं दे सकता लेकिन सत्य की ऐसी आग तुम्हारे भीतर पैदा कर सकता हूं कि तुम पतंग बन जाओ, कि तुम सत्य की ज्योति में जल मिटने को तत्पर हो जाओ।
कौन कहता है
कि मेरी नाव पर माझी नहीं है,
आज माझी मैं स्वयं इस नाव का हूं!
मैं नहीं स्वीकार करता
जलधि की छलनामयी
मनुहारमय रंगीन लहरों का निमंत्रण
आज तो स्वीकार मैंने की जलधि की
अनगिनत विकराल इन उद्दाम लहरों की चुनौती!
आज मेरे सधे हाथों में थमी पतवार।
लहरें नाव को आकाश तक फेंके भले ही,
जाए ले पाताल तक वे साथ अपने,
किंतु पाएंगी न इस को लील!
उनकी हार निश्चित
नाथ लेगी नाग सी विकराल लहरों को
हृदय की आस्था की डोर!
लहरें शीश पर ढोकर स्वयं ले जाएंगी
यह नाव मेरे लक्ष्य तक!
क्योंकि अपनी नाव का माझी स्वयं मैं,
और मेरे सधे हाथों में थमी पतवार!
यही मेरा संदेश है: माझी बनो। पतवार उठाओ। थोड़ी पतवार चलाओ, हाथ सध जाएंगे। परमात्मा ने तुम्हारे हाथ इस योग्य बनाए हैं कि सध सकते हैं। साधना उनकी क्षमता है। बैसाखियां पर न चलो, अपने पैरों पर चलो। अपने माझी बनो।
और घबड़ाओ मत। सागर की जो उद्दाम लहरें तुम्हें पुकार रही हैं, वे ही तुम्हें परमात्मा के किनारे तक ले जाएंगी। चुनौतियां ही अवसर हैं। चूको मत। हर चुनौती को अवसर बना लो।
राह पर पड़े पत्थर ही सीढ़ियां बन जाएंगे—तुम जरा सम्हलो, तुम जरा जागो! तुम्हें पता नहीं कि तुम्हारे भीतर कौन बैठा है! वही, जिसे तुम खोज रहे हो, तुम्हारे भीतर बैठा है। खोजनेवाला और जिसे हम खोज रहे हैं दो नहीं हैं। तुम्हारी अनंत क्षमता है। अमृतस्य पुत्रः! तुम अमृत के पुत्र हो।
ओशो
अमी झरत बिगसत कंवल
प्रवचन 6
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