ओशो : प्रार्थना के पार परमात्मा है

प्रार्थना के पार परमात्मा है

प्रेम तो सपना ही सपना है-मगर बड़ा प्रीतिकर, मधुर, सुस्वादु, लेने योग्य।

और जब मैं कहता हूं प्रेम अनुभव करने योग्य सपना है, तो ध्यान रखना, यह वक्तव्य सापेक्ष है। सभी वक्तव्य सापेक्ष हैं। मैं घृणा की तुलना में कह रहा हूं कि प्रेम जीने योग्य सपना है। मैं प्रार्थना की तुलना में नहीं कह रहा हूं। प्रार्थना की तुलना में तो जितने जल्दी प्रेम से भी जाग जाओ, उतना शुभ। और फिर प्रार्थना के पार परमात्मा है।

तो प्रेम की तुलना में प्रार्थना बेहतर है, लेकिन प्रार्थना में ही अटके मत रह जाना। पूजा-पाठ और अर्चन और प्रार्थना और निवेदन-यही सब न हो जाए। डूबना है ऐसे कि प्रार्थी और प्रार्थ्य दो न रह जाए, कि भक्त और भगवान दो न रह जाएं।

प्रार्थना भी छूट जानी चाहिए एक दिन, क्योंकि प्रार्थना भी थोड़ा शोरगुल है। प्रार्थना भी थोड़ी-सी विचार की छाया है। संसार गया, लेकिन उसकी कुछ रेखाएं छूट गई हैं। यात्री तो गुजर गया, उसके पदचिह्न रह गए हैं। यात्रा का तो अंत हो गया, लेकिन यात्रा में जमी धूल अभी भी तुम्हारे वस्त्रों पर है। उसे भी धो डालना है।

प्रार्थना में भी कहीं न कहीं थोड़ा-सा ‘मैं’ शेष रहता है। कौन करेगा प्रार्थना? और जहां ‘मैं’ है वहां  अभी भ्राति मौजूद है। प्रेम में ‘मैं’ कटता है, काफी कटता है। प्रार्थना में और भी कट जाता है; बस छाया रह जाती है। लेकिन छाया भी काफी है भटकाने को। छाया के पीछे भी चल पड़े अगर, तो भटक जाओगे, बहुत दूर चले जाओगे। छाया भी जानी चाहिए।...


ओशो
हंसा तो मोती चुगैं

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