ओशो : जीवन की घाटी में, अंतस की माटी में, उग आए टीस भरे घाव।
जीवन की घाटी में,
अंतस की माटी में, उग आए टीस भरे घाव।
तेल सभी चुक गया
अंतर के दीप का।
लुट गया हर मोती
आंखों की सीप का।
शोकमय अकेले में,
सुधियों के मेले में, मिला हमें केवल भटकाव।
पीड़ा लुहारिन-सी
पीट रही प्राण को।
कलियों ने ठग लिया
भोले पाषाण को।
हम इतने ऊबे हैं,
तड़पन में डूबे हैं, टूट रही सपनों की नाव।
सांसों के राम को
विरह-बनवास हुआ।
आंसू की गोद में
मन का विकास हुआ।
हांफते खिलाड़ी हम,
बहुत ही अनाड़ी हम, हार गए जीवन का दांव।
ऋचा! जिंदगी ने दिया क्या? जिंदगी में मिला क्या?
जीवन की घाटी में,
अंतस की माटी में, उग आए टीस भरे घाव।
सिवाय घावों के, सिवाय पीड़ाओं के, सिवाय संताप के और जीवन में मिला क्या? जीवेषणा क्यों? जीने की इतनी आतुरता क्यों? मरने का भय क्या? मृत्यु क्या छीन लेगी? जब जीवन ने कुछ दिया ही नहीं तो मृत्यु क्या छीन लेगी?
तेल सभी चुक गया
अंतर के दीप का।
लुट गया हर मोती
आंखों की सीप का।
सब लुट गया जीवन में, फिर भी हम पकड़े बैठे हैं! रस्सी जल गई, एंठ नहीं जाती।
तेल सभी चुक गया
अंतर के दीप का।
लुट गया हर मोती
आंखों की सीप का।
जीवन की घाटी में,
अंतस की माटी में, उग आए टीस भरे घाव।
जरा खोल कर तो देखो अपने अंतस को--घाव ही घाव! फूल तो एक भी न खिला--कांटे ही कांटे! कमल तो एक भी न उगा--कीचड़ ही कीचड़! फिर भी अभीप्सा, फिर भी जीवन को पकड़े रहने की आकांक्षा!
शोकमय अकेले में,
सुधियों के मेले में, मिला हमें केवल भटकाव।
पाया क्या इस भीड़ में? मिला क्या इस भीड़ में? केवल भटकाव।
पीड़ा लुहारिन-सी
पीट रही प्राण को।
कलियों ने ठग लिया
भोले पाषाण को।
हम इतने ऊबे हैं,
तड़पन में डूबे हैं, टूट रही सपनों की नाव।
सब टूट रहा, नाव डूब रही; मगर फिर भी हम थेगड़े लगा रहे हैं, नाव के छिद्र भर रहे हैं--बच जाएं, किसी तरह बच जाएं!
बच-बच कर भी क्या होता है? कितने जन्मों में जीए हो, कितनी लंबी यात्रा--सब गंवाया ही गंवाया!
सांसों के राम को
विरह-बनवास हुआ।
आंसू की गोद में
मन का विकास हुआ।
हांफते खिलाड़ी हम,
बहुत ही अनाड़ी हम, हार गए जीवन का दांव।
यहां सब हार जाते हैं, यह जुआ ऐसा है! जीतते केवल वही हैं जो चाह से मुक्त हो जाते हैं--जो चाह की व्यर्थता को देख लेते हैं; जो तृष्णा की दौड़ से जाग जाते हैं; जो वासना से हट जाते हैं और प्रार्थना में लीन हो जाते हैं।
जागो! जागने का नाम ही बुद्धत्व है। जागो जीवन से। जागो मृत्यु से। बस जागो! जो जाग गया उसने जीवन का परम धन पा लिया है।
ओशो
अंतस की माटी में, उग आए टीस भरे घाव।
तेल सभी चुक गया
अंतर के दीप का।
लुट गया हर मोती
आंखों की सीप का।
शोकमय अकेले में,
सुधियों के मेले में, मिला हमें केवल भटकाव।
पीड़ा लुहारिन-सी
पीट रही प्राण को।
कलियों ने ठग लिया
भोले पाषाण को।
हम इतने ऊबे हैं,
तड़पन में डूबे हैं, टूट रही सपनों की नाव।
सांसों के राम को
विरह-बनवास हुआ।
आंसू की गोद में
मन का विकास हुआ।
हांफते खिलाड़ी हम,
बहुत ही अनाड़ी हम, हार गए जीवन का दांव।
ऋचा! जिंदगी ने दिया क्या? जिंदगी में मिला क्या?
जीवन की घाटी में,
अंतस की माटी में, उग आए टीस भरे घाव।
सिवाय घावों के, सिवाय पीड़ाओं के, सिवाय संताप के और जीवन में मिला क्या? जीवेषणा क्यों? जीने की इतनी आतुरता क्यों? मरने का भय क्या? मृत्यु क्या छीन लेगी? जब जीवन ने कुछ दिया ही नहीं तो मृत्यु क्या छीन लेगी?
तेल सभी चुक गया
अंतर के दीप का।
लुट गया हर मोती
आंखों की सीप का।
सब लुट गया जीवन में, फिर भी हम पकड़े बैठे हैं! रस्सी जल गई, एंठ नहीं जाती।
तेल सभी चुक गया
अंतर के दीप का।
लुट गया हर मोती
आंखों की सीप का।
जीवन की घाटी में,
अंतस की माटी में, उग आए टीस भरे घाव।
जरा खोल कर तो देखो अपने अंतस को--घाव ही घाव! फूल तो एक भी न खिला--कांटे ही कांटे! कमल तो एक भी न उगा--कीचड़ ही कीचड़! फिर भी अभीप्सा, फिर भी जीवन को पकड़े रहने की आकांक्षा!
शोकमय अकेले में,
सुधियों के मेले में, मिला हमें केवल भटकाव।
पाया क्या इस भीड़ में? मिला क्या इस भीड़ में? केवल भटकाव।
पीड़ा लुहारिन-सी
पीट रही प्राण को।
कलियों ने ठग लिया
भोले पाषाण को।
हम इतने ऊबे हैं,
तड़पन में डूबे हैं, टूट रही सपनों की नाव।
सब टूट रहा, नाव डूब रही; मगर फिर भी हम थेगड़े लगा रहे हैं, नाव के छिद्र भर रहे हैं--बच जाएं, किसी तरह बच जाएं!
बच-बच कर भी क्या होता है? कितने जन्मों में जीए हो, कितनी लंबी यात्रा--सब गंवाया ही गंवाया!
सांसों के राम को
विरह-बनवास हुआ।
आंसू की गोद में
मन का विकास हुआ।
हांफते खिलाड़ी हम,
बहुत ही अनाड़ी हम, हार गए जीवन का दांव।
यहां सब हार जाते हैं, यह जुआ ऐसा है! जीतते केवल वही हैं जो चाह से मुक्त हो जाते हैं--जो चाह की व्यर्थता को देख लेते हैं; जो तृष्णा की दौड़ से जाग जाते हैं; जो वासना से हट जाते हैं और प्रार्थना में लीन हो जाते हैं।
जागो! जागने का नाम ही बुद्धत्व है। जागो जीवन से। जागो मृत्यु से। बस जागो! जो जाग गया उसने जीवन का परम धन पा लिया है।
ओशो
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