ओशो : आध्यात्मिक खिलौने।

आध्यात्मिक खिलौने।

मेरे पास बहुत लोग आते हैं और वे कहते हैं कि अब मुझे नीला प्रकाश दिखलाई पड़ रहा है, तो इस चिन्ह का क्या अर्थ है? मैं कितने आगे बढ़ा? नीले प्रकाश से कुछ भी न होगा क्योंकि तुम्हारा क्रोध लाल रोशनी प्रकट कर रहा है। मूलभूत मनोवैज्ञानिक परिवर्तन अर्थपूर्ण है। अतः खिलौनों से राजी मत हो जाना। ये सिर्फ खिलौने हैं-आध्यात्मिक खिलौने। तुम्हें नीला प्रकाश दिखाई पड़े तो तुम कोई परमहंस नहीं हो जाओगे।

ये सब चीजें साध्य नहीं हैं। संबंधों में देखें कि क्या हो रहा है। अब तुम अपनी पत्नी के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हो? इसे देखो। क्या उसमें कुछ परिवर्तन आया? वह परिवर्तन ही अर्थपूर्ण है। तुम अपने नौकर के साथ कैसा बर्ताव करते हो? क्या उसमें बदलाहट हुई? वह बदलाहट ही महत्वपूर्ण है। यदि उसमें कोई परिवर्तन नहीं है, तो फेंको अपने नीले प्रकाश को। उससे कुछ भी न होगा। तुम धोखा दे रहे हो, और तुम धोखा देते रह सकते हो। इन चालाकियों को तो आसानी से पाया जा सकता है।

इसीलिए तथाकथित धार्मिक आदमी अपने को धार्मिक समझने लगता है। क्योंकि अब वह यह और वह देखने लगता है, और वह स्वयं जैसा था वैसा ही रहता है। यहाँ तक कि वह पहले से भी बुरा हो जाता है। तुम्हारी प्रगति को तुम्हारे संबंधों में देखना चाहिये। संबंध ही दर्पण हैं। वह उसमें तुम अपना चेहरा देखो। सदैव स्मरण रखो कि संबंध ही दर्पण है। यदि तुम्हारा ध्यान गहरा जा रहा है तो तुम्हारे संबंध भिन्न हो जायेंगे-समग्ररूप से भिन्न हो जायेंगे। प्रेम तुम्हारे संबंधों का आधार हो जायेगा, न कि हिंसा। अभी जैसे भी तुम हो, हिंसा ही आधारभूत स्वर है। यहाँ तक कि जब तुम किसी की ओर देखोगे भी तो तुम्हारा देखना भी हिंसा के ढंग से होगा। लेकिन वह हमारी आदत हो गई है।

ध्यान मेरे लिये बच्चों का खेल नहीं है। वह एक गहरा रूपान्तरण है। इस रूपान्तरण को कैसे जाना जाये? उसकी झलक हर क्षण तुम्हें अपने संबंधों में मिलेगी। क्या तुम किसी के मालिक बनना चाहते हो? तो फिर तुम हिंसक हो। कैसे कोई किसी का मालिक बन सकता है? क्या तुम किसी पर शासन करना चाहते हो? तो तुम हिंसक हो। कैसे कोई किसी पर शासन कर सकता है? प्रेम शासन नहीं कर सकता, प्रेम किसी का मालिक बनना नहीं चाहता।

इसलिए जो भी तुम कर रहे हो, सजग रहो, देखो उसे और ध्यान करते चले जाओ। जल्दी ही तुम्हें परिवर्तन का पता चल जायेगा। अब संबंधों में मालकियत नहीं होगी। धीरे-धीरे मालकियत खो जायेगी। और जब मालकियत नहीं रहती तो संबंध का अपना ही एक सौंदर्य होता है। जब मालकियत का भाव होता है, तो हर चीज गंदी हो जाती है, कुरूप तथा अमानवीय हो जाती है। लेकिन हम इतने धोखेबाज हैं कि हम अपने संबंधों के दर्पण में अपने को नीं देखेंगे क्योंकि वहां हमारा असली चेहरा दिखाई पड़ जायेगा। अतः हम अपने संबंधों की तरफ से आँखें बंद कर लेते हैं और सोचते रहते हैं कि कुछ भीतर दिखाई पड़नेवाला है।

तुम भीतर कुछ भी नहीं देख सकते। सबसे प्रथम, तुम अपना भीतरी रूपान्तरण अपने संबंधों में देखोगे, और तब तुम गहरे जाओगे। केवल तभी तुम्हें भीतर का अनुभव होगा। लेकिन हमारे अपने को देखने का निश्चित ढंग है। हम अपने संबंधों में बिल्कुलझांकना नहीं चाहते क्योंकि तब नग्न चेहरा ऊपर आ जाता है।

ओशो

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