ओशो : एक फकीर परमात्मा को उपलब्ध हुआ। जब वह उपलब्ध हुआ, लोगों ने पूछा, कैसे पाया? उसने कहा, मैं तुम्हें अपनी कहानी कह देता हूं...
एक फकीर परमात्मा को उपलब्ध हुआ। जब वह उपलब्ध हुआ, लोगों ने पूछा, कैसे पाया? उसने कहा, मैं तुम्हें अपनी कहानी कह देता हूं...
मेरे पास बहुत धन था, बहुत संपदा थी। और मैं परमात्मा को पाने की आकांक्षा करता था। एक रात मैंने देखा, एक देवदूत उतरा मेरे स्वप्न में और कहने लगा, तुम किस चेष्टा में लगे हो? तो मैंने कहा, मैं परमात्मा को खोज रहा हूं, बस, उसीकी तरफ जा रहा हूं।
तो उस देवदूत ने कहा, इतना बोझ-सामान लेकर तुम न पहुंच पाओगे। ये तो बहुत भारी है। तुम आकाश में उड़ न सकोगे इसके कारण। ये सब छोड़ दो, तब तुम्हारी यात्रा हो सकती है। ऊंचाई पर चढ़ना हो तो बोझ लेकर नहीं जाया जाता। और परमात्मा से तो ऊंची कोई ऊंचाई नहीं। छोड़ो बोझ।
सुबह जागा तो, उस फकीर ने अपने शिष्यों को कहा कि मैं सुबह जागा तो मैंने सब धन छोड़ दिया, सिर्फ एक लंगोटी बचा ली। रात फिर सपना आया, फिर वही देवदूत। उसने पूछा, अब क्या इरादे हैं? तो मैंने कहा, जो तुमने कहा वह मैंने पूरा किया। सब छोड़ दिया। उस देवदूत ने कहा, लेकिन यह लंगोटी तुमने कैसे बचा ली?
सब में लंगोटी न आयी।
तो मैं तुमसे कहता हूं, तुम्हारा सब लंगोटी में बज जाएगा। तुम्हारी जीतनी पकड़ थी धन पर, मकान पर, वह सारी की सारी पकड़ अब लंगोटी में आ जाएगी। मुट्ठी तो तुम्हारी वही रहेगी। तुमने हीरे छोड़ दिए, लंगोटी पकड़ ली। इससे न चलेगा। लंगोटी की क्या जरूरत परमात्मा के पास ले जाने की?
नग्न उसने तुम्हें भेजा, नग्न वह तुम्हें स्वीकार कर लेगा। वह कोई जमीन के कानून थोड़े ही मानता है कि कहां नंगे चले आ रहे हो? नहीं तो महावीर को प्रवेश ही नहीं करने देता। डायोजनीज को बाहर से निकाल देता।
उसने तुम्हें पैदा किया है, उससे क्या छिपाना है? लंगोटी किसलिए? या तो तुम कुछ छिपाना चाहते हो, या अपने मोह को छोड़ नहीं पाते, चलो लंगोटी पर ही लटका लेंगे।
इतनी खूंटी भी काफी है। यह भी छोड़ो। जिसको उसकी यात्रा करनी है, उसे परिपूर्ण शून्य होकर जाना होता है।
दूसरे दिन सुबह फकीर ने लंगोटी भी छोड़ दी। रात सोया, फिर स्वप्न पाया, देवदूत दिखायी पड़ा। उसने पूछा,अब क्या इरादे हैं? फकीर ने कहा, अब क्या इरादा है! वहीं जा रहा हूं, परमात्मा को खोजने को। उसने कहा, अब जाने की कोई जरूरत नहीं। अब तुम जहां हो वहीं रहो, परमात्मा खुद आ जाएगा।
अब तक जाने की जरूरत थी, क्योंकि तुम बोझ से लदे थे। इसलिए मैंने तुमसे कहा, बोझ छोड़ो अगर जाना है। और अब तुमने सभी छोड़ दिया। अब जाने का कोई सवाल ही नहीं है।
अब उसे जब आना होगा, आ जाएगा?
जिस दिन तुम्हारी पात्रता पूरी होती है, वह आ जाता है। उसमें क्षण भर देर नहीं होती। देर का कोई उपाय नहीं है।
ओशो
बिन धन परत फुहार
प्रवचन 7
मेरे पास बहुत धन था, बहुत संपदा थी। और मैं परमात्मा को पाने की आकांक्षा करता था। एक रात मैंने देखा, एक देवदूत उतरा मेरे स्वप्न में और कहने लगा, तुम किस चेष्टा में लगे हो? तो मैंने कहा, मैं परमात्मा को खोज रहा हूं, बस, उसीकी तरफ जा रहा हूं।
तो उस देवदूत ने कहा, इतना बोझ-सामान लेकर तुम न पहुंच पाओगे। ये तो बहुत भारी है। तुम आकाश में उड़ न सकोगे इसके कारण। ये सब छोड़ दो, तब तुम्हारी यात्रा हो सकती है। ऊंचाई पर चढ़ना हो तो बोझ लेकर नहीं जाया जाता। और परमात्मा से तो ऊंची कोई ऊंचाई नहीं। छोड़ो बोझ।
सुबह जागा तो, उस फकीर ने अपने शिष्यों को कहा कि मैं सुबह जागा तो मैंने सब धन छोड़ दिया, सिर्फ एक लंगोटी बचा ली। रात फिर सपना आया, फिर वही देवदूत। उसने पूछा, अब क्या इरादे हैं? तो मैंने कहा, जो तुमने कहा वह मैंने पूरा किया। सब छोड़ दिया। उस देवदूत ने कहा, लेकिन यह लंगोटी तुमने कैसे बचा ली?
सब में लंगोटी न आयी।
तो मैं तुमसे कहता हूं, तुम्हारा सब लंगोटी में बज जाएगा। तुम्हारी जीतनी पकड़ थी धन पर, मकान पर, वह सारी की सारी पकड़ अब लंगोटी में आ जाएगी। मुट्ठी तो तुम्हारी वही रहेगी। तुमने हीरे छोड़ दिए, लंगोटी पकड़ ली। इससे न चलेगा। लंगोटी की क्या जरूरत परमात्मा के पास ले जाने की?
नग्न उसने तुम्हें भेजा, नग्न वह तुम्हें स्वीकार कर लेगा। वह कोई जमीन के कानून थोड़े ही मानता है कि कहां नंगे चले आ रहे हो? नहीं तो महावीर को प्रवेश ही नहीं करने देता। डायोजनीज को बाहर से निकाल देता।
उसने तुम्हें पैदा किया है, उससे क्या छिपाना है? लंगोटी किसलिए? या तो तुम कुछ छिपाना चाहते हो, या अपने मोह को छोड़ नहीं पाते, चलो लंगोटी पर ही लटका लेंगे।
इतनी खूंटी भी काफी है। यह भी छोड़ो। जिसको उसकी यात्रा करनी है, उसे परिपूर्ण शून्य होकर जाना होता है।
दूसरे दिन सुबह फकीर ने लंगोटी भी छोड़ दी। रात सोया, फिर स्वप्न पाया, देवदूत दिखायी पड़ा। उसने पूछा,अब क्या इरादे हैं? फकीर ने कहा, अब क्या इरादा है! वहीं जा रहा हूं, परमात्मा को खोजने को। उसने कहा, अब जाने की कोई जरूरत नहीं। अब तुम जहां हो वहीं रहो, परमात्मा खुद आ जाएगा।
अब तक जाने की जरूरत थी, क्योंकि तुम बोझ से लदे थे। इसलिए मैंने तुमसे कहा, बोझ छोड़ो अगर जाना है। और अब तुमने सभी छोड़ दिया। अब जाने का कोई सवाल ही नहीं है।
अब उसे जब आना होगा, आ जाएगा?
जिस दिन तुम्हारी पात्रता पूरी होती है, वह आ जाता है। उसमें क्षण भर देर नहीं होती। देर का कोई उपाय नहीं है।
ओशो
बिन धन परत फुहार
प्रवचन 7
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