ओशो : " हमें उसका ही पता चलता है जिससे हम छुट जाते है, जिससे हम टूट जाते हैं "


" हमें उसका ही पता चलता है जिससे हम छुट जाते है, जिससे हम टूट जाते हैं " - ओशो

दास गुलाल चोर धरि मरिलौं, जांब न मथुरा-कासी।। झरत दसहुं दिस मोती! आंखें हों तो परमात्मा प्रति क्षण बरस रहा है। आंखें न हों तो पढ़ो कितने ही शास्त्र, जाओ काबा, जाओ काशी, जाओ कैलाश, सब व्यर्थ है। आंख है, तो अभी परमात्मा है-यहीं! हवा की तरंग-तरंग में, पक्षियों की आवाजों में, सूरज की किरणों में, वृक्षों
के पत्तों में! परमात्मा का कोई प्रमाण नहीं है। हो भी नहीं सकता। परमात्मा एक अनुभव है। जि से हो, उसे हो। किसी दूसरे को समझाना चाहे तो भी समझा न सके। शब्दों में आता नहीं, तका में बंधता नहीं। लाख करो उपाय, गाओ कितने ही गीत, छूट-छूट जाता है । फेको कितने ही जाल, जाल वापिस लौट आते हैं। उस पर कोई पकड़ नहीं बैठती। ऐसे सब जगह वही मौजूद है। जाल फेकने वाले में, जाल में सब में वही मौजूद है।

मगर उसकी यह मौजदगी इतनी घनी है और इतनी सनातन है. इस मौजदगी से तम कभी अलग हुए नहीं, इसलिए इसकी प्रतीति नहीं होती। जसे तुम्हारे शरीर में खून दौड़ रहा है, पता ही नहीं चलता! तीन सौ वर्ष पहले तक चिकित्सकों को यह पता ही नहीं था कि खुन शरीर में परिभ्रमण करता है। यही ख्या ल था कि भरा हुआ है। जैसे कि गगरी में पानी भरा हो। यह तो तीन सौ वपा में प ता चला कि खुन गतिमान है। हजारों वर्ष तक यह धारणा रही कि पृथ्वी स्थिर है।

जो लोग घोषणा करते हैं कि वेद में में सारा विज्ञान है, उनको ख्याल रखना चाहिए : वेदों में पृथ्वी को कहा है-'अचला '. जो चलती नहीं, हिलती नहीं, इलती नहीं। क्या खाक विज्ञान रहा होगा! अभी पृथ वी के अचला होने की धारणा है। अभी यह भी पता नहीं चला है कि पृथ्वी चलती है प्रतिपल चलती है। दोहरी गति है उसकी। अपनी कील पर घमती है-पहली गति: और दसरा-सूर्य के चारों तरफ परिभ्रमण करती है। मगर हम पृथ्वी पर है, इसलिए पृथ्वी की गति का पता कैसे चले? हम उसके अंग है। हम भी उसके साथ घूम रहे हैं । और भी शेष सब उसके साथ घूम रहा है। तो पता नहीं चलेगा। जैसे समझो यहां बैठे-बैठे अचानक कोई चमत्कार हो जाए और हम सब छ: इंच के ह ो जाएं, और हमारे साथ वृक्ष भी उसी अनुपात में छोटे हो जाएं, मकान भी उसी अनु पात में छोटा हो जाए, तो किसी को पता ही नहीं चलेगा कि हम छोटे हो गए है। क योकि पुराना अनुपात कायम रहेगा। तुम्हारे सिर से छप्पर की दरी उतनी ही रहेगी। जतनी पहले थी। तुम्हारा बेटा तुमसे उतना ही छोटा रहेगा जितना पहले था। वृक्ष त् मसे उतने ही ऊंचे रहेंगे जितने पहले थे। अगर सारी चीजे एक साथ छोटी हो जाएं. समान अनुपात में, तो किसी को कभी कानों-कान पता नहीं चलेगा। तुम जिस फुट अ र इंच से नापते हो, वह भी छोटा जो जाएगा न! वह भी बताएगा कि तुम छ: फीट के ही हो. जैसे पहले थे, वैसे ही अब भी हो।

कहते हैं मछली को सागर का पता नहीं चलता। चले भी कैसे? सागर में ही पैदा हुई , सागर में ही बड़ी हई, सागर में ही एक दिन विसर्जित हो जाएगी। लेकिन मछली को सागर का कभी-कभी पता चल सकता है। कोई मछुआ खींच ले उसे, डाल दे तट पर, तप्त रेत पर, तड़फे, तब उसे बोध आए, तब उसे समझ आए। सागर से टूटक र पता चले कि मैं सागर में थी और अब सागर में नहीं हूं। जब तक सागर में थी त ब तक पता नहीं चला कि मैं सागर में हूं। मन के इस नियम को ठीक से समझ लेना। हमें उसका ही पता चलता है जिससे हम छुट जाते है, जिससे हम टूट जाते हैं। जिससे हम भिन्न हो जाते है। उसका हमें पता ही नहीं चलता जिसके साथ हम जुड़े ही रहते हैं, जड़े ही रहते हैं। कहते हैं, मरते व क्त लोगों को पता चलता है कि हम जीवित थे। और यह वात ठीक ही है। क्योकि जीवन जब था तो तुम सागर में थे। मृत्यु के वक्त मौत का मछुआ तुम्हें खींच लेता है, डाल देता है तट पर तड़फने को, तब पता चलता है कि अरे, हाय कितना चूक गए! कैसा अद्भुत जीवन था! अब सब यादें आती हैं।



ओशो


सौजन्य : https://oshomom.blogspot.com

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