ओशो : भगवान, आखिर आप कहते वही हैं जो आपको कहना है। फिर इतर बुद्धों की खूंटी का सहारा क्यों लेते हैं ? अपनी बात सीधी ही हमसे क्यों नहीं कहते? हमें उलझाते क्यों हैं?
हमें उलझाते क्यों हैं ?
भगवान, आखिर आप कहते वही हैं जो आपको कहना है। फिर इतर बुद्धों की खूंटी का सहारा क्यों लेते हैं? अपनी बात सीधी ही हमसे क्यों नहीं कहते? हमें उलझाते क्यों हैं?
बहुत सी बातें समझनी होंगी। पहली बात तो यह है—हजरत प्यार है, प्यार को प्रश्न मत बनाओ!
बुद्धों से लगाव है। लगाव के लिए कोई उत्तर नहीं। जैसे तुम्हें कोई स्त्री पसंद आ जाए, मन भा जाए, कहो कि सुंदर है, बहुत सुंदर है, सिद्ध न कर सकोगे।
प्रेम तर्क से गहरा है। कोई पूछेगा, क्यों प्रेम करते हो, उत्तर न दे सकोगे। जहां तक प्रश्न और उत्तर जाते हैं, उससे आगे की बात है।
बुद्धों से मुझे लगाव है। जब संसार से लगाव हट जाता है, तो लगाव मिट थोड़े ही जाता है। लगाव मिटेगा कैसे? लगाव तो जीवन की ऊर्जा है। संसार से हटता है तो बुद्धों पर लग जाता है। बाजार से हटता है तो मंदिर में खिल जाता है। कामवासना से मुक्त होता है, करुणा बन जाता है।
लगाव जाने वाला नहीं है। तुम्हारे जीवन का स्वभाव है। ऐसा ही समझो कि नीचे की मंजिल पर नल लगा हो, टोंटी बंद कर दो, तो ऊपर की मंजिल पर पानी चढ़ जाता है। नीचे की मंजिल की टोंटी खोल दो, ऊपर की मंजिल का पानी बंद हो जाता है।
वस्तुओं से लगाव है, अभी तुम्हें चैतन्य का दर्शन नहीं हुआ। अभी बाहर—बाहर भटकता है तुम्हारा लगाव, अभी अंतर्यात्रा शुरू नहीं हुई। जब होगी तब तुम समझोगे। फिर तुम बुद्धों के प्रेम में जीते हो। उन बुद्धों के जो हुए, उन बुद्धों के जो हैं, उन बुद्धों के जो होंगे कठिन है उनको समझाना, जिनकी नजर अभी धन, पद, यश में लगी है। कठिन है उनको समझाना, जिनकी नजरें अभी बाहर भटक रही हैं, वस्तुओं से उलझी हैं। लेकिन एक बार तुम्हें कहीं से भी बुद्धों की झलक मिल जाए, किसी के द्वारा भी मिल जाए—उसी को तो हम गुरु कहते हैं, जिसके माध्यम से बुद्धों को श्रृंखला तुम्हारे लिए खुल जाए। गुरु तुम्हें अपने से थोड़े ही जोड़ता है, बुद्धों से जोड़ देता है। गुरु तुम्हें उस महाश्रृंखला से जोड़ देता है, जो जाग्रतपुरुषों की है। उस दीपमालिका से, जहां बुद्ध का दीया जलता है—महावीर का, कृष्ण का, क्राइस्ट का, जरथुस्त्र का, लाओत्सु का। यह पंक्ति दीयों की बड़ी प्यारी है।
इन सभी दीयों में ज्योति एक है, पर सभी दीयों के ढंग अलग हैं। हर दीए का रंग अलग है, शैली अलग है, अंदाज अलग है। अंदाज भी बड़े प्यारे हैं। लाओत्सु को समझो, बड़ा प्यारा अंदाज है। फिर कोई दूसरा उस अंदाज को न पा सका। अगर मैं तुम्हें अपने पर सीमित रखूं तो तुम्हें दीन बनाऊंगा। मेरा अपना अंदाज है। रोशनी वही है, मेरा अपना दीया है। पर और भी दीए हुए हैं।
और भी हैं सुखनवर बहुत अच्छे
मैं तुम्हें अपने पर नहीं रोकना चाहता। मैं तुम्हारे लिए द्वार बनूं दीवार न बनूं। तुम मुझसे प्रवेश करो, मुझ पर रुको मत। तुम मुझसे छलांग लो, तुम उड़ो आकाश में। मैं तुम्हें पंख देना चाहता हूं, तुम्हें बांध नहीं लेना चाहता। इसीलिए तुम्हें सारे बुद्धों का आकाश देता हूं।
ओशो
एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-053)
साक्षीभाव : परम सूत्र—(प्रवचन-तरैपनवां)
भगवान, आखिर आप कहते वही हैं जो आपको कहना है। फिर इतर बुद्धों की खूंटी का सहारा क्यों लेते हैं? अपनी बात सीधी ही हमसे क्यों नहीं कहते? हमें उलझाते क्यों हैं?
बहुत सी बातें समझनी होंगी। पहली बात तो यह है—हजरत प्यार है, प्यार को प्रश्न मत बनाओ!
बुद्धों से लगाव है। लगाव के लिए कोई उत्तर नहीं। जैसे तुम्हें कोई स्त्री पसंद आ जाए, मन भा जाए, कहो कि सुंदर है, बहुत सुंदर है, सिद्ध न कर सकोगे।
प्रेम तर्क से गहरा है। कोई पूछेगा, क्यों प्रेम करते हो, उत्तर न दे सकोगे। जहां तक प्रश्न और उत्तर जाते हैं, उससे आगे की बात है।
बुद्धों से मुझे लगाव है। जब संसार से लगाव हट जाता है, तो लगाव मिट थोड़े ही जाता है। लगाव मिटेगा कैसे? लगाव तो जीवन की ऊर्जा है। संसार से हटता है तो बुद्धों पर लग जाता है। बाजार से हटता है तो मंदिर में खिल जाता है। कामवासना से मुक्त होता है, करुणा बन जाता है।
लगाव जाने वाला नहीं है। तुम्हारे जीवन का स्वभाव है। ऐसा ही समझो कि नीचे की मंजिल पर नल लगा हो, टोंटी बंद कर दो, तो ऊपर की मंजिल पर पानी चढ़ जाता है। नीचे की मंजिल की टोंटी खोल दो, ऊपर की मंजिल का पानी बंद हो जाता है।
वस्तुओं से लगाव है, अभी तुम्हें चैतन्य का दर्शन नहीं हुआ। अभी बाहर—बाहर भटकता है तुम्हारा लगाव, अभी अंतर्यात्रा शुरू नहीं हुई। जब होगी तब तुम समझोगे। फिर तुम बुद्धों के प्रेम में जीते हो। उन बुद्धों के जो हुए, उन बुद्धों के जो हैं, उन बुद्धों के जो होंगे कठिन है उनको समझाना, जिनकी नजर अभी धन, पद, यश में लगी है। कठिन है उनको समझाना, जिनकी नजरें अभी बाहर भटक रही हैं, वस्तुओं से उलझी हैं। लेकिन एक बार तुम्हें कहीं से भी बुद्धों की झलक मिल जाए, किसी के द्वारा भी मिल जाए—उसी को तो हम गुरु कहते हैं, जिसके माध्यम से बुद्धों को श्रृंखला तुम्हारे लिए खुल जाए। गुरु तुम्हें अपने से थोड़े ही जोड़ता है, बुद्धों से जोड़ देता है। गुरु तुम्हें उस महाश्रृंखला से जोड़ देता है, जो जाग्रतपुरुषों की है। उस दीपमालिका से, जहां बुद्ध का दीया जलता है—महावीर का, कृष्ण का, क्राइस्ट का, जरथुस्त्र का, लाओत्सु का। यह पंक्ति दीयों की बड़ी प्यारी है।
इन सभी दीयों में ज्योति एक है, पर सभी दीयों के ढंग अलग हैं। हर दीए का रंग अलग है, शैली अलग है, अंदाज अलग है। अंदाज भी बड़े प्यारे हैं। लाओत्सु को समझो, बड़ा प्यारा अंदाज है। फिर कोई दूसरा उस अंदाज को न पा सका। अगर मैं तुम्हें अपने पर सीमित रखूं तो तुम्हें दीन बनाऊंगा। मेरा अपना अंदाज है। रोशनी वही है, मेरा अपना दीया है। पर और भी दीए हुए हैं।
और भी हैं सुखनवर बहुत अच्छे
मैं तुम्हें अपने पर नहीं रोकना चाहता। मैं तुम्हारे लिए द्वार बनूं दीवार न बनूं। तुम मुझसे प्रवेश करो, मुझ पर रुको मत। तुम मुझसे छलांग लो, तुम उड़ो आकाश में। मैं तुम्हें पंख देना चाहता हूं, तुम्हें बांध नहीं लेना चाहता। इसीलिए तुम्हें सारे बुद्धों का आकाश देता हूं।
ओशो
एस धम्मो सनंतनो-(प्रवचन-053)
साक्षीभाव : परम सूत्र—(प्रवचन-तरैपनवां)
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