ओशो : स्वयं में उत्सुक हो, तभी केवल धर्म का जन्म होता है।
स्वयं में उत्सुक हो, तभी केवल धर्म का जन्म होता है।
तुम्हारे पास तार्किक मन है, पश्चिमी ढंग है-सोचने का, यूनानी रुख है और तब खोज है सत्य की-खो है कि क्या सत्य है। तर्क सत्य की खोज करता है, कि सत्य क्या है।
हिन्दूओं ने सत्य की कभी इतनी चिन्ता नहीं की। कभी भी नहीं। मोक्ष के लिये आतुर रहे। उन्होंने बार-बारयही पूछा कि मोक्ष क्या है। मुक्ति क्या है? न कि सत्य क्या है। और वे कहते हैं कि यदि कोई सत्य की खोज भी कर रहा है, तो वह भी मुक्ति के लिये ही, तब वह भी साधन की तरह है। परन्तु खोज सत्य के लिये नहीं है।
हिन्दू कहते हैं कि जिससे मुक्ति हो, वही पाने योग्य है। यदि वह सत्य है, तोवह ठीक है। किन्तु बुनियादी रूप से खोज मोक्ष के लिये ही है। तुम इस तरह की खोज यूनानी दर्शन में नहीं पा सकते। उसमें किसी का रस नहीं है-न प्लेटो का और न ही अरस्तु का, कोई भी मोक्ष में उत्सुक नहीं है। उनका रस इस बात के जान लेने में है कि सत्य क्या है?
बुद्ध से पूछें, महावीर से पूछें, कृष्ण से पूछें, वस्तुतः वे सत्य में उत्सुक नहीं हैं, उनका संबंध मुक्ति से है-कि मनुष्य चेतना किस तरह पूर्ण मुक्ति को प्राप्त हो जाये। यह फर्क मन के आधारभूत भेद के कारण ह। यदि तुम निरीक्षक हो, तो बाहर के संसार में ज्यादा उत्सुक होओगे और स्वयं में कम, क्योंकि स्वयं के तुम अवलोकनकर्ता नहीं हो सकते। मैं वृक्षों को देख सकता हूँ, मैं इन पत्थरों को देख सकता हूँ, मैं दूसरे लोगों को देख सकता हूँ किन्तु मैं अपने को ही नहीं देख सकता क्योंकि मैं अपने से जुड़ा हूँ। एक अन्तराल, एक गैप नहीं है।
इसलिए पश्चिमी मन स्वयं से उत्सुक नहीं रहा। वह दूसरों में उत्सुक रहा, जब तुम दूसरों में उत्सुक होते हो तब विज्ञान विकसित होता है। यदि तुम वृक्षों में उत्सुक हो, तो तुम उनके बारे में एक विज्ञान निर्मित कर लोगे। यदि तुम्हारा रस पदार्थ में है, तो तुम भौतिक-विज्ञान को पैदा कर लोगे। यदि तुम्हारी उत्सुकता किसी और चीज में है, तो तुम्हारी उस खोज से एक नये विज्ञान का जन्म होगा।
यदि तुम स्वयं में उत्सुक हो, तभी केवल धर्म का जन्म होता है। किन्तु स्वयं के साथ एक बुनियादी समस्या खड़ी होती है : कि तुम अपने से अलग देखने वाले नहीं हो सकते क्योंकि देने वाले भी तुम्हीं हो और जिसे देखा जाने वाला है, वह भी तुम्ही हो। इसलिए वह वैज्ञानिक तटस्थता, वह दूरी नहीं रखी जा सकती। वहाँ तुम अकेले हो। और जो भी तुम करते हो, वह विषयीगत है, तुम्हारे भीतर है, विषयगत नहीं है।
ओशो
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