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Showing posts from April, 2020

ओशो : मनुष्य के सभी प्रश्नों का एकमात्र उत्तर है, ध्यान.

मनुष्य के सभी प्रश्नों का एकमात्र उत्तर है, ध्यान... चाहे वह विषाद हो चाहे वह हताशा हो चाहे वह उदासी हो चाहे वह अर्थहीनता हो चाहे वह सन्ताप हो... समस्यायें कई हो सकती हैं लेकिन उत्तर एक ही है ध्यान ध्यान ध्यान.

Osho on Education

Osho on Education:- Our whole education is rotten. It certainly makes you clerks, stationmasters, postmen, police commissioners. It gives you a livelihood, but it does not give you life, and it does not give you love. One-third of our education should be concerned with livelihood; one-third of our education should be concerned with our well-being — body, health, ways to stay younger and live longer. And one-third — the last and the most important — should be concerned with love, with death, and the secrets of life itself. All education remains part of the mind; it does not make you more alert, more conscious, it simply fills you with information. It treats you like a computer. The society’s whole interest is in how to exploit you, how to enslave you, how to use you in a more efficient way, almost like a machine. It gives you all the education just for these hidden, secret aims. It prevents you from knowing anything about meditation. This is what our education goes on tea...

ओशो : मन की प्रसन्नता को साधो।

ओशो-गीता दर्शन - भाग –8 मन की प्रसन्नता को साधो। जितने तुम मन को प्रसन्न कर सकोगे, तुम पाओगे कि तुम उतने ही मन के पार जाने लगे। मन की प्रसन्नता मन के पार ले जाने का उपाय है। मन की प्रसन्नता ऐसे है, जैसे फूल की गंध। फूल तो पीछे पड़ा रह जाता है, गंध ऊपर उठ जाती है। जब तुम्हारा मन प्रसन्न होता है, मन तो नीचे पड़ा रह जाता है, प्रसन्नता की गंध ऊपर उठ जाती है। सिर्फ प्रसन्नचित्त लोगों ने ही परमात्मा को जाना है, वह नाचते हुए लोगों का अनुभव है। उदास, बीमार, रुग्णचित्तों का अनुभव नहीं है। क्योंकि परमात्मा यानी परम उत्सव। प्रसन्न होकर तैयारी करो। नाचने का थोड़ा अभ्यास करो; थोड़े पैरों में अर बांधो, कंठ को मधुर करो, गीत को गुंजने दो। क्योंकि उस परम उत्सव में तुम तभी सम्मिलित किए जा सकोगे, जब तुम्हारी थोड़ी तैयारी होगी। मन की प्रसन्नता और शात भाव…….। क्योंकि मन की प्रसन्नता उथली भी हो सकती है। जैसे बाजार में खड़े सड्कों पर लोग हंसते हैं। वह हंसना उथला है। उसमें कोई गहराई नहीं है। वह ऐसे ही है, जैसे छिछली नदी में शोरगुल होता है, कंकड़—पत्थरों में आवाज होती है। और गहरी नदी में सब शात हो जाता है।...

ओशो : ध्यान विधि ! विपरीत विचार!

ध्यान विधि ! विपरीत विचार! यह एक सुंदर व उपयोगी विधि है। उदाहरण के लिए- यदि आप बहुत असंतुष्ट महसूस कर रहे हैं, तो उसके विपरीत संतोष का मनन करें संतोष क्या है? एक संतुलन लाएं। अगर आपके मन में क्रोध उठ रहा है, तो करुणा को ले आएं, करुणा के बारे में विचार करें। और, तुरंत आपकी भाव दशा बदलने लगेगी, क्योंकि दोनों एक ही हैं, विपरीत भी वही ऊर्जा है। जैसे ही आप विपरीत भाव-दशा को ले आते हैं, तो वह पहली भव-दशा को पी जाती है, अपने में समाहित कर लेती है। तो अगर क्रोध हो तो करुणा पर मनन करें। एक काम करें : बुद्ध की एक मूर्ति रख लें, क्योंकि बुद्ध की मूर्ति करुणा की मूर्ति है। जब भी क्रोध उठे, अपने कमरे में चले जाएं, बुद्ध को देखें, बुद्ध की तरह बैठ जाएं और करुणा का भाव करें। अचानक ही आप देखेंगे कि आपके भीतर एक रूपांतरण होने लगा है। क्रोध विलीन होने लगा, उत्तेजना चली गई, करुणा पैदा होने लगी। और यक कोई दूसरी ऊर्जा नहीं है। वही ऊर्जा है- वही क्रोध वाली ऊर्जा- लेकिन इसका गुणधर्म बदल गया, यह ऊपर उठने लगी है। !! ओशो !! [ध्यान विज्ञान] ध्यान ...

ओशो : जिबरिश - नो माइंड ध्यान विधि

जिबरिश - नो माइंड ध्यान विधि देखना, सुनना और सोचना यह तीन महत्वपूर्ण गतिविधियां हैं। इन तीनों के घालमेल से ही चित्र कल्पनाएं और विचार निर्मित होते रहते हैं। इन्हीं में स्मृतियां, इच्छाएं, कुंठाएं, भावनाएं, सपने आदि सभी 24 घंटे में अपना-अपना किरदार निभाते हुए चलती रहती है। यह निरंतर चलते रहना ही बेहोशी है और इसके प्रति सजग हो जाना ही ध्यान है। साक्ष‍ी हो जाना ही ध्यान है। ओशो कहते हैं कि अंग्रेजी का 'जिबरिश' शब्द 'जब्बार' नाम के एक सूफी सन्त से बना है। जब्बार से जब भी कोई कुछ सवाल पूछता था तो वह अक्सर अनर्गल, अनाप-शनाप भाषा में उसका जवाब देता था। वे इस भांति बोलते थे कि कोई समझ नहीं पाता था कि वे क्या बोल रहे हैं। इसलिए लोगों ने उनकी भाषा को 'जिबरिश' नाम दे दिया- जब्बार से जिबरिश (Gibberish)। जिबरिश का अर्थ होता है - अस्पष्ट उच्चारण/अर्थहीन बकवास। यह अर्थहीन बकवास ही आंतरिक बकवास को रोकती है। इससे मन का कूड़ा-करकट बाहर निकाला जा सकता है। सूफी फकीर जब्बार से लोग तरह-तरह के गंभीर सवाल पूछते और वह उसका जवाब इसी तरह देते थे। अर्थहीन शब्दों में लगातार वे लगभग च...

ओशो : मोह एक नशा है!

मोह एक नशा है! "मोह आवरण से युक्त योगी को सिद्धियां तो फलित हो जाती हैं, लेकिन आत्मज्ञान नहीं होता।" और यह व्यर्थ इतना महत्वपूर्ण हो गया है जीवन में कि जब तुम सार्थक को भी साधने जाते हो, तब भी सार्थक नहीं सधता, व्यर्थ ही सधता है। लोग ध्यान करने आते हैं, तो भी उनकी आकांक्षा को समझने की कोशिश करो तो बड़ी हैरानी होती है। ध्यान से भी वे व्यर्थ को ही मांगते हैं। मेरे पास वे आते हैं, वे कहते हैं कि ध्यान करना चाहता हूं, क्योंकि शारीरिक बीमारियां हैं। क्या आप आश्वासन देते हैं कि ध्यान करने से वे दूर हो जाएंगी? अच्छा होता, वे चिकित्सक के पास गए होते। अच्छा होता कि उन्होंने आदमी खोजा होता, जो शरीर की चिकित्सा करता। वे आत्मा के वैद्य के पास भी आते हैं तो भी शरीर के इलाज के लिए ही। वे ध्यान भी करने को तैयार हैं, तो भी ध्यान उनके लिए औषधि से ज्यादा नहीं है; और वह औषधि भी शरीर के लिए। मेरे पास लोग आते हैं, वे कहते हैं कि बड़ी कठिनाई में जीवन जा रहा है, धन की असुविधा है; क्या ध्यान करने से सब ठीक हो जाएगा? यह मोह का आवरण इतना घना है कि तुम अगर अमृत को भी खोजते हो तो जहर के लिए। ...

ओशो : संगठन और धर्म

संगठन और धर्म   धर्म का कोई भी संगठन नहीं होता है ; न हो सकता है । और धर्म के कोई भी संगठन बनाने का परिणाम धर्म को नष्ट करना ही होगा । धर्म नितांत वैयक्तिक बात है , एक-एक व्यक्ति के जीवन में घटित होती है ; संगठन और भीड़ से उसका कोई भी संबंध नहीं है । लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि और तरह के संगठन नहीं हो सकते हैं । सामाजिक संगठन हो सकते हैं , शैक्षणिक संगठन हो सकते हैं , नैतिक-सांस्कृतिक संगठन हो सकते हैं , राजनैतिक संगठन हो सकते हैं । सिर्फ धार्मिक संगठन नहीं हो सकता है । धार्मिक होना दूसरी ही बात है । उसके लिए किसी संगठन का सदस्य होने की जरूरत नहीं है । बल्कि सच तो यह है कि जो किसी संगठन का -- धार्मिक संगठन का --- सदस्य है , वह धार्मिक संगठन की सदस्यता उसके धार्मिक होने में निश्चित ही बाधा बनेगी । क्योंकि संगठन में होने का अर्थ संप्रदाय में होना है । संप्रदाय और धर्म विरोधी बातें हैं । संप्रदाय तोड़ता है , धर्म जोड़ता है । इस समाज में इतनी बीमारियां हैं , इतने रोग हैं , इतना उपद्रव है , इतनी कुरूपता है कि जो मनुष्य भी धार्मिक है , वह मनुष्य चुपचाप इस कुर...

ओशो : भीतर की यात्रा प्रारंभ कैसे की जाए ?

यात्रा का प्रारंभ तो पहले ही से हो चुका है, तुम्हें वह शुरू नहीं करना है। प्रत्येक व्यक्ति पहले से यात्रा में ही है। हमने अपने आपको यात्रा पथ के मध्य में ही पाया है। इसकी न तो कोई शुरुआत है और न कोई अंत। यह जीवन ही एक यात्रा है। जो पहली बात समझ लेने जैसी है वह यह है कि इसे प्रारंभ नहीं करना है, यह हमेशा से ही चली जा रही है। तुम यात्रा ही कर रहे हो। इसे केवल पहचानना है। अचेतन रूप से तुम यात्रा में ही हो, इसलिए यह महसूस होता है कि जैसे मानो तुम्हें उसका प्रारंभ करना है। इसे पहचानो, इसके बारे में सचेत हो जाओ केवल पहचान ही शुरुआत बन जाती है। जिस क्षण यह पहचान लेते हो, कि तुम हमेशा से ही गतिशील हो, और कहीं जा रहे हो, जाने— अनजाने इच्छापूर्वक या अनिच्छापूर्वक लेकिन तुम चले जा रहे हो. कोई महान शक्ति तुम्हारे अंदर निरंतर कार्य कर रही है परमात्मा ही तुममें खिल रहा है। वह निरंतर तुम्हारे अंदर कुछ न कुछ सृजन कर रहा है, इसलिए ऐसी बात नहीं, कि इसे कैसे शुरू करें। ठीक प्रश्न तो यह होगा। इसे कैसे पहचानें 7 वह तो यहां है, लेकिन वहां उसकी पहचान न हो सकी है। उदाहरण के लिए वृक्ष मर जाते हैं लेक...

ओशो : मन

मन संसार को दोष मत दो ! अपने मन को समझो। मन ही तुम्हारा असली संसार है। लेकिन मन की तो हम चिंता नहीं करते, मन को तो लिए फिरते है, मन को तो सजाते है, संसार को गालियां देते है। संसार जिसने तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ा नहीं। यह वृक्षों का संसार, यह चांद - तारों का संसार, ये आकाश में सूरज ये बदलियां, इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा ? यह विराट की अदभुत लीला, इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा ? इसको गाली देते हो, कहते हो, यह सब माया। और भीतर तुम्हारे जो माया का मूल स्रोत है, तुम्हारी कल्पनाओं का जाल, तुम्हारी आकांक्षाओं का जाल, तुम्हारी तृष्णाओं का अनंत - अनंत फैलाव, उसको गटके बैठे हो। उसको उगलो, उसको थूको, वही है भूल। मैं तुम्हारे मन को संसार कहता हूं। ओशो

ओशो : बुद्धत्व तुम्हारा जन्म सिद्ध अधिकार है। बस तुमसे एक घंटा मांगता हूं ।

बुद्धत्व तुम्हारा जन्म सिद्ध अधिकार है। बस तुमसे एक घंटा मांगता हूं   । तुम्हारी सारी शिक्षा, दीक्षा, तुम्हारा समाज, तुम्हारे संस्कार तुम्हें दौड़ना सिखाते हैं दूसरे के पीछे। महत्वाकांक्षा सिखाते हैं — धन के लिए, पद के लिए, प्रतिष्ठा के लिए, यश के लिए। दुर्भाग्य है हमारा कि अब तक हम एक ऐसा समाज भी पैदा कर सके, जो तुम्हें सिखाता हो राज की वे बातें कि कैसे तुम अपने को पहचान लोगे। और उससे बड़ी कोई प्रतिष्ठा नहीं है। और उससे बड़ी कोई अभीप्सा नहीं है। यह एक बहुत अनूठी दुनिया है। यहां बादशाहत से भरे हुए लोग भिखमंगे बने हुए घूम रहे हैं। जिन्हें सम्राट होना था, वे हाथ में भिखारी के पात्र लिए हुए घूम रहे हैं। थोड़ा सा प्रयास... लेकिन तुम्हारे समाज और तुम्हारे संस्कार तुम्हें डराते हैं। वे तुमसे कहते हैं स्वयं को जानना यह जन्मों में होता है, यह कभी—कभी होता है, यह किसी अवतारी पुरुष के जीवन में होता है, यह किसी तीर्थंकर के जीवन में होता है। यह कोई मसीहा, कोई पैगंबर, कोई ईश्वर का पुत्र...तुम तो एक आदमी हो।  तुम इस झंझट में मत पड़ जाना, तुम इस मुश्किल को हाथ में मत ले लेना। ...

ओशो : साधना ज़रूरी है ताकि आदतों की सूखी रेखाएं मिट सकें ।

साधना ज़रूरी है ताकि आदतों की सूखी रेखाएं मिट सकें क्रोध, नफरत, काम सब कर्म की सूखी रेखाएं है प्रत्येक पर निर्भर है कि जीवन का आप क्या करेंगे। जीवन निर्भर नहीं है, जीवन अवसर है। उसमें क्या करेंगे, यह आप पर निर्भर है। यह निर्भरता ही आपके आत्मवान होने का गौरव है। आपके पास आत्मा है, अर्थात चुनाव की शक्ति है कि आप चुने कि क्या करेंगे। और मजे की बात यह है कि हजारों चक्कर लगाए हों, तो सारे चक्कर इसी क्षण छोड़ सकते हैं, तोड़ सकते हैं। लेकिन मन लीस्ट रेजिस्टेंट की तरफ बहता है। घर में एक लोटा पानी गिरा दे। फर्श पर बह जाए, सूख जाए, पानी उड़ जाए; लेकिन एक सूखी रेखा फर्श पर छूट जाती है। पानी नहीं है जरा भी। कुछ भी मतलब नहीं है। फिर दुबारा पानी उस कमरे में डोल दें, सौ में से निन्यानबे मौके यह हैं कि पानी उसी सूखी रेखा को पकड़कर फिर बहेगा। क्योंकि लीस्ट रेसिस्टेंस है। उस सूखी रेखा पर धूल कम है। कमरे के दूसरे हिस्सों में धूल ज्यादा है। वहां जगह जरा आसानी से बहने की है। पानी वहीं से बहेगा। हम बहुत बार जो किए है, वहां - वहां सूखी रेखाएं बन गई है। उन रेखाओं को ही मनस - शास्त्र संस्कार कहता ह...

ओशो : जो मुक्त होना चाहता है, वह किसी को बांधेगा नहीं। बांधा कि आप फिर मुक्त नहीं हो सकते।

सुना है मैंने कि एक आदमी एक गाय को बांधकर अपने घर लौट रहा है।  फकीर हसन उसे रास्ते में मिल गया और हसन ने पूछा कि मेरे मित्र, मैं एक बात जानना चाहता हूं।  तुम गाय से बंधे हो कि गाय तुमसे बंधी है उस आदमी ने कहा, तू पागल मालूम होता है! यह भी कोई पूछने की बात है? जाहिर है कि गाय मुझसे बंधी है; मैं गाय को बांधकर ले जा रहा हूं। तो फकीर हसन ने कहा, एक काम कर।  अगर गाय तुझसे बंधी है, तो तू छोड़कर बता।  तू छोड़ दे।  फिर अगर गाय तेरे पीछे चले, तो हम समझें। उस आदमी ने कहा, अगर मैं छोड़ दूंगा, गाय भाग खड़ी होगी, मुझे उसके पीछे भागना पड़ेगा। तो फकीर हसन ने कहा, फिर तू ठीक से समझ ले। यह हाथ में जो रस्सी लिए है, इस धोखे में मत पड़ना। अगर गाय भागे, तो तू उसके पीछे भागेगा, गाय तेरे पीछे नहीं भागेगी। अगर तू गाय को छोड़ दे, तो गाय तेरा पता लगाती हुई नहीं आने वाली है, तू ही उसका पता लगाता हुआ जाएगा।  तो तू इस भ्रम में है कि तू गाय को बांधे हुए है। जिसे हम बांधते हैं, उससे हम बंध भी जाते हैं, जीवन का यह एक अनिवार्य नियम है।  इसलिए जो मुक्त होना चाहता है, वह किसी को बांध...

ओशो : जो चुनावरहित हो जाता, जो निर्विकल्प हो जाता, उसे आत्मा का दर्शन होता है।

रामकृष्ण के जीवन में बड़ी प्यारी घटना है। रामकृष्ण बचपन से ही ईश्वर की तरफ दौड़े हुए चित्त के व्यक्ति थे। मंदिर के सामने से निकलते थे तो फिर उनका घर पहुंचना मुश्किल हो जाता; वहीं नाचने लगते; वहीं लेट जाते, सीढ़ियों पर पड़े रहते। कोई राम का नाम ले दे, तो भाव में आ जाते। तो घर के लोग जानते थे कि यह लड़का संसार में नहीं जाएगा। कोई आशा नहीं थी। लेकिन फिर भी मां—बाप का फर्ज था, तो जब उम्र हुई तो उन्होंने पूछा कि राम—उनका नाम था गजाधर—शादी करोगे? सोचा था, रामकृष्ण इनकार कर देंगे। रामकृष्ण बहुत प्रफुल्लित हो गए। उन्होंने कहा, शादी कैसी होती है? जरूर करेंगे! घर के लोगों को भी सदमा हुआ, कि सोचा था कि यह संन्यासी वृत्ति का है, शादी नहीं करेगा, यह क्या हुआ! फिर लड़की की तलाश हुई। फिर लड़की खोजी गई। लड़की बहुत छोटी थी। कोई आठ—दस साल का अंतर था दोनों की उम्र में। रामकृष्ण लड़की को देखने गए। उनके साथ ही परिवार के और लोग गए। रामकृष्ण की माँ ने एक तीन रुपए रामकृष्ण के खीसे में रख दिए कि कोई जरूरत पड़े, खर्च इत्यादि। पास ही गांव था ऐसे। रामकृष्ण सज—धज कर—जैसा सजा— धजा दिया—पहुंच गए। लड़की बहुत प्यारी थी। रामकृ...

ओशो : मन वेश्या की तरह है ।

मन वेश्या की तरह है। किसी का नहीं है मन। आज यहां, कल वहां; आज इसका, कल उसका। मन की कोई मालकियत नहीं है। और मन की कोई ईमानदारी नहीं है। मन बहुत बेईमान है। वह वेश्या की तरह है। वह किसी एक का होकर नहीं रह सकता। और जब तक तुम एक के न हो सको, तब तक तुम एक को कैसे खोज पाओगे? न तो प्रेम में मन एक का हो सकता है; न श्रद्धा में मन एक का हो सकता है—और एक के हुए बिना तुम एक को न पा सकोगे। तो कहीं तो प्रशिक्षण लेना पड़ेगा—एक के होने का। इसी कारण पूरब के मुल्कों ने एक पत्नीव्रत को या एक पतिव्रत को बड़ा बहुमूल्य स्थान दिया। उसका कारण है। उसका कारण सांसारिक व्यवस्था नहीं है। उसका कारण एक गहन समझ है। वह समझ यह है कि अगर कोई व्यक्ति एक ही स्त्री को प्रेम करे, और एक ही स्त्री का हो जाए, तो शिक्षण हो रहा है एक के होने का। एक स्त्री अगर एक ही पुरुष को प्रेम करे और समग्र—भाव से उसकी हो रहे कि दूसरे का विचार भी न उठे, तो प्रशिक्षण हो रहा है; तो घर मंदिर के लिए शिक्षा दे रहा है; तो गृहस्थी में संन्यास की दीक्षा चल रही है। अगर कोई व्यक्त्ति एक स्त्री का न हो सके, एक पुरुष का न हो सके, फिर एक गुरु का भी न हो सक...

ओशो :जीवन की एक मात्र दीनता: वासना

जीवन की एक मात्र दीनता: वासना दुख के अभ्यासी हैं लोग। कामवासना एक बड़ा प्राचीन अभ्यास है—सनातन—पुरातन! जन्मों— जन्मों में उसका अभ्यास किया है। कभी उससे कुछ पाया नहीं, सदा खोया, सदा गंवाया; लेकिन अभ्यास रोएं—रोएँ में समा गया है।             आस्थित: परमाद्वैतं मोक्षार्थेउपि व्यवस्थित:। —वह जो मोक्ष के लिए तैयार है और वह जो परम अद्वैत में अपनी आस्था की घोषणा कर चुका है।   आश्चर्य कामवशगो विकल:केलिशिक्षया। केलिशिक्षया— पुरानी कामवासना की शिक्षा के कारण, अभ्यास के कारण! आश्चर्य कामवशगो विकल: केलिशिक्षया। —पुराने अभ्यास के कारण बार—बार विकल हो जाता है। मौत के क्षण में तक आदमी कामवासना के सपनों से भरा होता है। ध्यान करने बैठता है, तब भी कामवासना के विचार ही मन में दौड़ते रहते हैं। मंदिर जाता, मंदिर में बाहर से दिखाई पड़ता, भीतर से शायद वेश्यालय में हो। इसलिए अष्टावक्र कहते हैं, जनक, जल्दी मत कर। ये जाल बड़े पुराने हैं। तू ऐसा एक क्षण में मुक्त हो गया? अष्टावक्र यह नहीं कह रहे हैं कि तू मुक्त नहीं हुआ। अष्टावक्र की तो पूरी धारणा ही यही है कि तत्क्...

ओशो : प्रेम का हाथ जहां स्पर्श देता है,वहां अमृत की वर्षा शुरू हो जाती है।

प्रेम का हाथ जहां स्पर्श देता है,वहां अमृत की वर्षा शुरू हो जाती है। टालस्टाय एक दिन सुबह एक गांव की सडक से निकला।एक भिखारी ने हाथ फैलाया।टालस्टाय ने अपनी जेब तलाशे लेकिन जेब खाली थे।वह सुबह घूमने निकला था और पैसे नहीँ थे। उसने भिखारी को कहा ,मित्र ! क्षमा करो,मेरे पास पैसे नहीं हैं,तुम जरूर दुख मानोगे।लेकिन मैं मजबूरी में पड गया हूं।पैसे मेरे पास नहीं हैं।उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा,मित्र! क्षमा करो,पैसे मेरे पास नहीँ हैं।उस भिखारी ने कहा कोई बात नहीं।तुमने मित्र कहा,मुझे बहुत कुछ मिल गया।यू काल्ड मी ब्रदर,तुमने मुझे बंधु कहा!और बहुत लोगों ने मुझे अब तक पैसे दिए थे लेकिन तुमने जो दिया है,वह किसी ने भी नहीं दिया था।मैं बहुत अनुगृहीत हूं। एक शब्द प्रेम का -मित्र,उस भिखारी के हृदय में क्या निर्मित कर गया,क्या बन गया।टालस्टाय सोचने लगा।उस भिखारी का चेहरा बदल गया,वह दूसरा आदमी मालूम पडा ।यह पहला मौका था कि किसी ने उससे कहा था,मित्र।भिखारी को कौन मित्र कहता है? इस प्रेम के एक शब्द ने उसके भीतर एक क्रांति कर दी,वह दूसरा आदमी है।उसकी हैसियत बदल गयी,उसकी गरिमा बदल गयी,उसका व्यक्तित्व बदल ...

Osho : Eternal Darkness

Eternal Darkness BELOVED OSHO, WHAT DO YOU HAVE TO SAY ABOUT DARKNESS? I have much to say about darkness, because nobody has taken notice of the mystery that darkness is. Much has been said about light, almost nothing about darkness. But darkness is a much deeper phenomenon than light is. Light comes and goes – darkness remains; it never comes, it never goes. Light is not eternal, because it needs fuel, some kind of fuel, and the fuel will be exhausted sooner or later. Darkness needs no fuel, no cause; hence darkness is not an effect and can remain eternally there. In the morning, you see the sun arises and there is light; in the evening the sun sets, the light disappears, and suddenly all over there is darkness. It does not mean that when the sun disappears, darkness comes in. It has been there all the time; just because of the light you could not see it. How can one see darkness while light is there? The light prevented your vision. So anytime just close your eyes and d...

ओशो : ध्यान छूट जाता जब समाधि आ जाती है।

ध्यान छूट जाता जब समाधि आ जाती है। मैं तुम्हें जब ये विरोधाभासी बातें कहता हूं कि ध्यान करो और ध्यान छोड़ो भी, तो ये दो किनारों की बातें हैं। इस किनारे से शुरू करो, उस किनारे पर छोड़ देना। अगर मैं कहूं सिर्फ ध्यान करो, तो एक खतरा पैदा होगा, जब छोड़ने की बात आएगी, तुम छोड़ न सकोगे। अगर मैं सिर्फ इतना ही कहूं कि छोड़ दो, तो तुम करोगे ही नहीं, छोड़ने की संभावना का सवाल ही नहीं, करोगे ही नहीं तो छोड़ोगे क्या खाक? मैं तुमसे कहता हूं : कमाओ और दान कर दो! कमाने में भी मजा है, फिर दान करने में तो बहुत मजा है। ध्यान में बहुत रस है; फिर ध्यान के छोड़ने में तो महारस है। दुविधा में पड़ने की तुम्हें जरूरत नहीं। सीधी—साफ बात है। मैं सभी विरोधों का उपयोग करना चाहता हूं। तुम चाहते हो अविरोधी वक्तव्य, जिसमें तुम्हें अड़चन न हो; तुम लकीर के फकीर बन जाओ और चल पड़ो। तुम लकीर के फकीर बनने को इतने आतुर हो कि बस तुम्हें एक झंडा पकड़ा दिया जाए, बस तुम चलते रहोगे। निश्चित ही मेरी बात में विरोधाभास है, क्योंकि सारा जीवन विरोधाभास से निर्मित है। जन्म होता .है, मृत्यु होती है—यह विरोधाभास है। तुम जीवन से नहीं कहते. ...

ओशो : लोग बुद्ध से लोग पूछते कि कैसे आपने पाया ?

लोग बुद्ध से लोग पूछते कि कैसे आपने पाया ? बुद्ध ने छह वर्ष तक तपश्चर्या की। जो भी जिसने कहा, वही उन्होंने किया। किसी ने कहा, उपवास, तो उन्होंने उपवास किए लंबे। और किसी ने कहा कि शीर्षासन, तो शीर्षासन किया। और किसी ने कहा, नाम जपो, तो नाम जपा। और जिसने जो कहा, वे करते रहे। छह वर्ष निरंतर प्रयास करके भी कहीं पहुंचे नहीं, वहीं थे जहां से यात्रा शुरू की थी। निरंजना नदी में स्नान करने उतरे थे। देह दुर्बल हो गई थी। लंबे उपवास किए थे। नदी में तेज धार थी। नदी से निकलने में इतनी भी शक्ति न थी कि बाहर निकल आएं। तो एक जड़ को पकड़ कर वृक्ष की किसी तरह रुके रहे। उस जड़ को पकड़े समय उनके मन में खयाल आया: इतना निर्बल हो गया हूं कि नदी भी पार नहीं होती, तो उस जीवन की बड़ी नदी को कैसे पार कर पाऊंगा? और छह वर्ष हो गए, सब कर चुका जो कर सकता था, अब तो करने योग्य शक्ति भी नहीं बची है। अब क्या होगा? और सब कर लिया है निष्ठापूर्वक, लेकिन उसके कोई दर्शन नहीं हुए। धन तो छोड़ आए थे, यश तो छोड़ आए थे, राज्य तो छोड़ आए थे, उस दिन निरंजना नदी के उस तट पर अंतिम अहंकार भी व्यर्थ हो गया कि मेरे प्रयास से पा लूंगा। फ...

ओशो : मझधार में डुबो

मझधार में डुबो प्रेम रहस्य हैं जीवन . पहेली नहीं जो सुलझ जाए सुलझाअो उसे जितना उतना ही उलझता हैं और सुलझाओ नहीं तो सुलझा ही हुआ है जीवन समझने को नही जीने को है समझने मे पडा तो वह जी तो ‌पाता ही नहीं समझ ‌भी नहीं पाता ‌है‌ और जीया जिसने गहरे में जीवन को वह जीता तो है ही समझ भी ‌पाता हैं . जीओ जीवन को ‌ पीओ जीवन को तट पर ‌रुक कर सोचने में न पड़ो मझधार में डूबो ... ओशो 

ओशो : भगवान महावीर और गौतम

भगवान महावीर और गौतम गौतम उस समय का बड़ा पंडित था। गौतम महावीर के चरणों में गिर गया। उनका शिष्‍य बन गया। गौतम इतना प्रभावित हो गया महावीर से, कि आसक्‍त हो गया,महावीर के प्रति मोह से भर गय। गौतम महावीर का  श्रेष्ठतम शिष्‍य।  उनका पहला संदेशवाहक है। लेकिन, गौतम ज्ञान को उपल्‍बध नहीं हो सका। गौतम के पीछे हजारों-हजारों लोग दीक्षित हुए और ज्ञान को उपलब्‍ध हुए। और गौतम ज्ञान को उपलब्‍ध नहीं हो सका।       जो महावीर कहते थे, वही लोगों तक पहुंचाने लगा। उससे ज्‍यादा कुशल संदेशवाहक महावीर के पास दूसरा नहीं था। लेकिन वह ज्ञान को उपलब्‍ध नहीं हो सका। वह उसका पांडित्य बाधा बन गया।  वह पहले भी पंडित था, वह अब भी पंडित था।  अब महावीर जो जानते थे, कहते थे,  वह उसी को दोहराने लगा। हो सकता है महावीर से भी बेहतर दोहराने लगा हो। लेकिन ज्ञान को उपलब्‍ध नहीं हुआ। वह पंडित ही रहा। उसने जिस तरह बाहर की जानकारी इकट्ठी की थी,उसी तरह उसने भीतर की जानकारी भी इकट्ठी कर ली। यह भी जानकारी रही,यह भी ज्ञान न बना। गौतम बहुत रोता था। वह महावीर से बार-बार कहता था, मेर...

ओशो : ध्यान

ध्यान                       ध्यान हो तो धन भी सुंदर है । ध्यानी के पास धन होगा , तो जगत का हित ही होगा , कल्याण ही होगा । क्योंकि धन ऊर्जा है । धन शक्ति है । धन बहुत कुछ कर सकता है । मैं कहता हूं -- जियो धन में , लेकिन ध्यान का विस्मरण न हो । ध्यान भीतर रहे , धन बाहर । फिर कोई चिंता नहीं है । तब तुम कमल जैसे रहोगे , पानी में रहोगे और पानी तुम्हें छुएगा भी नहीं....! ध्यान रहे -- धन तुम्हारे जीवन का सर्वस्व न बन जाए । तुम धन को ही इकट्ठा करने में न लगे रहो । धन साधन है , साध्य न बन जाए । धन के लिए तुम अपने जीवन के अन्य मूल्य गंवा न बैठो । तब धन में कोई बुराई नहीं है । लेकिन धन सब कुछ नहीं है । कुछ और भी  धन हैं ।  प्रेम का , सत्य का , ईमानदारी का , सरलता का , निर्दोषता का , निर - अहंकारिता का । ओशो

ओशो : श्रद्धा करनी हो तो मृत्यु पर ही करनी चाहिए

श्रद्धा करनी हो तो मृत्यु पर ही करनी चाहिए क्योंकि मृत्यु कभी किसी को धोखा नहीं देती। आती ही है, कभी दगा नहीं करती। तुम कहीं भी छिपो, खोज लेती है। कभी वचन-भंग नहीं करती। इस मृत्यु के महासत्य को जो पहचान लेता है आंख भरकर, आंख मिलाकर जो देख लेता है मृत्यु की आंखों में, उसके जीवन में क्रांति शुरू हो जाती है;  वही क्रांति संन्यास है। फिर वह घर में रहे, बाजार में रहे, कुछ फर्क नहीं पड़ता। मृत्यु की याद ने उसकी दौड़-धूप बंद कर दी, उसकी आपाधापी गयी, उसकी महत्त्वाकांक्षा गयी। मिला तो ठीक, नहीं मिला तो ठीक। सफल हुए तो ठीक, असफल हुए तो ठीक। यश हुआ तो ठीक, अपयश हुआ तो ठीक।  आएगी कल मौत, सब पर पानी फेर जाएगी। यशस्वी, अयशस्वी, सब धूल चाट जाएंगे। ओशो प्रेम रंग रस ओढ़ चदरिया -प्र -9

Osho : S U R R E N D E R

S U R R E N D E R “Love. God is testing you every moment. Laugh and take the test - it is beautiful that he considers you worth testing! But don't be in a hurry for the more you hurry the more some goals recede, and without doubt the temple of God is a goal like that. He who travels with patience travels fastest on this journey. The mind will roam again and again - that is its way; the day its raoming stops it will be dead. Sometimes it sleeps - do not mistake this for death. Sometimes it gets tired - don't mistake this for death either. Some rest and sleep and it is strong and alive again. So stop bothering about it altogether for even this worry gives it strength. Surrender even this to God. Say to him: Whatever it's like, good or bad, take care of it. And then just be a witness, simply watch the whole play. Watch the play of the mind with detachment and then suddenly - there is the consciousness which is no-mind.” — O S H O, ‘A Cup of Tea’ ...

Osho : FORGET ABOUT RESULTS, JUST KEEP GOING ON YOUR PATH

FORGET ABOUT RESULTS, JUST KEEP GOING ON YOUR PATH My respects to you. All your letters arrived in good time but as I have been busy I could not reply sooner. I have been out most of the time and I have just returned after speaking in Jaipur, Burhanpur, Hoshangabad, Chanda and other places. How thirsty people are for spiritual life ! Seeing this I am surprised that some people say man has lost all interest in religion. This can never be. No interest in religion means no interest in life, bliss, the ultimate. Consciousness is by nature GOD-ORIENTED and it can only be satisfied by attaining God – the state of SATCHITANANDA, the truth-awareness-bliss state of being. Hidden within one in the form of a seed is the very source of religious birth, therefore whilst religions may come and go RELIGION can never die. I am glad to know that you feel patient about your progress towards the light. Patience is the most important thing of all in spiritual life. How long o...

ओशो : जीवन जब शून्य हो जाता, तभी कृत्य शून्य होता है।

जीवन जब शून्य हो जाता, तभी कृत्य शून्य होता है। कृत्य तो जारी रहेगा; जीवन का अनिवार्य अंग है। जीवन जब शून्य हो जाता, तभी कृत्य शून्य होता है। और जब कुछ करोगे तो कुछ विचार भी चलते रहेंगे। अब संन्यासी बैठा है, उसे भूख लगी है तो विचार न उठेगा कि भूख लगी? महावीर को भी उठता होगा कि भूख लगी, नहीं तो भिक्षा मांगने क्यों जाते? विचार तो स्वाभाविक है, उठेगा कि अब भूख लगी। रास्ते पर अंगारा पड़ा हो तो महावीर भी हों तो बच कर निकलेंगे, उनको भी तो विचार उठेगा कि अंगारा पड़ा है, इस पर पैर न रखूं पैर जल जाएगा। तुम पत्थर महावीर की तरफ फेंकोगे तो उनकी आंख भी झप जाएगी। इतना तो विचार होगा न, इतनी तो तरंग होगी न, कि पत्थर आ रहा है, आंख फूटी जाती है, आंख झपा लो! विचार तो उठता रहेगा, क्योंकि विचार भी जीवन का अनुषंग है। जब तक श्वास चलती है, तब तक विचार भी उठता रहेगा। इसका क्या अर्थ हुआ? क्या इसका अर्थ हुआ कि आदमी के शांत होने का कोई उपाय नहीं? नहीं, उपाय है। उसी उपाय की तरफ इंगित करने के लिए अष्टावक्र कहते हैं कि पहले यह समझ लो कि कौन—कौन से उपाय काम नहीं आएंगे। छोड़ कर भागना काम नहीं आएगा। कर्म से बचना काम ...

Osho : Third Eye

OSHO ON THE THIRD EYE. OSHO: With the third eye you become capable of seeing things which are there, but which cannot be seen with ordinary eyes. All the methods about looking affect the third eye, because looking means a certain energy moving outward from you toward the world. If blocked, if suddenly blocked, the energy will find another path, and the third eye is just near. In Tibet there were even surgical operations for the third eye. Sometimes it happens that your third eye is blocked because you have not used it for millennia. If the third eye is blocked and you stop your eyes, you will feel a certain uneasiness because the energy is there and there is no path where to move. In Tibet they devised certain operations to have the passage cleared. This can be done. And if it is not done, then many things can happen. Just two or three days before, one sannyasin – she is here – came to me. She said, “There is a very hot sensation at the third eye.” And not only was there the...

ओशो : भाव हो तो वर्णमाला भी वेद हो जाती है

भाव हो तो वर्णमाला भी वेद हो जाती है ऐसा हुआ, मगीध नाम का एक यहूदी फकीर जंगल में भटक गया--कहानी है। कहानी बड़ी मीठी है। शैतान ने उसे भटका दिया। क्योंकि मगीध से शैतान बड़ा परेशान था। यह उसकी सुनता ही नहीं था। और हजार उपाय करता था, सब असफल हो जाते थे। तो मगीध और उसके एक शिष्य जो जंगल से गुजर रहे थे, उनको शैतान ने रास्ता भटका दिया। जंगल में भटक रहे हैं, रास्ता मिलता नहीं है। और बड़ा हैरान हुआ मगीध, कि उसकी स्मृति खोती जा रही है। वह जो भी जानता था, वह भूलता जा रहा है। उसने अपने शिष्य को कहा कि 'यह तो बड़ी मुश्किल मालूम होती है। यह शैतान का हाथ मालूम होता है। मैं जो भी जानता था, वह भूल रहा है। सब शास्त्र खो गए, सब प्रक्रियाएं खो गईं, मेरी शक्ति छिनती जा रही है। तू कुछ कर! तूने मुझे इतना सुना है, कुछ तो तुझे याद होगा! उसमें से कुछ बोल। कोई प्रार्थना, जो मैं रोज करता था।' उस शिष्य ने कहा, 'अगर मेरे पास कान होते, तो मैं तुम्हारी प्रार्थना भी सुनता। मैंने सुनी हैं प्रार्थनाएं, लेकिन वह मैंने मेरी तरह से सुनी हैं। वह ठीक नहीं हो सकतीं। और जब तुम्हारी ठीक प्रार्थनाएं भटक गईं, तो मे...

ओशो : दुख का मूल द्वैत है! उसकी औषधि कोई नहीं।

जनक का वचन है: अहो! दुख का मूल द्वैत है! उसकी औषधि कोई नहीं। क्योंकि मूलतः तुम दो नहीं हुए हो, इसलिए औषधि की कोई जरूरत नहीं है। टूटे नहीं, इसलिए जोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम जुड़े ही हो। सिर्फ देखो, जागो, पहचानो। अलग हो कैसे सकते हो जीवन से? अस्तित्व से भिन्न हो कैसे सकते हो? श्वास-श्वास जुड़ी है। तुम कभी देखते नहीं, जीवन का जोड़ कैसा रसपूर्ण है। रस बह रहा है सबके भीतर; एक-दूसरे में बदलता जा रहा है। जो श्वास अभी मेरे भीतर है, क्षण भर बाद तुम्हारे भीतर हो जाती है। फिर भी तुम नहीं देखते। क्षण भर पहले मैं कहता था, मेरी श्वास, क्षण भर बाद तुम्हारी हो गई। तो हम और तुम बहुत अलग नहीं हो सकते। क्षण भर पहले जो तुम्हारी श्वास थी, अब मेरी हो गई, तो हम और तुम बहुत अलग नहीं हो सकते। यह श्वास का धागा जोड़े हुए है। मैं अगर कहूं कि मैं तो अपनी ही श्वास से जीऊंगा, हर किसी की ऐसी बासी और उधार श्वास नहीं लूंगा तो मर जाऊंगा। मैं कहूं कि न हम दूसरों के जूते पहनते न दूसरों के कपड़े, दूसरों की श्वास कैसे ले सकते हैं--तो यह सारी हवा दूसरों की श्वास है। यह हजारों नासापुटों में जा रही, आ रही। और ध्य...

ओशो : सातवीं श्वास विधि:

सातवीं श्वास विधि: ललाट के मध्य में सूक्ष्म श्वास ( प्राण) को टिकाको। जब वह सोने के क्षण में हृदय तक पहुंचेगा तब स्वप्न और स्वयं मृत्यु पर अधिकार हो जाएगा। तुम अधिकाधिक गहरी पर्तों में प्रवेश कर रहे हो। ‘ललाट के मध्य में सूक्ष्म श्वास (प्राण) को टिकाओ।’ अगर तुम तीसरी आंख को जान गए हो तो तुम ललाट के मध्य में स्थित सूक्ष्म श्वास को, अदृश्य प्राण को जान गए, और तुम यह भी जान गए कि वह ऊर्जा, वह प्रकाश बरसता है।’जब वह सोने के क्षण में हृदय तक पहुंचेगा’—जब यह वर्षा तुम्हारे हृदय तक पहुंचेगी—’तब स्वप्न और स्वयं मृत्यु पर अधिकार हो जाएगा।’ इस विधि को तीन हिस्सों में लो। एक, श्वास के भीतर जो प्राण है, जो उसका सूक्ष्म, अदृश्य, अपार्थिव अंश है, उसे तुमको अनुभव करना होगा। यह तब होता है, जब तुम भृकुटियों के बीच अवधान को थिर रखते हो। तब यह आसानी से घटित होता है। अगर तुम अवधान को अंतराल में टिकाते हो, तो भी घटित होता है, मगर उतनी आसानी से नहीं। यदि तुम नाभि—केंद्र के प्रति सजग हो, जहां श्वास आती है और छूकर चली जाती है, तो भी यह घटित होता है, पर कम आसानी से। उस सूक्ष्म प्राण को जानने का सबसे...

ओशो : स्वयं का स्वीकार

जब तक स्वयं का स्वीकार न हो, कि मैं जैसा भी हूँ , जो भी मेरा होना है, उसका पूर्ण स्वीकार , तब ही कोई स्वयं को प्रेम कर सकता है, जिसे स्वयं से ही प्रेम नही है , वो किसी को भी प्रेम नही कर सकता, और उसे भी कोई प्रेम न कर सकेगा। इस दुनिया मे सबसे बड़ा यदि कोई अधार्मिक कृत्य है, तो वो है स्वयं से घृणा, स्वयं से घृणा करने से बड़ा कोई पाप इस धरती पर नही है, और व्यक्ति ये पाप कर रहा है, उसे स्वयं से प्रेम नही है। लेकिन व्यक्ति गाता फिर रहा है, कि उसे अपने देश से प्रेम है, समाज से प्रेम है, मानवता से प्रेम है, ये सब घोषणाएँ खोखली है, थोथी है, कोई मूल्य नही है इनका, ये कोरी , झूठी बकवास है, जब स्वयं से ही प्रेम नही है, तो किसी से भी प्रेम हो ही नही सकता। जो अस्तित्व से यानि परमात्मा से लगातार शिकायत कर रहा है, कि उसे जो मिला है, वह कम है, उससे क़तई संतुष्ट नहीं है, धर्मस्थलों मे जा रहा है, किसी अहोभाव के कारण नही, परमात्मा को धन्यवाद देने के लिए नही, अपितु माँगने के लिए, प्रार्थना मे मांग है, अहोभाव नही, कोई धन्यवाद का भाव नही, कि तुने जो दिया है, वह मेरी पात्रता से कहीं अधिक है...

ओशो : प्रेम पथ

प्रेम पथ सदगुरुओं के प्रेम के नीचे, शिष्य परमात्मा को उपलब्ध हो गये हैं । बिना कुछ किए भी कभी यह घटा है । और कभी कभी बहुत कुछ करने पर भी, अगर सदगुरू की प्रेम छाया ना हो, तो कुछ भी नही घटा है । इसलिए तो समर्पण का कुल इतना ही अर्थ है कि गुरु के जीवन से जो प्रेम की धारा बह रही है, उसके लिए तुम दीवाल मत बनो, दरवाजा बन जाओ।                            ओशो           सबै सयाने एक मत, अंश प्रवचन

ओशो : ध्यान विधि

ध्यान विधि एक काम करना : बुद्ध की प्रतिमा रखना । क्योंकि वह प्रतिमा करुणा की मुद्रा है। जब भी तुम क्रोधित होते हो, भीतर कमरे में जाना, बुद्ध की ओर देखना, बुद्ध की भाँति बैठ जाना और अनुभव करना करुणा को । अचानक तुम पाओगे, तुम्हारे भीतर रूपांतरण घट रहा है : क्रोध रूपांतरित हो रहा है, उत्‍तेजना खो रही है - करूणा उदित हो रही है । और यह कोई भिन्न ऊर्जा नहीं है; यह वही ऊर्जा है- क्रोध की ही ऊर्जा अपनी गुणवत्ता बदल रही है, ऊपर उठ रही है ।                                          ओशो