ओशो : जीवन में छोटे — बड़े दुख के कारण कभी — कभी मन अशांत, निराश और बेचैन बन जाता है। तो संसार में ही रहकर मन सदा शांत, प्रसन्न और उत्साहित कैसे रखें ?

जीवन में छोटे — बड़े दुख के कारण कभी — कभी मन अशांत, निराश और बेचैन बन जाता है। तो संसार में ही रहकर मन सदा शांत, प्रसन्न और उत्साहित कैसे रखें ?

 नियति की जो बात हम कर रहे हैं, उसे अगर ठीक से समझ लें, तो मन शांत हो जाएगा। और कोई भी उपाय मन को शांत करने का नहीं है। और सब उपाय ऊपरी—ऊपरी हैं, उनसे थोड़ी—बहुत राहत मिल सकती है, लेकिन मन शांत नहीं हो सकता।

लेकिन नियति की बात थोड़ी कठिन है, समझ में थोड़ी मुश्किल से पड़ती है। मन अशांत होता है, नियति का विचार कहेगा, उस अशांति को स्वीकार कर लें। उसके विपरीत शांत होने की कोशिश मत करें। मन उदास है, नियति का विचार कहेगा, उदासी को स्वीकार कर लें, प्रफुल्लित होने की चेष्टा न करें। क्योंकि असली अशांति अशांति के कारण नहीं, अशांति को दूर हटाने के विचार से पैदा होती है।

असली उदासी उदासी से नहीं, कैसे मैं प्रफुल्लित हो जाऊं, इस धारणा से, इस विचार, इस आकांक्षा से पैदा होती है। उदासी को स्वीकार कर लें, और आप पाएंगे शीघ्र ही कि उदासी विलीन हो गई है। उसकी स्वीकृति में ही उसका अंत है।

कैसे दुखी न हों, यह न पूछें। दुखी हैं, दुख को स्वीकार कर लें। वह भाग्य। वह नियति। वह है। उससे लड़े मत। उससे सब लड़ाई छोड़ दें। उसके पार जाने की आकांक्षा भी छोड़ दें। उससे विपरीत

की मांग भी छोड़ दें। उसे स्वीकार कर लें कि यह मेरी नियति, यह मेरा भाग्य। मैं दुखी हूं, बात यहां पूरी हो गई।

दुख से राजी हो जाएं और फिर देखें कि दुख कैसे टिक सकता है। अशांति को स्वीकार कर लें और आप शांत हो जाएंगे। हमारी अशांति अशांति नहीं है। हमारी अशांति शांति की चाह से पैदा होती है। इसलिए जो लोग शांति के लिए बहुत आकांक्षी हो जाते हैं, उनसे ज्यादा अशांत कोई भी नहीं होता।
ऐसा समझें, दुखी आदमी का लक्षण है, वह कहता है, ऐसा हो, तो मैं सुखी होऊंगा। उसकी कंडीशन है। दुखी आदमी की शर्त है। वह कहता है, ये शर्तें पूरी हो जाएं, तो मैं सुखी हो जाऊंगा। सुखी आदमी बेशर्त है। वह कहता है, कुछ भी हो, मैं सुखी रहूंगा। मैं चाहता नहीं हूं कि ऐसा हो। जो भी होगा, उसको मैं चाहूंगा। इस फर्क को समझ लें।

एक तो है कि मैं चाहता हूं कि ऐसा हो, यह दुखी होने का उपाय है। एक यह कि जो हो जाए, वही मेरी चाह है। जो हो जाए, वही मैं चाहूंगा। अगर परमात्मा दुख दे रहा है, तो वही मेरी चाह है, वही मैंने मांगा है, वही मुझे मिला है, मैं राजी हूं।

इसका थोड़ा प्रयोग करके देखें, चौबीस घंटे, ज्यादा नहीं। लड़ने का प्रयोग तो आप हजारों जन्मों से कर रहे हैं। एक चौबीस घंटे तय कर लें कि आज सुबह छह बजे से कल सुबह छह बजे तक, जो भी होगा, उसको मैं स्वीकार कर लूंगा। जरा भी विरोध, द्वंद्व खड़ा नहीं करूंगा।

देखें, चौबीस घंटे में आपकी जिंदगी में एक नई हवा का प्रवेश हो जाएगा। जैसे कोई झरोखा अचानक खुल गया और ताजी हवा आपकी जिंदगी में आनी शुरू हो गई। फिर ये चौबीस घंटे कभी खतम न होंगे। एक दफा इसका अनुभव हो जाए, फिर आप इसमें गहरे उतरने लगेंगे।

कोई विधि नहीं है शांत होने की, शांत होना जीवन—दृष्टि है। कोई मेथड नहीं होता कि राम— राम, राम—राम जप लिया और शांत हो गए। नहीं होंगे आप शांत। राम—राम भी आपकी अशांति ही होगी। वह भी आप अशांत मन से ही जपते रहेंगे। वह भी आपकी बेचैनी और बुखार का सबूत होगा, और कुछ भी नहीं।

शांत हो जाएं। कैसे? अशांति को स्वीकार कर लें। दुख को स्वीकार कर लें। मृत्यु को स्वीकार कर लें, फिर आपकी कोई मृत्यु नहीं है। जिसे हम स्वीकार कर लेते हैं, उसके हम पार हो जाते हैं।

ओशो 

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