ओशो : शत्रुभाव मृत्यु का आमंत्रण है। मैत्री जीवन का बुलावा है।

शत्रुभाव मृत्यु का आमंत्रण है। मैत्री जीवन का बुलावा है।

वैर— भाव में जीने वाला सदा भय में जीता है, फियर में जीता है। जो मैत्री को उपलब्ध होते हैं वे ही फियरलेसनेस को, अभय को उपलब्ध होते हैं, क्योंकि फिर मिटने—मिटाने का सवाल न रहा। वे खुद ही मिट गए, अब उन्हें कोई मिटाएगा कैसे?

लाओत्सु कहता था: 'धन्य हैं वे लोग जो हारे ही हुए हैं, क्योंकि उन्हें कोई हरा नहीं सकता।’ मैं फिर दोहराता हूं अदभुत है यह पंक्ति। लाओत्सु कहता है धन्य हैं वे लोग जो हारे ही हुए हैं, क्योंकि उन्हें कोई हरा नहीं सकता। धन्य हैं वे लोग जो मिट ही गए, क्योंकि अब उन्हें कोई मिटा नहीं सकता। धन्य हैं वे लोग जो हैं ही नहीं, क्योंकि अब उनकी कोई मृत्यु संभव नहीं है।

हम जितना अपने को बचाते हैं, उतना हम अपने को मिटाए जाने के लिए आमंत्रण भेज देते हैं। तूफान आता है हवा का एक। छोटे—छोटे वृक्ष झुक जाते हैं, हवाएं निकल जाती हैं, वे फिर खड़े हो जाते हैं और हंसने लगते हैं। उनमें फूल फिर खिल आते हैं, वे फिर हवाओं में नाचने लगते हैं। बड़े वृक्ष— अहंकार से भरे वृक्ष, ऊंचे वृक्ष—नहीं, झुकने के लिए तैयार नहीं होते। वे टकराते हैं, वे प्रतिरोध करते हैं, वे रेसिस्ट करते हैं। वे तूफान के दुश्मन हो जाते हैं। तूफान के सामने वे अकड़ कर खड़े हो जाते हैं। जितनी उनकी तेज अकड़ होती है उतनी ही उनके टूटने की संभावना बढ़ जाती है। जितने वे कड़े होते हैं उतने ही टूटने के लिए मौके बढ़ जाते हैं। उनका कड़ापन, उनके खड़े रहने का भाव, उनकी जिद्द उनकी मौत बन जाती है। और वे छोटे—छोटे पौधे जो झुक गए हैं और लेट गए हैं और समर्पित हो गए हैं; जिन्होंने तूफान से शत्रुता नहीं साधी है, जो तूफान के खिलाफ खड़े नहीं हो गए हैं, जिन्होंने तूफान को भी अंगीकार कर लिया है और उसके साथ ही डूब गए हैं और कहा है, जो तेरी मर्जी! अगर पूरब बहना है तो हम पूरब बहे जाते हैं, अगर पश्चिम झुकना है तो हम पश्चिम झुके जाते हैं।

जिन्होंने तूफान के आते ही अपने को झुका लिया है, तूफान उनके ऊपर से निकल जाता है— एक मित्र के प्रेम की तरह—वें वापस खड़े हो जाते हैं। उनके झुकने की क्षमता ही उनके जीने की क्षमता बन जाती है। कड़े होने की, अकड़ के खड़े होने की क्षमता मौत की क्षमता है, जीवन की नहीं।

शत्रु— भाव मृत्यु का आमंत्रण है। मैत्री जीवन का बुलावा है।

मैत्री का अर्थ है. जिसने यह खयाल छोड़ दिया कि मुझे मिटाया जा सकता है। असल में जो यह कहता है कि 'मैं हूं ही नहीं' इसलिए मिटेगा क्या? मिटाएगा कौन? कौन है शत्रु? 'मैं हूं नहीं' तो शत्रु का प्रश्न न रहा। ’मैं' जब तक हूं तब तक शत्रु है।’मैं’ जब तक हूं और जितना घनीभूत हूं उतना ही घनीभूत शत्रु होगा। मेरा कड़ा होना ही शत्रुता निर्मित करता है। इसलिए जितना अहंकारी व्यक्ति होता है, उतने ही शत्रु निर्माण कर लेता है। यह पृथ्वी उसे चारों तरफ से शत्रु मालूम पड़ने लगती है। कोई मित्र नहीं रह जाता।

ओशो

प्रभु की पगड़ंडियां--(प्रवचन--04)
प्रभु—मंदिरका दूसरा द्वार: मैत्री—(प्रवचन—चौथा)
दिनांक 2 दिसम्‍बर, 1968
ध्‍यान—शिविर, नारगोल।

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