ओशो : प्रेम कृत्य नहीं है; वह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे तुम कर सको। अगर तुम इसे कर सकते हो तो यह प्रेम नहीं है। प्रेम किया नहीं जाता है, होता है। वह कृत्य नहीं, होने की अवस्था है।

प्रश्न : किसी को दिन के चौबींसों घंटे प्रेम करना बहुत कठिन मालूम होता है। ऐसा क्‍यों होता है? क्या प्रेम में सातत्‍य जरूरी है? और प्रेम कब भक्‍ति बनता है?

ओशो - प्रेम कृत्य नहीं है; वह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे तुम कर सको। अगर तुम इसे कर सकते हो तो यह प्रेम नहीं है। प्रेम किया नहीं जाता है, होता है। वह कृत्य नहीं, होने की अवस्था है।

कोई व्यक्ति कोई चीज चौबीस घंटे नहीं करता रह सकता है। अगर तुम प्रेम ‘करते हो’ तो उसे तुम चौबीस घंटे नहीं कर सकते। हर काम थका देता है; हर काम से ऊब पैदा होती है। हर कृत्य के बाद विश्राम की जरूरत पैदा होती है। अगर तुम प्रेम भी करते हो तो तुम्हें घृणा में विश्राम करना होगा। क्योंकि विपरीत में ही विश्राम संभव है।

इसी वजह से सदा हमारे प्रेम में घृणा मिली होती है। इस क्षण तुम किसी व्यक्ति को प्रेम करते हो और अगले क्षण उसको ही घृणा भी करते हो। एक ही व्यक्ति तुम्हारे प्रेम और घृणा दोनों का पात्र हो जाता है। प्रेमियों का द्वंद्व यही है। और क्योंकि तुम्हारा प्रेम कृत्य है, इसलिए उसमें इतना दुख और संताप है।

तो पहले तो यह समझना है कि प्रेम कृत्य नहीं है। तुम प्रेम कर नहीं सकते हो। तुम प्रेम में हो सकते हो, कर नहीं सकते। प्रेम करना बेतुका है।

इसमें और बातें भी निहित हैं। प्रेम प्रयत्न भी नहीं है। अगर प्रेम प्रयत्न हो तो तुम थक जाओगे। प्रेम चित्त की एक अवस्था है। और इसे संबंधों की भाषा में भी मत सोचो, इसे चित्त की एक अवस्था की भांति सोचो। अगर तुम प्रेमपूर्ण हो तो वह चित्त की एक अवस्था है। यह चित्त की अवस्था एक व्यक्ति पर भी केंद्रीभूत हो सकती है और यह समस्त पर भी फैल सकती है। जब वह एक व्यक्ति पर केंद्रित होती है तो उसे प्रेम कहते हैं। और जब वह अकेंद्रित होकर समस्त पर फैल जाती है तब वह प्रार्थना हो जाती है। तब तुम बस प्रेम में होते हो; किसी के प्रेम में नहीं, सिर्फ प्रेम में।

यह वैसा ही है जैसा श्वास लेना। अगर श्वास लेने के लिए प्रयत्न की जरूरत होती तो तुम उसमें थक जाते; तब तुम्हें विश्राम की जरूरत होती, और तब तुम मर जाते। अगर श्वास में प्रयत्न निहित होता तो कभी तुम श्वास लेना भूल भी सकते थे, और तब मृत्यु निश्चित थी।

प्रेम श्वास लेने जैसा है—यह ऊंचे तल का श्वसन है। अगर तुम श्वास नहीं लेते हो तो तुम्हारा शरीर मरेगा और अगर तुम प्रेम नहीं करते हो तो तुम्‍हारी आत्मा का जन्म नहीं होगा। तो प्रेम को आत्मा का श्वसन समझो,
श्वास समझो—। जब तुम प्रेम में होते हो तब तुम्हारी आत्मा श्वास—प्रश्वास की तरह ही जीवंत और शक्तिशाली होगी।

लेकिन इसे ऐसा सोचो। अगर मैं तुम से कहूं कि तुम मेरे पास ही श्वास लो, और कहीं नहीं, तो तुम मर जाओगे। और जब दूसरी बार मेरे निकट आओगे तो तुम मृतवत होगे और मेरे निकट भी श्वास न ले सकोगे।

प्रेम के साथ यही दुर्घटना हुई है। प्रेम में हम मालकियत करते हैं, जिससे हमारा प्रेम होता है उस पर कब्जा रखना चाहते हैं। प्रेमी कहते हैं कि किसी दूसरे को प्रेम मत करो, केवल मुझे प्रेम करो। लेकिन तब प्रेम मर जाता है। और तब प्रेमी प्रेम भी नहीं कर सकता। तब प्रेम असंभव हो जाता है।

इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम्हें हरेक व्यक्ति को प्रेम करना है। इसका इतना ही अर्थ है कि तुम्हें चित्त की प्रेमपूर्ण अवस्था में होना है। यह श्वास लेने जैसा है; तुम अपने दुश्मन के पास होकर भी श्वास लेते हो। जीसस का यही मतलब है जब वे कहते हैं कि अपने शत्रु को प्रेम करो। ईसाइयत के लिए जीसस के इस वचन को समझाना कि शत्रु को प्रेम करो, एक समस्या रही है। यह विरोधाभासी मालूम पड़ता है। लेकिन अगर प्रेम कृत्य नहीं है, अगर वह चित्त की दशा है, तो फिर शत्रु या मित्र का प्रश्न नहीं रहता। तब तुम बस प्रेम हो।

इस बात को दूसरी तरफ से देखो। ऐसे लोग हैं जो निरंतर घृणा में जीते हैं और जब वे प्रेम दिखाना चाहते हैं तो उन्हें बहुत प्रयत्न करना पड़ता है। उनका प्रेम प्रयत्न है, क्योंकि उनके चित्त की स्थायी अवस्था घृणा की है। इसलिए प्रयत्न की जरूरत पड़ती है। ऐसे लोग हैं जो सतत उदास रहते हैं; तब उन्हें हंसने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है। उन्हें अपने आपसे लड़ना पड़ता है। और तब उनकी हंसी चिपकायी हुई हंसी हो जाती है—झूठी, आरोपित, कृत्रिम, आयोजित। वह भीतर से नहीं आती है। उसमें कोई सहजता नहीं होती, वह बिलकुल बनावटी है।

ऐसे लोग हैं जो सदा क्रोध में होते हैं, ऐसा नहीं कि वे किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति क्रोध में हैं, वे बस क्रोध में हैं। ऐसे व्यक्ति के लिए प्रेम करना प्रयत्न हो जाता है। दूसरी ओर अगर तुम्हारे चित्त की अवस्था प्रेम की है तो क्रोध करना प्रयत्न हो जाएगा। तुम क्रोध करोगे; लेकिन वह क्रोध क्रोध नहीं होगा, बनावटी क्रोध होगा। वह झूठा होगा।

यदि बुद्ध क्रोध करने की चेष्टा करें तो उन्हें बहुत प्रयत्न करना पड़ेगा; और फिर भी उनका क्रोध झूठा होगा। जो उन्हें नहीं जानते हैं वे लोग ही उनके क्रोध के धोखे में पड़ सकते हैं; जो जानते हैं वे जानते हैं कि यह क्रोध मिथ्या है, ओढ़ा हुआ है, कृत्रिम है। यह भीतर से नहीं आता है। यह असंभव है।

कोई बुद्ध, कोई जीसस घृणा नहीं कर सकते, उसके लिए उन्हें प्रयत्न करना होगा। अगर वे घृणा दिखाना चाहेंगे तो उसका उन्हें अभिनय करना होगा। लेकिन तुम्हें घृणा करने के लिए प्रयत्न की जरूरत नहीं होगी ही, प्रेम करने के लिए प्रयत्न जरूरी होगा।

चित्त की इस अवस्था को बदलो। चित्त की अवस्था को कैसे बदला जाए? प्रेमपूर्ण कैसे हुआ जाए? और यह समय का प्रश्न नहीं है कि चौबीस घंटे प्रेमपूर्ण कैसे रहा जाए। यह प्रश्न ही व्यर्थ है। यह समय का प्रश्न ही नहीं है। अगर तुम एक क्षण के लिए भी प्रेमपूर्ण हो सको तो पर्याप्त है। तुम्हें दो क्षण एक साथ कभी नहीं मिलते हैं; जब मिलता है एक क्षण ही होता है।

और अगर तुमने जान लिया कि इस एक क्षण में प्रेमपूर्ण कैसे हुआ जाए तो कुंजी तुम्हारे हाथ आ गयी। तुम्हें चौबीस घंटे या जिंदगीभर की बात नहीं सोचनी है। प्रेम का एक क्षण पर्याप्त है। जब तुमने जान लिया कि एक क्षण को प्रेम से कैसे भरा जाए तब दूसरा क्षण तुम्हें मिलेगा और तुम उसको प्रेम से भर सकोगे।

इसलिए याद रहे कि यह समय की बात नहीं है; बस एक क्षण की बात है। और क्षण समय का हिस्सा नहीं है। क्षण कोई प्रक्रिया नहीं है, वह बस अभी है। एक बार तुम जान लो कि एक क्षण के भीतर प्रेमपूर्ण होकर कैसे प्रवेश किया जाए तो तुमने शाश्वत को जान लिया; तब समय नहीं रह जाता है।

बुद्ध अभी जीते हैं, इस क्षण में जीते हैं; तुम समय में जीते हो। समय का मतलब है अतीत की सोचना, भविष्य की सोचना। और जब तुम अतीत और भविष्य की सोच रहे होते हो तब वर्तमान खो जाता है। तुम भविष्य और अतीत में अटके होते हो और वर्तमान हाथ से निकल जाता है। और अस्तित्व वर्तमान में है, वर्तमान ही अस्तित्व है। अतीत वह है जो बीत चुका और भविष्य वह है जो होने को है। वे दोनों नहीं हैं, वे दोनों अनस्तित्व हैं। यही क्षण, यह एक, अकेला आणविक क्षण अस्तित्व है; वह यहीं और अभी है।

अगर तुम प्रेमपूर्ण होना चाहते हो तो तुम्हें कुंजी प्राप्त है। और तुम्हें कभी भी दो क्षण एक साथ नहीं मिलेंगे। तो तुम समय की फिक्र मत करो।

एक अकेला क्षण सदा, और सदा अभी के रूप में आता है। स्मरण रहे, ‘यह क्षण’ दो तरह का नहीं होता है। यह एक क्षण सदा समान है, एक जैसा है। वह बीते क्षण से या आने वाले क्षण से किसी भी भांति भिन्न नहीं है। यह आणविक ‘अब’ सदा एक जैसा है।

इसीलिए इकहार्ट कहता है, समय नहीं बीतता है। समय तो वही है, हम बीतते हैं। शुद्ध समय सदा एक जैसा होता है। सिर्फ हम बीतते रहते हैं।

तो चौबीस घंटे की मत सोचो। और तब तुम्हें वर्तमान क्षण की फिक्र करने की जरूरत नहीं रहेगी।

एक और बात। सोचने के लिए समय की जरूरत है; जीने के लिए समय की जरूरत नहीं है। तुम इसी क्षण में सोच नहीं सकते हो। इस क्षण में अगर तुम होना चाहते हो, तुम्हें सोचना बंद करना पड़ेगा। विचारना बुनियादी रूप से अतीत या भविष्य से संबंधित है। वर्तमान में तुम क्या सोच सकते हो? ज्यों ही तुम सोचते हो वर्तमान अतीत हो जाता है।

एक फूल है, तुम कहते हो कि यह सुंदर फूल है। यह कहना भी अब वर्तमान में नहीं है, यह अतीत हो चुका। जब तुम किसी चीज को विचार में पकड़ना चाहते हो, वह अतीत हो चुकती है। वर्तमान में तुम हो तो सकते हो, लेकिन विचार नहीं कर सकते। तुम फूल के साथ हो सकते हो, लेकिन विचार नहीं कर सकते। तुम फूल के साथ हो सकते हो, परंतु उसके संबंध में विचार नहीं कर सकते। विचारने के लिए समय की जरूरत है। दूसरे शब्दों में, विचारना ही समय है। अगर तुम विचार नहीं करते हो तो समय नहीं है।

इसीलिए ध्यान में समय—शून्यता का एहसास होता है। इसीलिए प्रेम में कालातीत का अनुभव होता है। प्रेम विचारना नहीं है; वह विचार का विसर्जन है। तुम बस हो। जब तुम अपनी प्रेमिका के साथ हो तो तुम प्रेम के संबंध में विचार नहीं कर रहे हो, न तुम अपनी प्रेमिका के संबंध में विचार करते हो। तुम कुछ भी विचार नहीं करते हो। और अगर विचार कर रहे हो तो तुम अपनी प्रेमिका के साथ नहीं हो, कहीं और हो। विचारने का अर्थ है कि अभी—यहां तुम अनुपस्थित हो; तुम नहीं हो।

यही वजह है कि जो लोग विचारों से बहुत ग्रस्त रहते हैं वे प्रेम नहीं कर सकते। अगर ऐसे लोग भगवत्ता के मूल स्रोत पर भी पहुंच जाएं, अगर वे परमात्मा को भी मिल जाएं, तो भी वे उसके संबंध में सोचते रहेंगे और उसे बिलकुल चूक जाएंगे। तुम किसी चीज के संबंध में सोचते रहो, सोचते रही, सोचते रहो, लेकिन वह कभी तथ्य नहीं है।

प्रेम का एक क्षण समयातीत क्षण है। तब यह सोचने का प्रश्न नहीं उठता कि कैसे चौबीस घंटे प्रेम में रहा जाए। तुम यह कभी नहीं सोचते कि कैसे चौबीस घंटे जीवित रहा जाए। या तो तुम जीवित हो या नहीं जीवित हो। समझने की बुनियादी बात समय नहीं, ‘अब’ है, कैसे यहां और अभी प्रेम की अवस्था में रहा जाए।


ओशो
तंत्र सूत्र भाग २
प्रवचन २० शरीर और तंत्र , आसक्ति और प्रेम
से संकलन ।

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