ओशो : छोड़ो फिक्र औरों की, वे जानें, उनका काम जाने। तुम अपनी फिक्र कर लो।
छोड़ो फिक्र औरों की, वे जानें, उनका काम जाने। तुम अपनी फिक्र कर लो। तुम बदलना चाहो तो भी न बदल सकोगे सभी को। यह भी अहंकार ही है कि हम सभी को बदल लेंगे। यह अहंकार अब तक सफल नहीं हुआ, किसी का सफल नहीं हुआ, किसी का सफल होने वाला नहीं है। इतना ही काफी है कि तुम अपने को बदल लो। और जिसने अपने को बदला उसने दूसरों को बदलने के लिए राह सुझाई। वह मील का एक पत्थर बना। वह एक मशाल बना। उसकी जलती ज्योति देख कर दूर-दूर से लोग चले आएंगे--खोजते लोग चले आएंगे।
जिन्हें प्यास है वे सरोवर खोज लेते हैं। जिन्हें रोशनी की प्यास है वे जलते हुए किसी बुद्धत्व को खोज लेते हैं।
मैं यहां देश की स्थिति पर विचार करने को नहीं बैठा हूं। हां, तुम्हारे ऊपर जितना विचार हो सके थोड़ा है। तुम कहते हो : "देश की स्थिति रोज-रोज बिगड़ती जाती है। आप इस संबंध में कुछ क्यों नहीं कहते हैं?'
कहने से क्या होगा? मैं कुछ कर रहा हूं, कहने से क्या होगा? हालांकि मेरा करना सूक्ष्म है, क्योंकि मेरा करना आत्मिक है। कहीं अकाल पड़ जाए तो लोग मेरे पास आते हैं; वे कहते हैं, आप कुछ करते क्यों नहीं? मैं कहता हूं : अकाल पड़ते रहे, तुम सदा करते रहे।
अकाल फिर भी पड़ते रहेंगे, तुम करते ही रहना। कहीं बाढ़ आ जाए तो लोग कहते हैं, आप कुछ करते क्यों नहीं?
मैं किसी और बड़े अकाल को देख रहा हूं जिसमें आत्मा मरी जा रही है। मैं किसी और बड़ी बाढ़ को देख रहा हूं जिसमें प्राण डूबे जा रहे हैं। मैं किसी एक बहुत बड़ी भयंकर दुर्घटना को देख रहा हूं जो रोज करीब आती जा रही है। और अगर आदमी को नहीं जगाया जा सका तो यह पृथ्वी ज्यादा दिन आबाद नहीं रहेगी।
आदमी के दिन इने-गिने हैं, अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं।
अगर हम दुनिया में कुछ बुद्ध, कुछ महावीर, कुछ जीसस, कुछ मोहम्मद पैदा न कर सके तो यह आदमी गया । इसलिए देश, राजनीति, समाजशास्त्र, अर्थ--इस सब में मेरी चिंता नहीं
ओशो
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