ओशो : असमानता का विष
असमानता का विष
स्त्रियां अगर सब दिशाओं में फैल जायें और जीवन घरों में बंद न रह जाये, क्योंकि घरों का काम इतना उबाने वाला है, इतना बोरिंग है, इतना बोर्डम से भरा हुआ है कि उसे तो मशीन के हाथ में धीरे—धीरे छोड़ देना चाहिए। आदमी को करने की—न स्त्रियों को, न पुरुषों को—कोई जरूरत नहीं है। रोज सुबह वही काम, रोज दोपहर वही काम, रोज सांझ वही काम!
एक स्त्री चालीस पचास वर्ष तक एक मशीन की तरह सुबह से सांझ, यंत्र की तरह घूमती रहती है और वही काम करती रहती है। और इसका परिणाम क्या होता है? इसका परिणाम है कि मनुष्य के पूरे जीवन में विष घुल जाता है।
एक स्त्री जब चौबीस घंटे ऊब वाला काम करती है। रोज बर्तन मलती है—वही बर्तन, वही मलना; वहीं रोटी, वही खाना; वही उठना, वही कपड़े धोना, वही बिस्तर लगाना; रोज एक चक्कर में सारा काम चलता है। थोड़े दिन में वह इस सबसे ऊब जाती है। लेकिन करना पडता है।
और जिस काम से कोई ऊब गया हो और करना पड़े तो उसका बदला वह किसी न किसी से लेगी। इसलिए स्रियां हर पुरुष से हर तरह का बदला ले रही हैं। हर तरह का बदला,पुरुष घर आया कि स्त्री तैयार है टूटने के लिए। इसलिए पुरुष घर के बाहर—बाहर घूमते फिरते हैं। क्लब बनाते हैं। सिनेमा जाते हैं, पच्चीस उपाय सोचते हैं।
वह अपने को समझा रहे हैं कि स्त्री नर्क का द्वार है। सावधान! बचना! स्त्री की तरफ देखना भी मत। यह इन घबड़ाये हुए, भागे हुए एस्केपिस्ट, पलायनवादी लोगों ने स्त्री को समझने, स्त्री को आदृत होने, सम्मानित होने, साथ खड़े होने का मौका नहीं दिया।
एक बार कुछ दिन पहले, किसी ने आकर मुझे खबर दी कि एक बहुत बड़े संन्यासी प्रवचन कर रहे है। आपने उनके प्रवचन सुने होंगे, नाम तो काही होगा। वह प्रवचन कर रहे हैं। भगवान की कथा कर रहे हैं! या कुछ कर रहे हैं, स्त्री नहीं छू सकती हैं उन्हें! एक स्री अजनबी आयी होगी! उसने उनके पैर छू लिए! तो महाराज भारी कष्ट में पड़ गये हैं! अपवित्र हो गये है! उन्होने सात दिन का उपवास किया है शुद्ध के लिए! जहा दस पन्द्रह हजार स्रियां पहुंचती थीं, वहाँ सात दिन के उपवास के कारण एक लाख स्रियां इकट्ठी होने लगीं कि यह आदमी असली साधु है!
स्रियां भी यही सोचती है कि जो उनके छूने से अपवित्र हो जायेगा, असली साधु है! पुरूषों ने उनको समझाया हुआ है। नहीं तो वहां एक स्त्री भी नहीं जानी थी फिर। क्योंकि स्त्री के लिए भारी अपमान की बात है।
लेकिन अपमान का खयाल ही मिट गया है। लम्बी गुलामी अपमान के खयाल मिटा देती है। लाख स्रियां वहां इकट्ठी हो गयी है! सारे शहर में यही चर्चा है कि यह आदमी है असली साधु! स्त्री के छूने से अपवित्र हो गया है! सात दिन का उपवास कर रहा है! उन महाराज को किसी को पूछना चाहिए,
आप पैदा किस से हुए थे? हड्डी, मांस, मज्जा किसने बनाया था? वह सब स्त्री से लेकर आ गये हैं। और अब अपवित्र होते है स्त्री के छूने से। हद्द कमजोर साधुता है, जो स्त्री के छूने से अपवित्र हो जाती है! लेकिन इन्ही सारे लोगों की लम्बी परपरा ने स्त्री को दीन—हीन और नीचा बनाया है। और मजा यह है—मजा यह है, कि यह जो दीन—हीनता की लम्बी परपरा है, इस परंपरा को तो स्त्रियां ही पूरी तरह बल देने में अग्रणी है! कभी के मंदिर मिट जायें और कभी के गिरजे समाप्त हो जायें—स्रियां ही पालन पोषण कर रही है मंदिरो, गिरजों, साधु, संतो—महंतों का। चार स्रियां दिखायी पड़ेगी एक साधु के पास, तब कही एक पुरुष दिखायी पड़ेगा। वह पुरुष भी अपनी पत्नी के पीछे बेचारा चला आया हुआ होगा।
तीसरी बात मैं आप से यह कहना चाहती हू कि जब तक हम स्त्री—पुरुष के बीच के ये अपमानजनक फासले, ये अपमानजनक दूरियां—कि छूने से कोई अपवित्र हो जायेगा—नहीं तोड़ देते हैं, तब तक शायद हम स्त्री को समान हक भी नहीं दे सकते।
को—एजुकेशन शुरू हुई थी। सैकड़ों विश्वविद्यालय, महाविद्यालय को—एजुकेशन दे रहे हैं। लड़कियां और लड़के साथ पढ़ रहे थे । लेकिन बड़ी अजीब—सी हालत दिखायी पड़ती थी । लड़के एक तरफ बैठे हुए है! लड़कियां दूसरी तरफ बैठी हुई थी! बीच में पुलिस की तरह प्रोफेसर खड़ा हुआ था! यह कोई मतलब है? यह कितना अशोभन था! अनकल्वर्ड था। को—एजुकेशन का अब एक ही मतलब हो सकता है कि कालेज या विश्वविद्यालय स्त्री पुरुष में कोई फर्क नहीं करता। को—एजुकेशन का एक ही मतलब हो सकता है—कालेज की दृष्टि में सेक्स—डिफरेंसेस का कोई सवाल नहीं है।
आखिरी बात, और अपनी चर्चा मैं पूरी कर दूंगी। एक बात आखिरी।
और वह यह कि अगर एक बेहतर दुनिया बनानी हो तो स्त्री पुरुष के समस्त फासले गिरा देने हैं। भिन्नता बचेगी, लेकिन समान तल पर दोनों को खड़ा कर देना है और ऐसा इंतजाम करना है कि ‘स्त्री को स्त्री होने की कांशसनेस’ और ‘पुरुष को पुरुष होने की कांशसनेस’ चौबीस घंटे न घेरे रहे। यह पता भी नहीं चलना चाहिए। यह चौबीस घंटे ख्याल भी नहीं होना चाहिए। अगर कहीं बहुत लोग यहां बैठे हों, और एक स्त्री आये तो सारे लोगों को खयाल हो जाता है कि स्त्री आ गयी। स्त्री को भी पूरा खयाल है कि पुरुष यहाँ बैठे हुए है। यह अशिष्टता है, अनकल्वर्डनेस है, असंस्कृति है, असभ्यता है। यह बोध नहीं होना चाहिए। ये बोध गिरने चाहिए। अगर ये गिर सकें तो हम एक अच्छे समाज का निर्माण कर सकते हैं। मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना, उससे बहुत अनुगृहित हूं।
और अंत में सबको प्रणाम करतीं हूं।
मेरे प्रणाम स्वीकार करें।
ओशो
स्त्रियां अगर सब दिशाओं में फैल जायें और जीवन घरों में बंद न रह जाये, क्योंकि घरों का काम इतना उबाने वाला है, इतना बोरिंग है, इतना बोर्डम से भरा हुआ है कि उसे तो मशीन के हाथ में धीरे—धीरे छोड़ देना चाहिए। आदमी को करने की—न स्त्रियों को, न पुरुषों को—कोई जरूरत नहीं है। रोज सुबह वही काम, रोज दोपहर वही काम, रोज सांझ वही काम!
एक स्त्री चालीस पचास वर्ष तक एक मशीन की तरह सुबह से सांझ, यंत्र की तरह घूमती रहती है और वही काम करती रहती है। और इसका परिणाम क्या होता है? इसका परिणाम है कि मनुष्य के पूरे जीवन में विष घुल जाता है।
एक स्त्री जब चौबीस घंटे ऊब वाला काम करती है। रोज बर्तन मलती है—वही बर्तन, वही मलना; वहीं रोटी, वही खाना; वही उठना, वही कपड़े धोना, वही बिस्तर लगाना; रोज एक चक्कर में सारा काम चलता है। थोड़े दिन में वह इस सबसे ऊब जाती है। लेकिन करना पडता है।
और जिस काम से कोई ऊब गया हो और करना पड़े तो उसका बदला वह किसी न किसी से लेगी। इसलिए स्रियां हर पुरुष से हर तरह का बदला ले रही हैं। हर तरह का बदला,पुरुष घर आया कि स्त्री तैयार है टूटने के लिए। इसलिए पुरुष घर के बाहर—बाहर घूमते फिरते हैं। क्लब बनाते हैं। सिनेमा जाते हैं, पच्चीस उपाय सोचते हैं।
वह अपने को समझा रहे हैं कि स्त्री नर्क का द्वार है। सावधान! बचना! स्त्री की तरफ देखना भी मत। यह इन घबड़ाये हुए, भागे हुए एस्केपिस्ट, पलायनवादी लोगों ने स्त्री को समझने, स्त्री को आदृत होने, सम्मानित होने, साथ खड़े होने का मौका नहीं दिया।
एक बार कुछ दिन पहले, किसी ने आकर मुझे खबर दी कि एक बहुत बड़े संन्यासी प्रवचन कर रहे है। आपने उनके प्रवचन सुने होंगे, नाम तो काही होगा। वह प्रवचन कर रहे हैं। भगवान की कथा कर रहे हैं! या कुछ कर रहे हैं, स्त्री नहीं छू सकती हैं उन्हें! एक स्री अजनबी आयी होगी! उसने उनके पैर छू लिए! तो महाराज भारी कष्ट में पड़ गये हैं! अपवित्र हो गये है! उन्होने सात दिन का उपवास किया है शुद्ध के लिए! जहा दस पन्द्रह हजार स्रियां पहुंचती थीं, वहाँ सात दिन के उपवास के कारण एक लाख स्रियां इकट्ठी होने लगीं कि यह आदमी असली साधु है!
स्रियां भी यही सोचती है कि जो उनके छूने से अपवित्र हो जायेगा, असली साधु है! पुरूषों ने उनको समझाया हुआ है। नहीं तो वहां एक स्त्री भी नहीं जानी थी फिर। क्योंकि स्त्री के लिए भारी अपमान की बात है।
लेकिन अपमान का खयाल ही मिट गया है। लम्बी गुलामी अपमान के खयाल मिटा देती है। लाख स्रियां वहां इकट्ठी हो गयी है! सारे शहर में यही चर्चा है कि यह आदमी है असली साधु! स्त्री के छूने से अपवित्र हो गया है! सात दिन का उपवास कर रहा है! उन महाराज को किसी को पूछना चाहिए,
आप पैदा किस से हुए थे? हड्डी, मांस, मज्जा किसने बनाया था? वह सब स्त्री से लेकर आ गये हैं। और अब अपवित्र होते है स्त्री के छूने से। हद्द कमजोर साधुता है, जो स्त्री के छूने से अपवित्र हो जाती है! लेकिन इन्ही सारे लोगों की लम्बी परपरा ने स्त्री को दीन—हीन और नीचा बनाया है। और मजा यह है—मजा यह है, कि यह जो दीन—हीनता की लम्बी परपरा है, इस परंपरा को तो स्त्रियां ही पूरी तरह बल देने में अग्रणी है! कभी के मंदिर मिट जायें और कभी के गिरजे समाप्त हो जायें—स्रियां ही पालन पोषण कर रही है मंदिरो, गिरजों, साधु, संतो—महंतों का। चार स्रियां दिखायी पड़ेगी एक साधु के पास, तब कही एक पुरुष दिखायी पड़ेगा। वह पुरुष भी अपनी पत्नी के पीछे बेचारा चला आया हुआ होगा।
तीसरी बात मैं आप से यह कहना चाहती हू कि जब तक हम स्त्री—पुरुष के बीच के ये अपमानजनक फासले, ये अपमानजनक दूरियां—कि छूने से कोई अपवित्र हो जायेगा—नहीं तोड़ देते हैं, तब तक शायद हम स्त्री को समान हक भी नहीं दे सकते।
को—एजुकेशन शुरू हुई थी। सैकड़ों विश्वविद्यालय, महाविद्यालय को—एजुकेशन दे रहे हैं। लड़कियां और लड़के साथ पढ़ रहे थे । लेकिन बड़ी अजीब—सी हालत दिखायी पड़ती थी । लड़के एक तरफ बैठे हुए है! लड़कियां दूसरी तरफ बैठी हुई थी! बीच में पुलिस की तरह प्रोफेसर खड़ा हुआ था! यह कोई मतलब है? यह कितना अशोभन था! अनकल्वर्ड था। को—एजुकेशन का अब एक ही मतलब हो सकता है कि कालेज या विश्वविद्यालय स्त्री पुरुष में कोई फर्क नहीं करता। को—एजुकेशन का एक ही मतलब हो सकता है—कालेज की दृष्टि में सेक्स—डिफरेंसेस का कोई सवाल नहीं है।
आखिरी बात, और अपनी चर्चा मैं पूरी कर दूंगी। एक बात आखिरी।
और वह यह कि अगर एक बेहतर दुनिया बनानी हो तो स्त्री पुरुष के समस्त फासले गिरा देने हैं। भिन्नता बचेगी, लेकिन समान तल पर दोनों को खड़ा कर देना है और ऐसा इंतजाम करना है कि ‘स्त्री को स्त्री होने की कांशसनेस’ और ‘पुरुष को पुरुष होने की कांशसनेस’ चौबीस घंटे न घेरे रहे। यह पता भी नहीं चलना चाहिए। यह चौबीस घंटे ख्याल भी नहीं होना चाहिए। अगर कहीं बहुत लोग यहां बैठे हों, और एक स्त्री आये तो सारे लोगों को खयाल हो जाता है कि स्त्री आ गयी। स्त्री को भी पूरा खयाल है कि पुरुष यहाँ बैठे हुए है। यह अशिष्टता है, अनकल्वर्डनेस है, असंस्कृति है, असभ्यता है। यह बोध नहीं होना चाहिए। ये बोध गिरने चाहिए। अगर ये गिर सकें तो हम एक अच्छे समाज का निर्माण कर सकते हैं। मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना, उससे बहुत अनुगृहित हूं।
और अंत में सबको प्रणाम करतीं हूं।
मेरे प्रणाम स्वीकार करें।
ओशो
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