ओशो : भक्ति निराकार का निराकार से मिलने का शास्त्र है।
भक्ति निराकार का निराकार से मिलने का शास्त्र है।
मन तरल है। मन प्रतिपल बदलता रहता है। उसकी तरलता अनूठी है।
कामवासना है शरीर जैसी और शरीर की
प्रेम है मन जैसा और मन का।
प्रेम की मांग शरीर की मांग से ऊपर है। प्रेम कहता है: दूसरे का मन मिल जाए! प्रेम करने वाला वेश्या के द्वार पर न जाएगा। यह बात ही बेहूदी मालूम पड़ेगी। यह बात ही संभव नहीं है। यह सोच भी बेहूदा मालूम पड़ेगा। लेकिन कामवासना से भरा व्यक्ति वेश्या के घर चला जाएगा; शरीर की ही मांग है।
शरीर खरीदा जा सकता है; मन खरीदा नहीं जा सकता।
शरीर जड़ है। मन थोड़ा-थोड़ा चेतन है; इसलिए इतना नीचे नहीं उतरा जा सकता कि खरीद और बेच की जा सके।
मन प्रेम मांगता है: कोई, जो अपना सर्वस्व देने को तैयार हो, बिना किसी शर्त के। मन अपने को किसी को दे देना चाहता है, बेशर्त लुटा देना चाहता है। मन की मांग प्रेम की है।
जब दो मन मिलते हैं तो जो रस पैदा होता है, उसका नाम प्रेम है। जब दो शरीर मिलते हैं तो जो रस पैदा होता है, उसका नाम काम है।
फिर मन के भी पार तुम्हारा अस्तित्व है--आत्मा का। आत्मा ऐसे है जैसे पानी भाप बनकर आकाश में उड़ गया। पानी ही है, लेकिन अब तरल सीमा भी न रही। अब कोई सीमा न रही; आकाश में फैलना हो गया! अदृश्य हो जाती है भाप; थोड़ी दूर तक दिखायी पड़ती है, फिर खो जाती है!
आत्मा अदृश्य है--भाप जैसी!
आत्मा की तलाश किसकी है!
शरीर मांगता है शरीर को। मन मांगता है मन को। आत्मा मांगती है आत्मा को।
शरीर और शरीर के मिलन से जो रस पैदा होता है--क्षणभंगुर-उसका नाम: काम। मन और मन के मिलन से जो रस पैदा होता है- थोड़ा ज्यादा स्थायी, जीवन भर चल सकता है। आकांक्षा तो मन की होती है कि जीवन के पार भी चलेगा। प्रेमी कहते हैं, " मौत हमारे प्रेम को न तोड़ पाएगी।' अगर प्रेम जाना है, तो प्रेमी कहता है, "कुछ हमें छुड़ा न पाएगा। शरीर मिट जाएगा तो भी हमारा प्रेम नष्ट न होगा।
यह कामना ही है, लेकिन मन थोड़ा ज्यादा दूरगामी है। शरीर से उसकी सीमा थोड़ी बड़ी है।
फिर आत्मा है; शाश्वत की मांग है उसकी। उससे कम पर उसकी तृप्ति नहीं। क्षणभंगुर को भी क्या चाहना! अंधेरी रात में क्षण-भर को बिजली चमकती है, फिर अंधेरा और अंधेरा हो जाता है। दुख ही बेहतर है। दुख की दुनिया में क्षण-भर को सुख का फूल खिलता है, दुख और दूभर हो जाता है, फिर झेलना और मुश्किल हो जाता है।
आत्मा मन के प्रेम को भी नहीं मांगती, क्योंकि मन तरल है: आज किसी से प्रेम किया, कल किसी और के प्रेम में पड़ सकता है। मन का कोई बहुत भरोसा नहीं है। जब प्रेम में होता है तो ऐसा ही कहता है, "अब तेरे सिवाय किसी को कभी प्रेम न कर सकूंगा। अब तेरे सिवाय मेरे लिए कोई और नहीं।' मगर ये मन की ही बातें हैं। मन का भरोसा कितना! आज कहता है; कल बदल जाए! अभी कहता है; अभी बदल जाए!
मन पानी की तरह तरल है।
आत्मा की मांग है शाश्वत की, चिरंतन की, सनातन की। आत्मा की मांग है आत्मा की आत्मा और आत्मा के मिलन पर जो रस पैदा होता है, उसका नाम भक्ति है।
शरीर की सीमा है ठोस। मन की सीमा है तरल। आत्मा की कोई सीमा नहीं।
काम क्षणभंगुर है। प्रेम थोड़ा दूर तक जाता है, थोड़ा स्थायी हो सकता है। भक्ति शाश्वत है।
काम में शरीर और शरीर का मिलन होता है--स्थूल का स्थूल से; मन में--सूक्ष्म का सूक्ष्म से; आत्मा में--निराकार का निराकार से। भक्ति निराकार का निराकार से मिलने का शास्त्र है।
ओशो
भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-01
पहला प्रवचन— परम प्रेमरूपा है
मन तरल है। मन प्रतिपल बदलता रहता है। उसकी तरलता अनूठी है।
कामवासना है शरीर जैसी और शरीर की
प्रेम है मन जैसा और मन का।
प्रेम की मांग शरीर की मांग से ऊपर है। प्रेम कहता है: दूसरे का मन मिल जाए! प्रेम करने वाला वेश्या के द्वार पर न जाएगा। यह बात ही बेहूदी मालूम पड़ेगी। यह बात ही संभव नहीं है। यह सोच भी बेहूदा मालूम पड़ेगा। लेकिन कामवासना से भरा व्यक्ति वेश्या के घर चला जाएगा; शरीर की ही मांग है।
शरीर खरीदा जा सकता है; मन खरीदा नहीं जा सकता।
शरीर जड़ है। मन थोड़ा-थोड़ा चेतन है; इसलिए इतना नीचे नहीं उतरा जा सकता कि खरीद और बेच की जा सके।
मन प्रेम मांगता है: कोई, जो अपना सर्वस्व देने को तैयार हो, बिना किसी शर्त के। मन अपने को किसी को दे देना चाहता है, बेशर्त लुटा देना चाहता है। मन की मांग प्रेम की है।
जब दो मन मिलते हैं तो जो रस पैदा होता है, उसका नाम प्रेम है। जब दो शरीर मिलते हैं तो जो रस पैदा होता है, उसका नाम काम है।
फिर मन के भी पार तुम्हारा अस्तित्व है--आत्मा का। आत्मा ऐसे है जैसे पानी भाप बनकर आकाश में उड़ गया। पानी ही है, लेकिन अब तरल सीमा भी न रही। अब कोई सीमा न रही; आकाश में फैलना हो गया! अदृश्य हो जाती है भाप; थोड़ी दूर तक दिखायी पड़ती है, फिर खो जाती है!
आत्मा अदृश्य है--भाप जैसी!
आत्मा की तलाश किसकी है!
शरीर मांगता है शरीर को। मन मांगता है मन को। आत्मा मांगती है आत्मा को।
शरीर और शरीर के मिलन से जो रस पैदा होता है--क्षणभंगुर-उसका नाम: काम। मन और मन के मिलन से जो रस पैदा होता है- थोड़ा ज्यादा स्थायी, जीवन भर चल सकता है। आकांक्षा तो मन की होती है कि जीवन के पार भी चलेगा। प्रेमी कहते हैं, " मौत हमारे प्रेम को न तोड़ पाएगी।' अगर प्रेम जाना है, तो प्रेमी कहता है, "कुछ हमें छुड़ा न पाएगा। शरीर मिट जाएगा तो भी हमारा प्रेम नष्ट न होगा।
यह कामना ही है, लेकिन मन थोड़ा ज्यादा दूरगामी है। शरीर से उसकी सीमा थोड़ी बड़ी है।
फिर आत्मा है; शाश्वत की मांग है उसकी। उससे कम पर उसकी तृप्ति नहीं। क्षणभंगुर को भी क्या चाहना! अंधेरी रात में क्षण-भर को बिजली चमकती है, फिर अंधेरा और अंधेरा हो जाता है। दुख ही बेहतर है। दुख की दुनिया में क्षण-भर को सुख का फूल खिलता है, दुख और दूभर हो जाता है, फिर झेलना और मुश्किल हो जाता है।
आत्मा मन के प्रेम को भी नहीं मांगती, क्योंकि मन तरल है: आज किसी से प्रेम किया, कल किसी और के प्रेम में पड़ सकता है। मन का कोई बहुत भरोसा नहीं है। जब प्रेम में होता है तो ऐसा ही कहता है, "अब तेरे सिवाय किसी को कभी प्रेम न कर सकूंगा। अब तेरे सिवाय मेरे लिए कोई और नहीं।' मगर ये मन की ही बातें हैं। मन का भरोसा कितना! आज कहता है; कल बदल जाए! अभी कहता है; अभी बदल जाए!
मन पानी की तरह तरल है।
आत्मा की मांग है शाश्वत की, चिरंतन की, सनातन की। आत्मा की मांग है आत्मा की आत्मा और आत्मा के मिलन पर जो रस पैदा होता है, उसका नाम भक्ति है।
शरीर की सीमा है ठोस। मन की सीमा है तरल। आत्मा की कोई सीमा नहीं।
काम क्षणभंगुर है। प्रेम थोड़ा दूर तक जाता है, थोड़ा स्थायी हो सकता है। भक्ति शाश्वत है।
काम में शरीर और शरीर का मिलन होता है--स्थूल का स्थूल से; मन में--सूक्ष्म का सूक्ष्म से; आत्मा में--निराकार का निराकार से। भक्ति निराकार का निराकार से मिलने का शास्त्र है।
ओशो
भक्तिसूत्र (नारद)—प्रवचन-01
पहला प्रवचन— परम प्रेमरूपा है
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