ओशो : "संसार' शब्द का अर्थ होता है: चाक, जो घूम रहा है; व्हील, जो घूमता चला जाता है।

जीवन वर्तुलाकार है। वर्षा आती है। गर्मी आती है। सर्दी आती है। घूमता रहता है चाक। फिर वर्षा आती है। फिर वही होता है। फिर वही होता है। सुबह होती है, सूरज निकलता है। सांझ होती है, सूरज ढल जाता है। फिर सुबह होती है। दिन आता, रात आती, फिर दिन आता है। ऐसा ही होता रहता है। यह शाश्वत चक्र है। इसलिए इसको हमने संसार कहा है।

"संसार' शब्द का अर्थ होता है: चाक, जो घूम रहा है; व्हील, जो घूमता चला जाता है।

लेकिन हमारी जिंदगी छोटी है। सत्तर साल की जिंदगी में हम कुछ जान पाते हैं थोड़ा—बहुत। हमारा बोध संकीर्ण। हमसे पहले भी लोग हुए हैं। उन्होंने भी ऐसा ही चाहा, उन्होंने भी ऐसा ही जीया है—इसका हमें पता नहीं होता।

तुम जब पद की आकांक्षा में दौड़ते हो तो तुम सोचते हो: तुम नये दौड़ने वाले हो, तुम नये धावक! तो फिर नेपोलियन और सिकंदर और तैमूर और चंगीज और नादिर तुम्हें याद नहीं।
जब तुम्हें पहली दफा समाधि घटित होगी, तब भी तुम्हें ऐसा लगेगा कि यह तो कभी किसी को नहीं हुआ। फिर बुद्ध और महावीर और मीरा और चैतन्य और कबीर...? जब तुम्हारा परमात्मा से पहली दफा मिलन होगा तब भी ऐसा लगेगा कि ऐसा तो कभी नहीं हुआ। तुम्हें तो कभी नहीं हुआ था पहले, यह सच है। तुम्हें नया हो रहा है, लेकिन यह घटना जगत में नई नहीं है। यह शाश्वत है।

मनुष्य का मन नये के लिए बड़ा आतुर है। मनुष्य का मन उत्तेजना खोजता है। नये में उत्तेजना होती है। मनुष्य का मन सदा नये की तलाश करता है। तुमने आज जो भोजन किया, कल भी करना पड़े तो मन राजी नहीं होता। हालांकि आज जब किया था, तुमने बड़ी प्रशंसा की थी।

ओशो : पद घुंघरू बांध - मीरा भाई (18-289)

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