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Showing posts from December, 2020

ओशो : "तीर्थ है, मंदिर है, उनका सारा का सारा विज्ञान है।

  "तीर्थ है, मंदिर है, उनका सारा का सारा विज्ञान है। और उस पूरे विज्ञान की अपनी सूत्रबद्ध प्रक्रिया है।…  एक भी कदम बीच में खो जाए, एक भी सूत्र बीच में खो जाए, तो परिणाम नहीं होता। जिन गुप्त तीर्थों की मैं बात कर रहा हूं उनके द्वार हैं, उन तक पहुंचने की व्यवस्थाएं हैं, लेकिन उन सबके आंतरिक सूत्र हैं। इन तीर्थों में ऐसा सारा इंतजाम है कि जिनका उपयोग करके चेतना गतिमान हो सके।"—ओशो

ओशो : तीर्थ -- मिश्र के पिरामिड एक रहस्‍य

 तीर्थ--(मिश्र के पिरामिड एक रहस्‍य)    सब तीर्थ बहुत ख्‍याल से बनाये गए है। अब जै कि मिश्र में पिरामिड है। वे मिश्र में पुरानी  खो गई  सभ्‍यता के तीर्थ है। और एक बड़ी मजे की बात है कि इन पिरामिड के अंदर....। क्‍योंकि पिरामिड जब बने तब, वैज्ञानिको का खयाल है, उस काल में इलैक्ट्रिसिटी हो नहीं सकती।       आदमी के पास बिजली नहीं हो सकती। बिजली का आविष्‍कार उस वक्‍त कहां, कोई दस हजार वर्ष पुराना पिरामिड है, कई बीस हजार वर्ष पुराना पिरामिड है। तब बिजली का तो कोई उपाय नहीं था। और इनके अंदर इतना अँधेरा कि उस  अंधेरे में जाने का कोई उपाय  नहीं है। अनुमान यह लगाया जा सकता है कि लोग मशाल ले जाते हों, या दीये ले जाते हो। लेकिन धुएँ का एक भी निशान नहीं है इतने पिरामिड में कहीं । इसलिए बड़ी मुश्‍किल है। एक छोटा सा दीया घर में जलाएगें तो पता चल जाता है। अगर लोग मशालें भीतर ले गए हों तो इन पत्‍थरों पर कहीं न कहीं न कहीं धुएँ के निशान तो होने चाहिए।       रास्‍ते इतने लंबे, इतने मोड़ वाले है, और गहन अंधकार है। तो दो ही उपाय हैं, या तो हम ...

ओशो : शून्य से प्रवेश

 शून्य है दरवाजा  एक मकान में से  सामन को निकालना  शुरू कर दे,  सारा फर्नीचर  बाहर कर दे।  दरवाजे से  फोटुएं निकाल ले,  केलेंडर निकाल लें।  जब सब चीज़ें  निकल जाए तब भी  कुछ पीछे रह जाता है।  तब पीछे क्या रह जाता है ? खालीपन पीछे रह जाता है।  वह खालीपन ही मकान है ।  पीछे कुछ रह जाता है ?  खाली मकान  पीछे रह जाता है ।  और हम  उस खालीपन में चीज़ें  भरते चले जाएँ और  हम इतनी चीज़ें भर दें  की भीतर जाना  मुश्किल हो जाए ,  तो फिर मकान तो है ,  लेकिन भरा मकान है  जिसमें प्रवेश भी  नही पाया जा सकता । मन भी एक मकान है,  जिस मकान में हम  शब्दों को भरते चले जाते है ।  शब्द इतने भर जाते है की  फिर मन के भीतर प्रवेश  मुश्किल हो जाता है ।  कभी अपने भीतर गए है ?  सिवाय शब्दों के वहां  कुछ भी नही मिलेगा ।  भीतर जाएंगे और  शब्द ही शब्द  टकराते मिलेंगे ।  जैसे बाज़ार में चले जाएँ  और आदमी ही आदमी मिलेंगे, ...

ओशो : ध्यान क्या है ?

 ओशो द्वारा दिए गए ध्यान-प्रयोगों एवं ध्यान पर दिए गए प्रवचनांशों का संकलन। उद्धरण : ध्‍यानयोग : प्रथम और अंतिम मुक्‍ति - पहला खंड : ध्यान के विषय में - ध्यान क्या है? "साक्षी होना ध्यान है। तुम क्या देखते हो, यह बात गौण है। तुम वृक्षों को देख सकते हो, तुम नदी को देख सकते हो, बादलों को देख सकते हो, तुम बच्चों को आस-पास खेलता हुआ देख सकते हो। साक्षी होना ध्यान है। तुम क्या देखते हो यह बात नहीं है; विषय-वस्तु की बात नहीं है। देखने की गुणवत्ता, होशपूर्ण और सजग होने की गुणवत्ता--यह है ध्यान।  एक बात ध्यान रखें : ध्यान का अर्थ है होश। तुम जो कुछ भी होशपूर्वक करते हो वह ध्यान है। कर्म क्या है, यह प्रश्न नहीं, किंतु गुणवत्ता जो तुम कर्म में ले आते हो, उसकी बात है। चलना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक चलो। बैठना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक बैठ सको। पक्षियों की चहचहाहट को सुनना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक सुन सको। या केवल अपने भीतर मन की आवाजों को सुनना ध्यान बन सकता है, यदि तुम सजग और साक्षी रह सको। सारी बात यह है कि तुम सोए-सोए मत रहो। फिर जो भी हो, वह ध्यान होगा।...