ओशो : शून्य का अर्थ है अहंकार से शून्य हो जाना..

शून्य का अर्थ है अहंकार से शून्य हो जाना..इसलिए दुनिया में धन के त्याग को मैं त्याग नहीं कहता घर के त्याग को मैं त्याग नहीं कहता पद के त्याग को मैं त्याग नहीं कहता..क्योंकि ये सब त्याग होकर भी यह हो सकता है कि जिस चीज की ये पूर्ति करते थे उसी की पूर्ति इनका त्याग भी करता हो सिर्फ एक चीज के त्याग को मैं त्याग कहता हूं और वह अहमता है और किसी चीज के त्याग को मैं त्याग नहीं कहता सिर्फ अहमता के त्याग को मैं त्याग कहता हूं..सिर्फ अहमता के न हो जाने को मैं त्याग कहता हूं

लेकिन क्या करेंगे? समझ में यह बात आ जाए कि अहंकार बुरा है कितने दिनों से यह शिक्षा दी गई है कि अहंकार बुरा है और अहंकार पाप है और अहंकार छोड़ना चाहिए..क्या करेंगे? अगर यह समझ में भी आ जाए कि अहंकार बुरा है तो क्या करेंगे? आप छोड़ने में लग जाएंगे कि मैं अहंकार को छोडू.. यह बड़ा पागलपन हो जाएगा कौन अहंकार को छोड़ेगा? अहंकार ही न, वही मैं..तो आप उस भूल में पड़ जाएंगे जैसे एक कुत्ता अपनी पूंछ को पकड़ने की कोशिश में लगा हो वह उचकता है और पूंछ उचक जाती है वह फिर उचकता है फिर वह बड़ा हैरान हो जाता है कि मैं अपनी पूंछ को नहीं पकड़ पाता, क्या बात है? जितना वह नहीं पकड़ पाता है उतना ही दौड़ता है उतनी ही मुश्किल हो जाती है..कुत्ता अपनी पूंछ को नहीं पकड़ सकता अहंकार अहंकार को नष्ट नहीं कर सकता है

अहंकार को विनाश करने के लिए अनेक लोग उत्सुक होते हैं कि अहंकार चला जाए लेकिन जितनी वे चेष्टा करते हैं अहंकार उनके डर के कारण उतना सूक्ष्म होता चला जाता है पीछे सरकता जाता है ऊपर से विलीन हो जाता है भीतर बैठ जाता है और ऊपर का अहंकार बेहतर भीतर का अहंकार बहुत घातक क्योंकि ऊपर का दिखता है, भीतर का दिखता नहीं वह बहुत भीतर सरकता जाता है साधु में, संन्यासी में, जिसको हम कहते हैं, उसमें जो अहंकार की सूक्ष्मता है वह सामान्यजन में भी नहीं होती इसीलिए दुनिया के साधु एक-दूसरे से नहीं मिल पाते उनके बीच दीवाल खड़ी है कौन सी दीवाल? गृहस्थ के बीच तो मकानों की दीवालें हैं..समझ में आता है लेकिन साधुओं के बीच कौन सी दीवाल है जिनके कोई मकान नहीं हैं? गृहस्थों के बीच तो खैर मकानों की दीवालें हैं पड़ोसी के पास कैसे जाएं? बीच में दीवाल है लेकिन साधुओं के पास कौन सी दीवालें हैं?

लेकिन साधुओं के पास और सूक्ष्म दीवालें हैं..उनके अहंकार की दीवालें हैं तो ये मिट्टी की दीवालें तो खोद कर फेंक दी जाएं आधा घंटे में लेकिन अहंकार की दीवालों को खोदने में जन्म-जन्म लग जाते हैं..वे बहुत सूक्ष्म होकर पकड़ लेती हैं

अहमता को सीधा नष्ट नहीं किया जा सकता और जो अहंकार को सीधा नष्ट करने में लगेगा वह भूल में पड़ जाएगा अहंकार सूक्ष्म हो जाएगा अचेतन हो जाएगा अनकांशस हो जाएगा भीतर बैठ जाएगा उसके रास्ते ऊपर से दिखाई पड़ने बंद हो जाएंगे और उसकी जड़ें भीतर प्रविष्ट हो जाएंगी और वह पूरी आत्मा को ग्रसित कर लेगा पूरी आत्मा को पकड़ लेगा

एक छोटी सी कहानी कहूं उससे समझ में आएगा कि निर-अहंकारी आदमी से मेरा क्या अर्थ है और फिर मैं समझाऊं कि कैसे निर-अहंकार उत्पन्न हो सकता है तो शून्यता समझ में आ जाएगी

एक गांव के बाहर एक युवा संन्यासी बहुत दिन तक ठहरा था युवा सुंदर था बहुत लोग उसे प्रेम करते और बहुत लोग उसे आदर करते बहुत उसका सम्मान था और उसके विचार का बहुत प्रभाव था.. बड़ी क्रांति की उसकी दृष्टि थी और जीवन में बड़ा बल था और अचानक एक दिन सब बदल गया..वे ही लोग जो गांव के उसे आदर करते थे उन्हीं ने जाकर उसके झोपड़े में आग लगा दी..और वे ही लोग जो उसके पैर छूते थे उन्होंने ही जाकर उसके ऊपर चोटें कीं और जिन्होंने उसे सम्मान दिया था वे ही उसे अनादर देने को तैयार हो गए

अक्सर ऐसा होता है..जो सम्मान देते हैं वे सम्मान देने का बदला किसी भी दिन अपमान करके ले सकते हैं इसलिए सम्मान करने वाले से बहुत डरना पड़ता है क्योंकि वे उसका बदला चुकाएंगे किसी दिन सम्मान देने में उनके अहंकार को चोट लगी है किसी को सम्मान दिया है किसी को ऊपर माना है उनके बहुत गहरे तल पर तो उन्हें बहुत चोट लगी है इसका बदला वे किसी भी दिन ले सकते हैं कोई छोटी सी बात इसका बदला वे ले सकते हैं इसलिए उस आदमी से बहुत डरना पड़ता है जो सम्मान देता हो क्योंकि किसी दिन वह potential अपमान करने वाला है किसी भी दिन वह अपमान कर सकता है वह किसी भी दिन बदला लेगा इस बात का

एक व्यक्ति मेरे पास आए और उन्होंने मेरे पैर छुए मैंने उनसे कहा: पैर मत छुएं इसमें खतरा है

वे बोले: क्या बात है?

खतरा केवल इतना है कि किसी दिन इसका बदला ले सकते हैं आज पैर छुआ है कोई छोटा सा मौका मिल जाए तो मेरे सिर को तोड़ने के लिए लकड़ी भी उठा सकते हैं

उस युवा को बहुत सम्मान दिया था गांव के लोगों ने फिर एक दिन सुबह जाकर उसका अपमान किया बात यह हो गई गांव में एक लड़की को बच्चा हो गया और उसने कहा कि वह संन्यासी का बच्चा है स्वाभाविक था कि वे अपमान करते स्वाभाविक था कि वे अपमान करते बिलकुल ही स्वाभाविक था अब इसमें कौन सी गड़बड़ थी? यह तो वे ठीक ही कर रहे थे गांव के लोग वे उस बच्चे को ले गए और जाकर उस युवा संन्यासी के ऊपर पटक दिया उस संन्यासी ने पूछा कि बात क्या है? क्या मामला है?

वे बोले कि मामला हमसे पूछते हो? यह बच्चे के चेहरे को देखो और पहचानो कि मामला क्या है मामला तुम जानते हो तुम नहीं जानोगे तो कौन जानेगा? यह बच्चा तुम्हारा है

उस संन्यासी ने कहा: IS IT SO? ऐसी बात है? बच्चा मेरा है?

वह बच्चा रोने लगा तो वह संन्यासी उसको उस बच्चे को चुप कराने में लग गया..गांव के लोग आए और गए वे उस बच्चे को वहीं छोड़ गए अभी सुबह थी फिर उस बच्चे को लेकर वह गांव में भिक्षा मांगने गया जैसे रोज गया था..लेकिन आज उसे कौन भिक्षा देता? वे जो सम्मान में करोड़ों दे सकते हैं अपमान में रोटी का एक टुकड़ा भी नहीं दे सकते कौन उसे रोटी देता? जहां वह गया द्वार बंद कर दिए गए..जिस द्वार पर उसने आवाज दी वह दरवाजा बंद हो गया और लोगों ने कहा आगे हो जाओ और पीछे भीड़ थी

एक बच्चे को लेकर किसी संन्यासी ने शायद जमीन पर कभी भीख न मांगी होगी..वह बच्चा रोता था और वह भीख मांग रहा था वह बच्चा रो रहा था और वह संन्यासी हंस रहा था उन लोगों पर जिनका इतना आदर था और जिनका इतना प्रेम था वह उस द्वार पर भी गया जिस घर का वह बच्चा था जिस घर की बच्ची का वह लड़का था उसने वहां भी आवाज दी और उसने कहा कि मेरी फिकर छोड़ दें कसूर भी होगा तो मेरा होगा इस बच्चे का कौन सा कसूर है? इसे कुछ दूध मिल जाए

उस लड़की को सहना मुश्किल हो गया जिसका वह बच्चा था उसने अपने पिता से कहा: मुझे क्षमा करें मैंने झूठ बोला उस संन्यासी का तो मुझसे कोई परिचय भी नहीं है..उस बच्चे के असली बाप को बचाने के लिए मैंने ऐसा कह दिया मैंने सोचा था कि थोड़ा कुछ कहा-सुनी करके आप वापस लौट आएंगे बात यहां तक पहुंच जाएगी यह मेरी कल्पना के बाहर था

घर के लोग घबड़ा गए कि यह क्या हुआ? यह तो बड़ी भूल हो गई यह तो बड़ा मुश्किल हो गया वे नीचे भागे आए वे उसके पैर पर फिर गिर पड़े उसके पैर पड़ने लगे.. बच्चे को उसके हाथ से लेने लगे उसने कहा क्या मामला है? बात क्या है?

उन्होंने कहा: यह बच्चा आपका नहीं है

उसने कहा: IS IT SO? ऐसी बात है कि बच्चा मेरा नहीं? आप ही तो सुबह कहते थे कि बच्चा आपका है

यह आदमी है निर-अहंकार.. लोगों ने उससे कहा तुम कैसे पागल हो? सुबह क्यों नहीं कहा कि बच्चा मेरा नहीं है उसने कहा क्या फर्क पड़ता था? बच्चा जरूर किसी का होगा मेरा भी हो सकता है.. यानी यह बच्चा किसी का तो होगा ही कोई न कोई इसका बाप होगा ही अब तुम मुझे तो गाली दे ही चुके अब एक और आदमी को गाली दोगे क्या फायदा? मेरा मकान जला ही चुके अब एक आदमी का और जलाओगे क्या फायदा है? तो मैंने कहा कि इसमें फर्क भी क्या पड़ता है और अच्छा ही हुआ तुम्हारे सम्मान तुम्हारी श्रद्धा की भी मुझे गहराई पता चल गई..तुम्हारी बातों का भी मुझे मूल्य पता चल गया अच्छा ही हुआ इस बच्चे ने मुझ पर बड़ी कृपा की मुझे कुछ बातें दिखाई पड़ गईं

उन्होंने कहा तुम बिलकुल ही पागल हो..इतना इशारा भर कर देते कि मेरा नहीं है तो सब मामला बदल जाता

उसने कहा क्या फर्क पड़ता था? मेरी इज्जत ही बिगड़ रही थी न ..तो क्या मैं इज्जत के लिए साधु हूं? Respectibility के लिए? तुम्हारा आदर मिले इसलिए? तुम्हारे आदर अनादर का भाव छोड़ा उसी से तो मैं साधु हूं तुम्हारे आदर अनादर को विचार करके मैं कुछ करूं तो फिर मैं कैसा साधु हूं?

असल में भीतर मैं का भाव जिसका विलीन हो जाए वही साधु है और मैं का भाव विलीन हो जाना सीधा नहीं होता कुछ और रास्ते से परोक्ष होता है indirect होता है कैसे indirect होता है? मैं के भाव को विलीन करने के लिए सबसे पहली साधना का अंग है हम मैं को खोजें कि वह कहां है?

महर्षि रमण ने कहा है कि तुम पूछो कि मैं कौन हूं? मैं कहता हूं यह मत पूछना मैं यह कहता हूं कि पूछना कि मैं कहां हूं? अपने चित्त में खोजें हम कि मैं कहां है? अपनी देह में हम खोजें कि मैं कहां है? आपको कहीं भी मिलेगा नहीं..अगर आप शांत बैठ कर खोजें कि मैं कहां हूं? तो आप खोजते रहेंगे और कोई बिंदु नहीं मिलेगा जहां आपको लगे कि यहां मैं हूं अपने भीतर खोज लेने पर कहीं मैं उपलब्ध नहीं होगा ।

ओशो

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