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Showing posts from October, 2020

ओशो : एक सुंदर कहानी

मैं एक छोटी सी कहानी कहूंगा। हिमालय की घाटियों में एक चिड़िया निरंतर रट लगाती है—जुहो! जुहो! जुहो! अगर तुम हिमालय गए हो तो तुमने इस चिड़िया को सुना होगा। इस दर्द भरी पुकार से हिमालय के सारे यात्री परिचित हैं। घने जंगलों में, पहाड़ी झरनों के पास, गहरी घाटियों में निरंतर सुनायी पड़ता है—जुहो! जुहो! जुहो! और एक रिसता दर्द पीछे छूट जाता है। इस पक्षी के संबंध में एक मार्मिक लोक—कथा है। किसी जमाने में एक अत्यंत रूपवती पहाडी कन्या थी, जो वर्ड्सवर्थ की लूसी की भांति झरनों के संगीत, वृक्षों की मर्मर और घाटियों की प्रतिध्वनियों पर पली थी। लेकिन उसका पिता गरीब था और लाचारी में उसने अपनी कन्या को मैदानों में ब्याह दिया। वे मैदान, जहां सूरज आग की तरह तपता है। और झरनों और जंगलों का जहां नाम—निशान भी नहीं। प्रीतम के स्नेह की छाया में वर्षा और सर्दी के दिन तौ किसी तरह बीत गए, कट गए, पर फिर आए सूरज के तपते हुए दिन—वह युवती अकुला उठी पहाड़ों के लिए। उसने नैहर जाने की प्रार्थना की। आग बरसती थी—न सो सकती थी, न उठ सकती थी, न बैठ सकती थी। ऐसी आग उसने कभी जानी न थी। पहाड़ों के झरनों के पास पली थी, पहाड़ों की शीतलता...

ओशो : माया से नहीं, मन से छूटना है ।

बोध कथा.......... माया से नहीं, मन से छूटना है । जापान की प्रसिद्ध कहानी है। एक आदमी की पत्नी मरी। पत्नियां, पहली तो बात, आसानी से मरतीं नहीं; अक्सर तो पतियों को मार कर मरती हैं। स्त्रियां ज्यादा जीती हैं, यह खयाल रखना--पांच साल औसत ज्यादा जीती हैं। आदमी को यह भ्रम है कि हम मजबूत हैं। ऐसी कुछ खास मजबूती नहीं। स्त्रियां ज्यादा मजबूत हैं। उनकी सहने की क्षमता, सहनशीलता आदमी से बहुत ज्यादा है। स्त्रियां कम बीमार पड़ती हैं; आदमी ज्यादा बीमार पड़ता है। स्त्रियां हर बीमारी को पार करके गुजर जाती हैं; आदमी हर बीमारी में टूट जाता है, कोई भी बीमारी तोड़ देती है उसे। और सारी दुनिया में स्त्रियां पांच साल आदमियों से ज्यादा जीती हैं--औसत। और फिर आदमियों को और एक अहंकार है कि समान उम्र की स्त्री से विवाह नहीं करते; पच्चीस साल का जवान हो तो उसे बीस साल की लड़की चाहिए। तो पांच साल का और फर्क हो गया। सो ये भैया दस साल पहले मरेंगे। इसलिए दुनिया में तुम्हें विधवाएं बहुत दिखाई पड़ेंगी, विधुर इतने दिखाई नहीं पड़ेंगे। मगर कभी-कभी चमत्कार भी होता है, वह स्त्री मर गई। मगर मरते-मरते अपने पति को कह गई कि सुन लो, लफंगे...

ओशो : पत्नी का इतना अधिक प्रेम केवल भारत में घट सकता है, और कहीं नहीं ।

पत्नी का इतना अधिक प्रेम केवल भारत में घट सकता है, और कहीं नहीं । एक बहुत सुन्दर #कहानी है। एक महान दार्शनिक था, विचारक, जिसका नाम था #वाचस्पति। वह अपने अध्ययन में बहुत ज्यादा व्यस्त था। एक दिन उसके पिता ने उससे कहा, अब मैं बूढ़ा हो चला और मैं नहीं जानता कि कब किस क्षण विदा हो जाऊँ! और तुम मेरे इकलौते बेटे हो तो मैं चाहता हूँ, तुम विवाहित हो जाओ। वाचस्पति अध्ययन में इतना ज्यादा डूबा हुआ था कि वह बोला, ‘ठीक है’, यह सुने बगैर कि उसके पिता क्या कह रहे हैं। तो उसका विवाह हुआ, पर वह बिलकुल भूला रहा कि उसकी पत्नी थी, इतना डूबा हुआ था वह अपनी अध्ययनशीलता में।और यह केवल भारत में घट सकता है; यह कहीं और नहीं घट सकता। पत्नी उससे इतना अधिक प्रेम करती थी कि वह उसे अड़चन नहीं देना चाहती। तो यह कहा जाता है कि बारह वर्ष गुजर गये। वह छाया की भाँति उसकी सेवा करती, हर बात का ध्यान रखती, लेकिन वह जरा भी शांति भंग न करती। वह न कहती, ‘मैं भी हूँ यहाँ, और क्या कर रहे हो तुम?’ वाचस्पति लगातार एक व्याख्यान लिख रहा था जितनी व्याख्याएँ लिखी गयी हैं, उनमें से एक महानतम व्याख्या। वह बादरायण के ब्रह्म सूत्र पर भाष्य ...

ओशो : बोध कथा : ग्रंथियां

बोध-कथा ग्रंथियां C O M P L E X E S बुद्ध  एक दिन सुबह-सुबह प्रवचन देने आए और  हाथ में एक रूमाल ले कर आए।  लोग बहुत चकित थे, क्योंकि वे कभी कुछ ले कर आते न थे, हाथ में रूमाल आज क्यों था? रेशमी रूमाल था, और बैठ कर इसके पहले कि प्रवचन दें, उन्होंने, रूमाल पर एक गांठ के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, चौथी, पांचवीं–पांच गांठें लगायीं। लोग बिलकुल देखते रहे टकटकी बांध के कि क्या हो रहा है? क्या कर रहे हैं वे? क्या आज कोई जादू का खेल दिखाने वाले हैं?और पांचों गांठें लगाने के बाद बुद्ध ने पूछा कि भिक्षुओं, मैं एक प्रश्न पूछता हूं।अभी-अभी तुमने देखा था, यह रूमाल बिना गांठों के था, अब गांठों से भर गया। क्या यह रूमाल वही है जो बिना गांठ का था या दूसरा है ? उनके शिष्य आनंद ने कहा कि भगवान, आप हमें व्यर्थ की झंझट में डाल रहे हैं। क्योंकि अगर हम कहें यह रूमाल वही है, तो आप कहेंगे, उसमें गांठें नहीं थीं, इसमें गांठें हैं। अगर हम कहें यह रूमाल दूसरा है, तो आप कहेंगे, यह वही है। अरे, गांठों से क्या फर्क पड़ता है, रूमाल तो बिलकुल वही का वही है। यह रूमाल एक अर्थ में वही है जो आप लाए थे, क्यो...

ओशो : तो तुम्हे मिला है, उसके प्रति धन्यवाद से भरो।

तुम दुखी हो सकते हो, तुम शिकायते किये चले जा सकते हो कि जीवन ने तुम्हारे साथ न्याय नहीं किया। लेकिन स्मरण रखो कि शिकायत का तुम्हारा यह दृष्टिकोण तुम्हे और भी दुखी करता चला जाएगा क्योंकि तुम उस सबसे चूकते जाओगे जो तुम्हे दिया गया है। तो तुम्हे मिला है, उसके प्रति धन्यवाद से भरो। और जीवन ने तुम्हे इतना दिया है कि हर धन्यवाद छोटा पड़ जाये। तुम अहोभाव से जीते हो, तो तुम पोषित होते हो।                          ओशो प्रेम को प्रार्थना बनाओ

ओशो : प्रतीक्षा करना सीखो।

प्रतीक्षा करना सीखो। धैर्यवान बनो और यकीन करो कि अस्तित्व तुम्हें वह सब देगा जिसे लेने तुम तैयार हो, तुम्हें सिर्फ गहरे ध्यान में चले जाना है। मस्तिष्क के परे मौन में।न कोई विचार रहे,न मनोभाव न मूड, केवल एक मौन सजगता और प्रतीक्षा रहे, उसके लिए जो अस्तित्व तुम्हारे लिए खोज कर लाता है जिसके लिए तुम तैयार हो। ओशो 

ओशो : पतंजलि के ध्यान और झाझेन में क्या अंतर है ?

पतंजलि के ध्यान और झाझेन में क्या अंतर है ? पतंजलि का ध्यान एक चरण है, उनके आठ चरणों में एक चरण है ध्यान। झाझेन में, ध्यान ही एकमात्र चरण है, और कोई चरण नहीं है। पतंजलि क्रमिक विकास में भरोसा करते हैं।  झेन का भरोसा सडन एनलाइटेनमेंट, अकस्मात संबोधि में है। तो जो केवल एक चरण है पतंजलि के अष्टांग में, झेन में ध्यान ही सब कुछ है —झेन में बस ध्यान ही पर्याप्त होता है, और किसी बात की आवश्यकता नहीं। शेष बातें अलग निकाली जा सकती हैं। शेष बातें सहायक हो सकती हैं, लेकिन फिर भी आवश्यक नहीं—झाझेन में केवल ध्यान आवश्यक है। ध्यान की यात्रा में —प्रारंभ से लेकर अंत तक सभी आवश्यकताओं के लिए—पतंजलि एक पूरी की पूरी क्रमबद्ध प्रणाली दे देते हैं। वे ध्यान के बारे में सब कुछ बता देते हैं। पतंजलि के मार्ग में ध्यान कोई अकस्मात घटी घटना नहीं है, उसमें तो धीरे — धीरे, एक —एक कदम चलते हुए ध्यान में विकसित होना होता है। जैसे —जैसे तुम ध्यान में विकसित होते हो और ध्यान को आत्मसात करते जाते हो, तुम अगले चरण के लिए तैयार होते जाते हो। झेन तो उन थोड़े से दुर्लभ लोगों के लिए है, उन थोड़े से साहसी लोगों के लिए है,...

ओशो : माया क्या है ?

 माया क्या है ? माया का अर्थ है: जो नहीं है, नहीं हो सकता है, लेकिन जिसका आभास होता है। और आभास का हम रोज—रोज पोषण करते हैं। एक स्त्री के तुम प्रेम में पड़ गए। फिर विवाह का संयोजन किया। चला, जादू शुरू हुआ! विवाह का आयोजन जादू की शुरुआत है। अब एक भ्रांति पैदा करनी है। यह स्त्री तुम्हारी नहीं है, यह तुम्हें पता है अभी। अब एक भ्रांति पैदा करनी है कि मेरी है, तो बैंड – बाजे बजाए, बारात चली, घोड़े पर तुम्हें दुल्हा बना कर बिठाया। अब ऐसे कोई घोड़े पर बैठता भी नहीं। अब तो सिर्फ दुल्हा जब बनते हैं, तभी घोड़े पर बैठते हैं। छुरी इत्यादि लटका दी। चाहे छुरी निकालना भी न आता हो, चाहे छुरी से साग-सब्जी भी न कट सकती हो; मगर छुरी लटका दी। मोर-मुकुट बांध दिए। बड़े बैंड—बाजे, बड़ा शोरगुल – चली बारात! यह भ्रांति पैदा करने का उपाय है। यह एक मनोवैज्ञानिक उपाय है। तुम्हें यह विश्वास दिलाया जा रहा है: कोई बड़ी महत्वपूर्ण घटना घट रही है! भारी घटना घट रही है! फिर मंत्र, यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ… चलती है प्रक्रिया लंबी। वह प्रक्रिया सिर्फ मनोवैज्ञानिक है, हिप्नोटिक है। उसका पूरा उपाय इतना है कि यह सम्मोहन गहरा बै...

ओशो : हृदय का द्वार

 सिर्फ,         ह्रदय का द्वार                   खुला हो... एक वैज्ञानिक ने  एक अदभुत काम किया इधर।  कैक्टस का  एक पौधा,  जिसमें कांटे ही  कांटे होते हैं  और जिसमें कभी  बिना कांटे की कोई  शाखा नहीं होती,  एक अमरीकन  वैज्ञानिक उस पौधे को  बहुत प्रेम करता रहा।  लोगों ने तो समझा  कि पागल है,  क्योंकि  पौधे को प्रेम करना!  अरे आदमी को ही  प्रेम करने वाले को  बाकी लोग  पागल समझते हैं,  तो पौधे को  प्रेम करने वाले को तो  कौन  समझदार समझेगा!  उसके  घर के लोगों ने भी  समझा कि दिमाग  खराब हो गया है।  वह सुबह से उठता  तो वह  पौधा ही पौधा था।  उसी को प्रेम करता,  उससे बातें भी करता।  तब तो और  पागलपन हो गया।  वृक्ष से तो बातें  हो कैसे सकती हैं?  उस वैज्ञानिक ने  जब यह घोषणा की  कि मैं एक वृक्ष से  बातें शुरू किया हूं  और...

ओशो के सुंदर विचार

वैसा अपने को बनाओ, जैसा तुम चाहते हो दूसरे हों। तुम चाहते हो दूसरे सत्यवादी हों, सत्यवादी हो जाओ। क्योंकि दूसरे भी यही चाहते हैं। तुम चाहते हो दूसरे क्रोध न करें, तुम क्रोध न करो। तुम चाहते हो दूसरे प्रेमवान हों, तुम प्रेमवान हो जाओ।  इसे तुम सूत्र समझ लो। बड़ा बहुमूल्य सूत्र है।  इससे तुम धर्म की कसौटी कर लोगे। तुम जो चाहते हो कि दूसरे करें, दूसरे हों, वैसे ही तुम होने लगो, वही तुम्हारे जीवन का शास्त्र है। कहीं और खोजना नहीं है। ओशो

ओशो : समर्पण

  समर्पण निष्क्रिय पड़ी हुई इच्छाएं धीरे-धीरे सपने बनकर खो जाती हैं। जिसके पीछे हम अपनी शक्ति लगा देते हैं, अपने को लगा देते हैं, वह इच्छा संकल्प बन जाती है। संकल्प का अर्थ है, जिस इच्छा को पूरा करने के लिए हमने अपने को दांव पर लगा दिया। तब वह डिजायर न रही, विल हो गई। और जब कोई संकल्प से भरता है, तब और भी गहन खतरे में उतर जाता है। क्योंकि अब इच्छा, मात्र इच्छा न रही कि मन में उसने सोचा हो कि महल बन जाए। अब वह महल बनाने के लिए जिद्द पर भी अड़ गया। जिद्द पर अड़ने का अर्थ है कि अब इस इच्छा के साथ उसने अपने अहंकार को जोड़ा। अब वह कहता है कि अगर इच्छा पूरी होगी, तो ही मैं हूं। अगर इच्छा पूरी न हुई, तो मैं बेकार हूं। अब उसका अहंकार इच्छा को पूरा करके अपने को सिद्ध करने की कोशिश करेगा। जब इच्छा के साथ अहंकार संयुक्त होता है, तो संकल्प निर्मित होता है। अहंकार, मैं, जिस इच्छा को पकड़ लेता है, फिर हम उसके पीछे पागल हो जाते हैं। फिर हम सब कुछ गंवा दें, लेकिन इस इच्छा को पूरा करना बंद नहीं कर सकते। हम मिट जाएं। अक्सर ऐसा होता है कि अगर आदमी का संकल्प पूरा न हो पाए, तो आदमी आत्महत्या कर ले। कहे कि इ...

ओशो : विज्ञान भैरव तंत्र - विधि,16

 विज्ञान भैरव तंत्र - विधि,16 "हे भगवती , जब इन्द्रियां हृदय में विलीन हों , कमल के केन्द्र पर पहुँचो" । इस विधि के लिए क्या करना है ? " जब इन्द्रियां हृदय में विलीन हों..." प्रयोग करके देखो . कई उपाय संभव हैं . तुम किसी व्यक्ति को स्पर्श करते हो ; अगर तुम हृदय वाले आदमी हो तो वह स्पर्श शीघ्र ही तुम्हारे हृदय में पहुँच जायेगा और तुम्हें उसकी गुणवत्ता महसूस हो सकती है . अगर तुम किसी मस्तिष्क वाले व्यक्ति का हाथ अपने हाथ में लोगे तो उसका हाथ ठंडा होगा -- शारीरिक रूप से नहीं , भावात्मक रूप से . उसके हाथ में एक तरह का मुर्दापन होगा . और अगर वह व्यक्ति हृदय वाला है तो उसके हाथ में एक ऊष्मा होगी ; तब उसका हाथ तुम्हारे साथ पिघलने लगेगा , उसके हाथ से कोई चीज निकलकर तुम्हारे भीतर बहने लगेगी और तुम दोनों के बीच एक तालमेल होगा , ऊष्मा का संवाद होगा . यह ऊष्मा हृदय से आ रही है . यह मस्तिष्क से नहीं आ सकती , क्योंकि मस्तिष्क सदा ठंडा और हिसाबी है . हृदय ऊष्मा वाला है , वह हिसाबी नहीं है .  स्पर्श करो , छुओ . आँख बंद करो और किसी चीज को स्पर्श करो . अपनी प्रेमी या प्रेमिका को छुओ ...

ओशो : साक्षी से भी परे कुछ और है

For Beautiful Divine Stories  Please Subscribe You tube Channel Gagar ma Sagar Divine Story  साक्षी से भी परे कुछ और है साक्षी पर परमात्मा रुक गया होता तो जगत में इतना नृत्य नहीं हो सकता था इस रासलीला को देखते हो? चांद नाच रहा, सूरज नाच रहे, पृथ्वी नाच रही, तारे नाच रहे, पूरा ब्रह्मांड नाच रहा है किसी गहन अहोभाव में लीन, किसी प्रार्थना में डूबा सारा अस्तित्व नाच रहा है सुनो इसकी झनकार, जगत के पैरों में बंधे अर की आवाज सुनो तो मीरा ठीक कहती है पद घुंघरू बांध नाची यह चौथी अवस्था हुई चैतन्य नाचने लगे; मीरा नाचने लगी बाउल नाचते हैं, पागल हो कर नाचते हैं भीतर कोई बचा नहीं, भीतर शून्य हो गये साक्षी तो शून्य पर ले आता है. जब तुम नाचोगे तब पूर्ण होओगे साक्षी तो तुम्हें कोरा कर देता है, खाली कर देता है तुम गये अब परमात्मा उतरेगा तो नाचेगा ध्यान रखना या फिर परमात्मा को रोकना, उतरने मत देना इसलिए जैन परमात्मा को इनकार करते हैं वह लीला से बचने की व्यवस्था है नहीं तो तुम शून्य हो गये, अब क्या करोगे? अब परमात्मा उतरेगा, और जैसा कि उसकी आदत है नाचने की, वह नाचेगा वह गीत गायेगा; वह हजार खेल क...

ओशो के अनमोल उपहार

“प्यार तभी सच्चा होता है जब कोई एक दुसरे के व्यक्तिगत मामलो में दखल ना दे। प्यार में दोनों को एक-दुसरे का सम्मान करना चाहिये।” अज्ञानी बने रहना अच्छा है, कम से कम अज्ञान तो इसमें आपका होता है। ये प्रामाणिक है, यही सच, वास्तविकता और इमानदारी है। “प्यार की सर्वश्रेष्ट सीमा आज़ादी है, पूरी आज़ादी। किसी भी रिश्ते के खत्म होने का मुख्य कारण आज़ादी का न होना ही है।” ओशो

ओशो : अदभुत सेतू - प्रेम

अदभुत सेतू - प्रेम तीन शब्द समझ लेना--ओशो एक हैं : काम ! काम हैं : सुख नीचे की तरफ बहता हुआ ! दूसरा शब्द हैं : प्रेम ! प्रेम हैं : सुख मध्य मैं अटका हुआ :न नीचे जा रहा हैं न ऊपर जा रहा हैं ! और तीसरा शब्द हैं प्रार्थना ! प्रार्थना हैं : सुख ऊपर जाता हुआ ! उर्जा वही हैं काम मे वही उर्जा नीचे जा रही हैं , प्रेम मे वही उर्जा बीच मे थिर हो जाती हैं , प्रार्थना मैं वही उर्जा पंख खोल देती है, आकाश की तरफ उड़ने लगती हैं ! इसलिए मैंने कहा हैं ,सम्भोग और समाधि संयुक्त हैं ,एक ही उर्जा है ,एक ही सीडी है ! नीचे की तरफ जायो तो सम्भोग ऊपर की तरफ जाओ तो समाधी : और दोनों के मध्य मैं प्रेम है ! प्रेम द्वार है ! प्रेम दोनों का द्वार है ! प्रेम सम्भोग का भी द्वार है !  अगर तुम्हारी उर्जा नीचे की तरफ जा रही है तो प्रेम सम्भोग का द्वार बन जायेगा ! अगर तुम्हारी उर्जा उपर की तरफ जा रही है तो प्रेम समाधी का द्वार बन जायेगा ! प्रेम बड़ा अद्भुत सेतु है...  मरो हे जोगी मरो ओशो

ओशो की मधुर वाणी

किसी से किसी भी तरह की प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता नहीं है । आप स्वयं में जैसे हैं एकदम सही हैं । खुद को स्वीकारिये । मित्रता शुद्धतम प्रेम है । ये प्रेम का सर्वोच्च रूप है । जहाँ कुछ भी नहीं माँगा जाता । कोई शर्त नहीं होती, जहा बस देने में आनंद आता है । ओशो

ओशो के अनमोल रत्न

सवाल  ये नहीं है कि कितना सीखा जा सकता है… इसके उलट , सवाल ये है कि कितना भुलाया जा सकता है । उस तरह मत चलिए जिस तरह डर आपको चलाये । उस तरह चलिए जिस तरह प्रेम आपको चलाये । उस तरह चलिए जिस तरह ख़ुशी आपको चलाये । ओशो

ओशो : प्रेम क्या है ?

सच्चा प्रेम अकेलेपन से बचना नहीं है, सच्चा प्रेम बहता हुआ अकेलापन है । अकेले रहने में कोई इतना खुश रहता है कि वो इसे बांटना चाहता है । ओशो

ओशो के अनमोल वचन

प्रेम तब खुश होता है जब वो कुछ दे पाता है । अहंकार तब खुश होता है जब वो कुछ ले पाता है । जैसे-जैसे आप अधिक जागरुक होते जाते हैं इच्छाएं गायब होती जाती हैं । जब जागरूकता 100% हो जाती है, तब कोई इच्छा नहीं रह जाती । ओशो

ओशो के अनमोल विचार

अधिक से अधिक भोले, कम ज्ञानी और बच्चों की तरह बनिए । जीवन को मजे के रूप में लीजिये – क्योंकि वास्तविकता में यही जीवन है । खुद को खोजिये, नहीं तो आपको दुसरे लोगों के राय पर निर्भर रहना पड़ेगा जो खुद को नहीं जानते । ओशो

ओशो : शांत रहो, अपने आप से जुड़ो ।

कोई विचार नहीं, कोई बात नहीं, कोई विकल्प नहीं – शांत रहो, अपने आप से जुड़ो । ओशो

ओशो : जीवन क्या है ?

तुम जीवन में तभी अर्थ पा सकते हो जब तुम इसे निर्मित करते हो ।  जीवन एक कविता है जिसे लिखा जाना चाहिए । यह गाया जाने वाला गीत, किया जाने वाला नृत्य है । ओशो

ओशो : तुम शांत हो जाओगे – वो आ जाएगा । तुम शांत हो जाओगे – उसे यहीं पाओगे ।

  तलाशो मत, पूछो मत, ढूंढो मत, खटखटाओ मत, मांगो मत – शांत हो जाओ । तुम शांत हो जाओगे – वो आ जाएगा । तुम शांत हो जाओगे – उसे यहीं पाओगे । तुम शांत हो जाओगे तो अपने को उसके साथ झूलते हुए पाओगे । ओशो

ओशो : क्या तंत्र अतिभोग का ही एक मार्ग नहीं है ?

चोथा प्रश्न : क्या तंत्र अतिभोग का ही एक मार्ग नहीं है  ? रीको, ने एक बार नानसेन से बोतल में बत्तख की पुरानी पहेली की व्याख्या करने को कहा। ‘यदि कोई व्यक्ति बतख के नवजात शिशु को एक बोतल में रख दे, और उसे तब तक भोजन देता रहे जब तक कि वह बच्चा बड़ा होकर पूरी बोतल ही न बन जाएं, कैसे वह व्यक्ति बतख को बोतल से उसे बाहर निकाल सकता है। कि न तो बतख ही मरे और न ही बोतल टूटे।’ नानसेन ने जोर से अपने हाथों से ताली बजाई और चिल्लाया, ‘रीको!’ ‘हां, गुरुजी,’ रीको ने चौंक कर कहा। ‘देख’, नानसेन ने कहा, ‘बतख बाहर है।’ ……. नहीं! यह तो अति भोग से बाहर निकलने का एकमात्र मार्ग है। यह तो कामुकता से बाहर आने का एकमात्र उपाय है। और कोई भी उपाय कभी भी मनुष्य के लिए सहायक नहीं हुआ है, बाकि और उपायों ने तो मनुष्य को अधिक से अधिक कामुक बना दिया है। काम विलीन तो नहीं हुआ है। धर्मों ने बस इसे और अधिक विषैला बना दिया है। यह अभी भी है–एक जहरीले रूप में। हां, अपराध भाव तो मनुष्य में पैदा हो गया है, परंतु काम अदृश्य नहीं हुआ है। यह अदृश्य हो सकता भी नहीं क्योंकि यह एक जैविक वास्तविकता है। यह अस्तित्वगत है; इसका दमन क...

ओशो : आप जो कुछ भी कहते हैं, मैं सदा उसके साथ राजी हो जाता हूं। फिर मेरा जीवन क्यों नहीं बदल रहा ?

दूसरा प्रश्न: ओशो , आप जो कुछ भी कहते हैं, मैं सदा उसके साथ राजी हो जाता हूं। फिर मेरा जीवन क्यों नहीं बदल रहा ? शायद इसी राजीपन के कारण। यदि तुम मुझसे राजी होते हो, या तुम मुझसे राजी नहीं होते, तुम्हारा जीवन बदलेगा नहीं। यह राजी होने या न होने का प्रश्न नहीं है–यह प्रश्न है समझ का। और समझ राजी होने न होने दोनों के पार है। साधारणतः जब तुम मुझसे राजी होते हो, तुम सोचते हो कि तुमने मुझे समझ लिया। यदि तुमने मुझे समझ ही लिया तो राजी होने न होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठेगा। कैसे तुम सत्य के साथ राजी हो सकते हो? या राजी नहीं हो सकते हो? सूरज उगा है–क्या तुम राजी होते हो या राजी नहीं होते? तुम कहोगे कि यह प्रश्न ही असंगत है। राजी होना, न होना सिद्धांतों के विषय में है, सत्य के विषय में नहीं। इसलिए जब तुम मुझसे राजी होते हो तुम वस्तुतः मुझसे राजी नहीं होते, तुम यह महसूस करने लग जाते हो कि मैं तुम्हारे सिद्धांत से, जिसे तुम सदा अपने साथ लिए फिरते हो, राजी हूं। जब कभी भी तुम्हें लगता है कि ओशो तुमसे राजी है, तुम यह महसूस करने लग जाते हो कि तुम ओशो से राजी हो। जब कभी भी मैं तुमसे राजी नहीं होता, ...

ओशो : ध्यान करते समय, मेरा मन फिर भी पांच सौ मील प्रतिघंटा चलता रहता है। मैं कभी मौन का अनुभव नहीं करता हूं, और जो कुछ भी साक्षीभाव घटता है वह अत्यंतअल्प होता है। झलकों की भांति। क्या मैं अपना समय बर्बाद कर रहा हूं ?

चौथा प्रश्न: ध्यान करते समय , मेरा मन फिर भी पांच सौ मील प्रतिघंटा चलता रहता है। मैं कभी मौन का अनुभव नहीं करता हूं, और जो कुछ भी साक्षीभाव घटता है वह अत्यंतअल्प होता है। झलकों की भांति। क्या मैं अपना समय बर्बाद कर रहा हूं? तुम्हारा मन तो बड़ा सुस्त है। केवल पांच सौ मील प्रति घंटा, बस? और क्या तुम सोचते हो कि यह कोई गति है? तुम तो काफी धीमें हो। मन की गति को जानते ही नहीं, वह तो इतना तेज चलता है। यह तो प्रकाश से भी तेज चलने वाला है। प्रकाश एक सेकंड़ में एक लाख छियासी हजार मील चलता है। मन तो उससे भी तेज चलता है। लेकिन चिंता की कोई बात नहीं—यही तो मन का सौंदर्य है, यही तो उसका महान गुण है। इसे नकारात्मक रूप से लेने के स्थान पर, मन के साथ लड़ने के स्थान पर इसे दोस्त बना लो। तुम कहते हो, ‘ध्यान करते समय मेरा मन फिर भी पांच सौ मील प्रति घंटा चलता रहता है’—इसे चलने दो। इसे और तेज जाने दो। तुम बस दृष्टा रहो। तुम मन को इतना तेज चलते, इतनी गति से भागते, देखते रहो। इसका आनंद उठाओं मन के इस खेल को आनंद लो। संस्कृत में इसके लिए हमारे पास एक विशेष शब्द है; हम इसे कहते है चिद्विलास—चैतन्य की क्रीड़ा...