ओशो : पुराण, पूर्णता और बुद्ध पूर्णिमा
पुराण, पूर्णता और बुद्ध पूर्णिमा
पुराण का अर्थ होता है, जो दिखायी पड़ता है वही नहीं, जो अनदिखा है उसको उघाड़ना है। जो दिखायी पड़ता है वह तो इतिहास पकड़ लेगा, जो नहीं दिखायी पड़ता उसे पुराण पकड़ता है। पश्चिम में पुराण जैसी कोई बात नहीं है,इसलिए पश्चिम का इतिहास दरिद्र है। पश्चिम के इतिहास में काव्य नहीं है। जब इतिहास में काव्य जुड़ जाता है तो पुराण पैदा होता है। पूरब ने इतिहास नहीं लिखा, पुराण लिखा,पश्चिम ने इतिहास लिखा।
इसलिए जब पश्चिम का कोई विचारक आता है तो वह व्यर्थ की बातें पूछता है, वह कहता है कि बुद्ध इस तारीख में हुए कि नहीं हुए? इस पर वर्षों मेहनत करते हैं लोग कि किस तारीख को पैदा हुए। हम इसकी चिंता ही नहीं करते, हम कहते हैं, कोई भी तारीख काम दे देगी।
अब देखो, बुद्ध के जीवन में यह उल्लेख है कि बुद्ध पूर्णिमा की रात्रि में पैदा हुए। फिर पूर्णिमा की रात्रि में ही संबोधि को उपलब्ध हुए, फिर पूर्णिमा की रात्रि में ही मरे। यह बात पुराण की लगती है, इतिहास की नहीं लगती। ऐसा हो भी सकता है संयोगवशांत, कोई आदमी पूर्णिमा को ही पैदा हो,पूर्णिमा ही को ज्ञान को उपलब्ध हो, पूर्णिमा को ही मरे,लेकिन यह बात जरा पौराणिक मालूम पड़ती है, ऐतिहासिक कम। वही दिन पैदा होना, वही दिन ज्ञान को पाना, वही दिन मर जाना, इतना संयोग बैठना जरा मुश्किल होता है। यह शायद इतिहास की बात नहीं भी हो, लेकिन यह बात मूल्यवान है।
पूर्णिमा तो प्रतीक है पूर्णता का। उस पूर्णता के प्रतीक को पकड़कर पुराण कहता है, बुद्ध पूरे पैदा हुए—पूर्णिमा की रात पैदा हुए—शीतल पैदा हुए, पूरी छवि से पैदा हुए, पूरे सौंदर्य से पैदा हुए, अपूर्व अमृत को लेकर पैदा हुए। फिर पूर्णिमा की रात्रि ही उनके भीतर छिपा हुआ यह अमृत बहा, प्रगट हुआ, स्फुटित हुआ, यह कमल खिला। फिर पूर्णिमा की रात को ही बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध हुए, क्योंकि ज्ञान भी पूर्णिमा की रात्रि है। फिर बुद्ध पूर्णिमा की रात्रि ही विदा हुए, क्योंकि मृत्यु भी बुद्ध की पूर्ण होगी, जन्म भी पूर्ण होगा। बुद्ध के जीवन में सभी पूर्ण है। इस बात को कहने के लिए कि बुद्ध के जीवन में सभी पूर्ण है, हमने यह प्रतीक चुन लिया, यह पूर्णिमा की रात्रि। प्रतीक लोग अलग— अलग चुनते हैं, लेकिन प्रतीक मूल्यवान न होकर, प्रतीकों में जो हम अर्थ डालते हैं वह मूल्यवान है।
इसलिए बुद्धपुरुषों के पास पुराण खड़ा होता, पुराण कथाएं निर्मित होतीं। उन्हीं पुराण कथाओं के अर्थ को पकड़ लेकर तुम बुद्धत्व को समझोगे कि क्या अर्थ है।
दुनिया में दो तरह के नासमझ हैं। एक हैं जो सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि ये पुराण कथाएं सच हैं,ऐतिहासिक अर्थों में सच हैं, ये पागल हैं। इनकी वजह से व्यर्थ की झंझट खड़ी होती है। ये कविताओं को सत्य सिद्ध करने में लग जाते हैं। जैसे किसी ने कहा कि चांद को देखकर मुझे अपनी प्रेयसी की याद आ गयी, और चांद ऐसे लगा जैसे मेरी प्यारी का मुखड़ा हो।
अब तुम इससे झगड़ा करने लग सकते हो कि चांद और प्यारी के मुखड़े में कोई संबंध नहीं है। कहा चांद, कहां प्यारी का मुखड़ा! तुम्हें कुछ होश है! कितना बड़ा चांद और कितना सा मुखड़ा, छोटा सा। अब यह प्यारी के ऊपर इतना बड़ा चांद रख दो तो मर ही जाएगी। और चांद, तुम्हें पता है,अभी तो वैज्ञानिक पत्थर—कंकड़ भी ले आए वहा से, वहा कुछ सौंदर्य नहीं है। कंकड़—पत्थर, मिट्टी, खाई—खड्ड, यही है। कहां प्यारी का मुखड़ा और कहां चांद! कहां खाई——खड्डों से तुम प्यारी के मुखड़े की बात कर रहे हो! होश में हो?
अगर कोई ऐसी जिद्द करे तो मुश्किल में डाल देगा। तुम सिद्ध न कर पाओगे, तुम कहोगे कि क्षमा करो, कविता लिखी, गलती हो गयी।
मगर तुम समझे नहीं। क्योंकि कविता जिसने लिखी थी वह यह कह भी नहीं रहा था, जो तुम कह रहे हो। वह तो इतना ही कह रहा था कि कुछ साम्य, कुछ तालमेल, चांद को देखकर किसी सौंदर्य का भीतर आगमन, चांद को देखकर भीतर किसी लहर का जन्म लेना। वह लहर ठीक वैसे ही है जैसी मेरी प्रेयसी के चेहरे को देखकर मेरे भीतर लेती है। उन दोनों सौंदर्यों में कुछ समता है, कुछ तालमेल है—एक ही वेवलेंथ—इतना ही कह रहा है वह।
यह नहीं वह कह रहा कि चांद और मेरी प्रेयसी का मुखड़ा एक सी चीज हैं, वह कोई गणित के हिसाब से नहीं बोल रहा है, वह इतना ही कह रहा है कि चांद को देखकर भी मेरे भीतर कुछ वैसी ही कसमसाहट हो जाती है जैसी मेरी प्यारी के चेहरे को देखकर हो जाती है। चांद के साथ भी मैं वैसा ही लवलीन हो जाता हूं जैसा मैं अपनी प्यारी के चेहरे को देखकर लवलीन हो जाता हूं इतना ही कह रहा है। वह एक साम्य की बात कर रहा है। और साम्य बड़ा बारीक है और साम्य चांद में और प्यारी के चेहरे में नहीं है, साम्य उसके हृदय में है।
तो जिन्होंने लिखा है कि बुद्ध पूर्णमा को पैदा हुए, बुद्ध पूर्णमा को ज्ञान को उपलब्ध हुए, बुद्ध ने पूर्णिमा को शरीर त्यागा, हो सकता है यह पूर्णिमा उनके भक्तों के हृदय में हो,यह भक्तों ने अनुभव किया हो कि ऐसा होना ही चाहिए। बुद्ध और किसी और दिन पैदा हो जाएं, यह बात जंचेगी नहीं। अब जैसे दसमी को पैदा हो गए, जरा जंचेगी नहीं, जरा बेहूदा लगेगा, ऐसा होना नहीं चाहिए कि बुद्ध और दसमी को पैदा हो गए! कि म्यारस को ज्ञान हो गया! यह बात कुछ जंचेगी नहीं। जरा सोचो तुम, दसमी को बुद्ध का पैदा होना जंचता नहीं,पूर्णिमा को बात बिलकुल ठीक पड़ती है, ऐसा होना चाहिए। जिन्होंने बुद्ध को प्रेम किया है, उनके हृदय में झांको तो बात खयाल में आ जाएगी।
जब बुद्ध को ज्ञान हुआ, तो कथाएं कहती हैं, जिस वन में निरंजना के तीर पर बैठकर उनको ज्ञान हुआ, अचानक बेमौसम फूल खिल गए। अगर कोई वैज्ञानिक इसका परीक्षण करने जाएगा तो मुझे लगता नहीं कि कोई बेमौसम फूल खिलेंगे। लेकिन खिलने चाहिए। इतने लोगों के हृदय के फूल खिले, इसको कैसे प्रगट करैं! इसको प्रगट करने के लिए एक व्यवस्था खोज ली, एक काव्य बनाया कि जब बुद्ध को ज्ञान हुआ तो वृक्षों में बेमौसम फूल खिल गए। अभी मौसम न था,लेकिन इतनी बड़ी घटना घटी हो तो कौन मौसम की और गैर—मौसम की फिकर करता है, यह मौका आ गया है कि फूल खिलने ही चाहिए। सूखे वृक्ष पुन: हरे हो गए, जिनमें वर्षों से अंकुर नहीं आए थे फिर अंकुर आ गए। होना चाहिए ऐसा। कितने सूखे हृदय अंकुरित हुए! इसको कैसे कहोगे? कितने लोग जन्मों से सूखे पड़े थे, बुद्ध का अमृतकण उन पर पडा और वे हरे हो गए और उनमें नए अंकुर आ गए और जीवन ने नयी हरियाली देखी, नए गीत गाए। इस बात को प्रतीक की तरह स्वीकार करके, तो फिर पुराण का अर्थ साफ हो जाएगा।
तो एक तो इस तरह के पागल हैं, जो सिद्ध करते हैं कि जो पुराण में लिखा है वह वैसा ही है। वे भी पुराण की हत्या कर देते हैं। और दूसरे ऐसे भी पागल हैं, वे कहते हैं कि जो भी पुराण में है वह सब असत्य है। वे भी हत्या कर देते हैं।
न तो सब सत्य है और न सब असत्य है। पुराण में बडा काव्यात्मक सत्य है। काव्यात्मक सत्य का अर्थ होता है,सत्य बड़े प्यारे और मीठे ढंग से कहा गया है। जब हम किसी बात को प्यारे और मीठे ढंग से कहते हैं तो असत्य का उपयोग किया जाता है। सत्य को इस ढंग से उपयोग किया गया है और असत्य को इस ढंग से उपयोग किया गया है कि दोनों में विरोध नहीं रहा। पुराण का अर्थ है, सत्य को कहने में असत्य का भी उपयोग कर लिया है।
यह बड़ी अदभुत बात है। होना ऐसा ही चाहिए कि असत्य भी सत्य की सीढ़ी बन जाए। असत्य का भी उपयोग कर लिया, उसको भी व्यर्थ नहीं जाने दिया। काव्य का भी उपयोग कर लिया, कथा का भी उपयोग कर लिया, उसको व्यर्थ नहीं जाने दिया। कुछ छोडा नहीं, जीवन में जो भी था सबको ठीक से जमा लिया उस महासंगीत के लिए।
तो बुद्धपुरुषों के पास कथाएं पैदा होती हैं। अनूठी कथाएं पैदा होती हैं। उस आदमी को मैं ठीक—ठीक समझदार आदमी कहता हूं, जो न तो पुराण को अक्षरश: सत्य सिद्ध करने की चेष्टा करता है और न अक्षरश: झूठ सिद्ध करने की चेष्टा करता है। जो पुराण को काव्य की तरह समझने की कोशिश करता है। और तब बड़े अर्थ प्रगट होते हैं। ऐसे अर्थ जो किसी और ढंग से न तो लिखे जा सकते थे, न कहे जा सकते थे। पुराण एक अनूठी शैली है जीवन के गहन सत्यों को प्रगट करने के लिए।
ओशो
एस धम्मो सनंतनो
प्रवचन – ७०
विपन्नता का कारण : हमारी मान्यताएं
पुराण का अर्थ होता है, जो दिखायी पड़ता है वही नहीं, जो अनदिखा है उसको उघाड़ना है। जो दिखायी पड़ता है वह तो इतिहास पकड़ लेगा, जो नहीं दिखायी पड़ता उसे पुराण पकड़ता है। पश्चिम में पुराण जैसी कोई बात नहीं है,इसलिए पश्चिम का इतिहास दरिद्र है। पश्चिम के इतिहास में काव्य नहीं है। जब इतिहास में काव्य जुड़ जाता है तो पुराण पैदा होता है। पूरब ने इतिहास नहीं लिखा, पुराण लिखा,पश्चिम ने इतिहास लिखा।
इसलिए जब पश्चिम का कोई विचारक आता है तो वह व्यर्थ की बातें पूछता है, वह कहता है कि बुद्ध इस तारीख में हुए कि नहीं हुए? इस पर वर्षों मेहनत करते हैं लोग कि किस तारीख को पैदा हुए। हम इसकी चिंता ही नहीं करते, हम कहते हैं, कोई भी तारीख काम दे देगी।
अब देखो, बुद्ध के जीवन में यह उल्लेख है कि बुद्ध पूर्णिमा की रात्रि में पैदा हुए। फिर पूर्णिमा की रात्रि में ही संबोधि को उपलब्ध हुए, फिर पूर्णिमा की रात्रि में ही मरे। यह बात पुराण की लगती है, इतिहास की नहीं लगती। ऐसा हो भी सकता है संयोगवशांत, कोई आदमी पूर्णिमा को ही पैदा हो,पूर्णिमा ही को ज्ञान को उपलब्ध हो, पूर्णिमा को ही मरे,लेकिन यह बात जरा पौराणिक मालूम पड़ती है, ऐतिहासिक कम। वही दिन पैदा होना, वही दिन ज्ञान को पाना, वही दिन मर जाना, इतना संयोग बैठना जरा मुश्किल होता है। यह शायद इतिहास की बात नहीं भी हो, लेकिन यह बात मूल्यवान है।
पूर्णिमा तो प्रतीक है पूर्णता का। उस पूर्णता के प्रतीक को पकड़कर पुराण कहता है, बुद्ध पूरे पैदा हुए—पूर्णिमा की रात पैदा हुए—शीतल पैदा हुए, पूरी छवि से पैदा हुए, पूरे सौंदर्य से पैदा हुए, अपूर्व अमृत को लेकर पैदा हुए। फिर पूर्णिमा की रात्रि ही उनके भीतर छिपा हुआ यह अमृत बहा, प्रगट हुआ, स्फुटित हुआ, यह कमल खिला। फिर पूर्णिमा की रात को ही बुद्ध ज्ञान को उपलब्ध हुए, क्योंकि ज्ञान भी पूर्णिमा की रात्रि है। फिर बुद्ध पूर्णिमा की रात्रि ही विदा हुए, क्योंकि मृत्यु भी बुद्ध की पूर्ण होगी, जन्म भी पूर्ण होगा। बुद्ध के जीवन में सभी पूर्ण है। इस बात को कहने के लिए कि बुद्ध के जीवन में सभी पूर्ण है, हमने यह प्रतीक चुन लिया, यह पूर्णिमा की रात्रि। प्रतीक लोग अलग— अलग चुनते हैं, लेकिन प्रतीक मूल्यवान न होकर, प्रतीकों में जो हम अर्थ डालते हैं वह मूल्यवान है।
इसलिए बुद्धपुरुषों के पास पुराण खड़ा होता, पुराण कथाएं निर्मित होतीं। उन्हीं पुराण कथाओं के अर्थ को पकड़ लेकर तुम बुद्धत्व को समझोगे कि क्या अर्थ है।
दुनिया में दो तरह के नासमझ हैं। एक हैं जो सिद्ध करने की कोशिश करते हैं कि ये पुराण कथाएं सच हैं,ऐतिहासिक अर्थों में सच हैं, ये पागल हैं। इनकी वजह से व्यर्थ की झंझट खड़ी होती है। ये कविताओं को सत्य सिद्ध करने में लग जाते हैं। जैसे किसी ने कहा कि चांद को देखकर मुझे अपनी प्रेयसी की याद आ गयी, और चांद ऐसे लगा जैसे मेरी प्यारी का मुखड़ा हो।
अब तुम इससे झगड़ा करने लग सकते हो कि चांद और प्यारी के मुखड़े में कोई संबंध नहीं है। कहा चांद, कहां प्यारी का मुखड़ा! तुम्हें कुछ होश है! कितना बड़ा चांद और कितना सा मुखड़ा, छोटा सा। अब यह प्यारी के ऊपर इतना बड़ा चांद रख दो तो मर ही जाएगी। और चांद, तुम्हें पता है,अभी तो वैज्ञानिक पत्थर—कंकड़ भी ले आए वहा से, वहा कुछ सौंदर्य नहीं है। कंकड़—पत्थर, मिट्टी, खाई—खड्ड, यही है। कहां प्यारी का मुखड़ा और कहां चांद! कहां खाई——खड्डों से तुम प्यारी के मुखड़े की बात कर रहे हो! होश में हो?
अगर कोई ऐसी जिद्द करे तो मुश्किल में डाल देगा। तुम सिद्ध न कर पाओगे, तुम कहोगे कि क्षमा करो, कविता लिखी, गलती हो गयी।
मगर तुम समझे नहीं। क्योंकि कविता जिसने लिखी थी वह यह कह भी नहीं रहा था, जो तुम कह रहे हो। वह तो इतना ही कह रहा था कि कुछ साम्य, कुछ तालमेल, चांद को देखकर किसी सौंदर्य का भीतर आगमन, चांद को देखकर भीतर किसी लहर का जन्म लेना। वह लहर ठीक वैसे ही है जैसी मेरी प्रेयसी के चेहरे को देखकर मेरे भीतर लेती है। उन दोनों सौंदर्यों में कुछ समता है, कुछ तालमेल है—एक ही वेवलेंथ—इतना ही कह रहा है वह।
यह नहीं वह कह रहा कि चांद और मेरी प्रेयसी का मुखड़ा एक सी चीज हैं, वह कोई गणित के हिसाब से नहीं बोल रहा है, वह इतना ही कह रहा है कि चांद को देखकर भी मेरे भीतर कुछ वैसी ही कसमसाहट हो जाती है जैसी मेरी प्यारी के चेहरे को देखकर हो जाती है। चांद के साथ भी मैं वैसा ही लवलीन हो जाता हूं जैसा मैं अपनी प्यारी के चेहरे को देखकर लवलीन हो जाता हूं इतना ही कह रहा है। वह एक साम्य की बात कर रहा है। और साम्य बड़ा बारीक है और साम्य चांद में और प्यारी के चेहरे में नहीं है, साम्य उसके हृदय में है।
तो जिन्होंने लिखा है कि बुद्ध पूर्णमा को पैदा हुए, बुद्ध पूर्णमा को ज्ञान को उपलब्ध हुए, बुद्ध ने पूर्णिमा को शरीर त्यागा, हो सकता है यह पूर्णिमा उनके भक्तों के हृदय में हो,यह भक्तों ने अनुभव किया हो कि ऐसा होना ही चाहिए। बुद्ध और किसी और दिन पैदा हो जाएं, यह बात जंचेगी नहीं। अब जैसे दसमी को पैदा हो गए, जरा जंचेगी नहीं, जरा बेहूदा लगेगा, ऐसा होना नहीं चाहिए कि बुद्ध और दसमी को पैदा हो गए! कि म्यारस को ज्ञान हो गया! यह बात कुछ जंचेगी नहीं। जरा सोचो तुम, दसमी को बुद्ध का पैदा होना जंचता नहीं,पूर्णिमा को बात बिलकुल ठीक पड़ती है, ऐसा होना चाहिए। जिन्होंने बुद्ध को प्रेम किया है, उनके हृदय में झांको तो बात खयाल में आ जाएगी।
जब बुद्ध को ज्ञान हुआ, तो कथाएं कहती हैं, जिस वन में निरंजना के तीर पर बैठकर उनको ज्ञान हुआ, अचानक बेमौसम फूल खिल गए। अगर कोई वैज्ञानिक इसका परीक्षण करने जाएगा तो मुझे लगता नहीं कि कोई बेमौसम फूल खिलेंगे। लेकिन खिलने चाहिए। इतने लोगों के हृदय के फूल खिले, इसको कैसे प्रगट करैं! इसको प्रगट करने के लिए एक व्यवस्था खोज ली, एक काव्य बनाया कि जब बुद्ध को ज्ञान हुआ तो वृक्षों में बेमौसम फूल खिल गए। अभी मौसम न था,लेकिन इतनी बड़ी घटना घटी हो तो कौन मौसम की और गैर—मौसम की फिकर करता है, यह मौका आ गया है कि फूल खिलने ही चाहिए। सूखे वृक्ष पुन: हरे हो गए, जिनमें वर्षों से अंकुर नहीं आए थे फिर अंकुर आ गए। होना चाहिए ऐसा। कितने सूखे हृदय अंकुरित हुए! इसको कैसे कहोगे? कितने लोग जन्मों से सूखे पड़े थे, बुद्ध का अमृतकण उन पर पडा और वे हरे हो गए और उनमें नए अंकुर आ गए और जीवन ने नयी हरियाली देखी, नए गीत गाए। इस बात को प्रतीक की तरह स्वीकार करके, तो फिर पुराण का अर्थ साफ हो जाएगा।
तो एक तो इस तरह के पागल हैं, जो सिद्ध करते हैं कि जो पुराण में लिखा है वह वैसा ही है। वे भी पुराण की हत्या कर देते हैं। और दूसरे ऐसे भी पागल हैं, वे कहते हैं कि जो भी पुराण में है वह सब असत्य है। वे भी हत्या कर देते हैं।
न तो सब सत्य है और न सब असत्य है। पुराण में बडा काव्यात्मक सत्य है। काव्यात्मक सत्य का अर्थ होता है,सत्य बड़े प्यारे और मीठे ढंग से कहा गया है। जब हम किसी बात को प्यारे और मीठे ढंग से कहते हैं तो असत्य का उपयोग किया जाता है। सत्य को इस ढंग से उपयोग किया गया है और असत्य को इस ढंग से उपयोग किया गया है कि दोनों में विरोध नहीं रहा। पुराण का अर्थ है, सत्य को कहने में असत्य का भी उपयोग कर लिया है।
यह बड़ी अदभुत बात है। होना ऐसा ही चाहिए कि असत्य भी सत्य की सीढ़ी बन जाए। असत्य का भी उपयोग कर लिया, उसको भी व्यर्थ नहीं जाने दिया। काव्य का भी उपयोग कर लिया, कथा का भी उपयोग कर लिया, उसको व्यर्थ नहीं जाने दिया। कुछ छोडा नहीं, जीवन में जो भी था सबको ठीक से जमा लिया उस महासंगीत के लिए।
तो बुद्धपुरुषों के पास कथाएं पैदा होती हैं। अनूठी कथाएं पैदा होती हैं। उस आदमी को मैं ठीक—ठीक समझदार आदमी कहता हूं, जो न तो पुराण को अक्षरश: सत्य सिद्ध करने की चेष्टा करता है और न अक्षरश: झूठ सिद्ध करने की चेष्टा करता है। जो पुराण को काव्य की तरह समझने की कोशिश करता है। और तब बड़े अर्थ प्रगट होते हैं। ऐसे अर्थ जो किसी और ढंग से न तो लिखे जा सकते थे, न कहे जा सकते थे। पुराण एक अनूठी शैली है जीवन के गहन सत्यों को प्रगट करने के लिए।
ओशो
एस धम्मो सनंतनो
प्रवचन – ७०
विपन्नता का कारण : हमारी मान्यताएं
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