ओशो : रहने दो समस्याएं : प्रेम की धारा तो बहने दो ।

रहने दो समस्याएं : 
प्रेम की धारा तो बहने दो ? 

आदमी है तो समस्याएं खडी़ होंगी ।
हाँ , तुम न रहोगे , समस्याएं रहेंगी ।
समस्याएं शाश्वत हैं । तुम अभी हो , अभी नहीं ।
अभी नहीं थे , अभी फिर नहीं हो जाओगे ।
तुम इन समस्याओं में अपना समय खराब न करो ।

और समस्याएं तुम क्या हल कर लोगे ?
और समस्याएं हल करने का प्रेम के अतिरिक्त 
और क्या उपाय है ?

ये समस्याएं ही इसीलिए हैं कि इतनी घृणा है ।
ये समस्याएं इसीलिए हैं कि इतनी हिंसा है ।
ये समस्याएं इसीलिए हैं कि इतना द्वेष है , 
इतनी ईर्ष्या है ।
और तुम प्रेम से ही बच रहे हो !
और तुम कह रहे हो कि प्रेम तो विलास ही होगा न !

माना कि समस्याएं हैं , निश्चित समस्याएं हैं ।
लेकिन समस्याओं के कारण प्रेम तो नहीं छोडा़ जा सकता । और यह भी सच है कि प्रेम विलास है ।
इस जीवन में जो भी महत्वपूर्ण है , सभी विलास है ।
फूल भी विलास है , और चांद-तारे भी विलास है ।
लेकिन क्या चाहते हो समस्याएं ही समस्याएं बचें ,
न फूल बचें , न पक्षी गीत गाएं , न कोयल पुकारे ,
न पपीहा गीत गाए , न मोर नाचे , न मोर के पंख हों ,
न आकाश में इंद्रधनुष उगें , न सूर्योदय का आनंद ,
न सूर्यास्त का सौंदर्य , न चांद-तारों से भरा हुआ आकाश यह सब विलास ही तो है समस्याओं से भरे जगत में ।
क्या चाहते हो आकाश में सिर्फ अखबारों की सुर्खियां 
छपी हुई मिलें , कि जहां देखो वहीं हत्याएं , जहां देखो
वहीं रिश्वत , जहां देखो वहीं बलात्कार , कि जहां देखो
वहीं कुछ उपद्रव । अखबार पढ़ने से जी नहीं भरता 
बिष्णुदास राठी ?

माना कि समस्याएं हैं और समस्याएं जरूर मुश्किल खडी़ 
करती हैं , प्रेम करना मुश्किल हो जाता है ।
लेकिन पहली तो बात यह है कि प्रेम तुम्हारे जीवन में है ?
तुम कहते हो , मैं सबको प्रेम बांटना चाहता हूं ।
बांटने के पहले होना भी तो चाहिए । 
नहीं तो हालत हो जाए यूं कि नंगा नहाए , निचोडे़ क्या ?
मैंने सुना , एक नंगा नहाता ही नहीं था ।
तब यह कहावत बनी । लोगों ने पूछा , भई नहाते क्यों नहीं ? उसने कहा , नहा तो लूं , लेकिन निचोडूंगा कहां ?
और कपडे़ कहां सुखाऊंगा ? कपडे़ थे ही नहीं जिनके
सुखाने की चिंता में वह नहाता नहीं था ।

तुम कह रहे हो , सबको प्रेम बांटना चाहता हूं ।
लेकिन बांटोगे क्या खाक ? खाक ही बांटो , विभूति नाम
रख दो ! प्रेम होना भी तो चाहिए ।
और प्रेम बिना ध्यान के नहीं होता । लोग सिर्फ इस खयाल में जीते हैं कि प्रेम है । और तभी तो समस्याएं पर्याप्त हो जाती हैं प्रेम को मारने में । 
वह नोन-तेल-लकडी़ , समस्याओं की दुनिया आई कि प्रेम मरा प्रेम बचता नहीं इसीलिए कि वस्तुतः पहले से ही नहीं था ,सिर्फ खयाल था ।

मुझसे पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग !
मैंने समझा था कि तू है तो दरख्शां है हयात ,
तेरा गम है तो गमे-दहर का झगड़ा क्या है !
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात 
तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है !
तू जो मिल जाए तो तकदीर निगूं हो जाए 
यूं न था , मैंने फकत चाहा था यूं हो जाए ।
मुझसे पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग !

और भी दुख है जमाने में मोहब्बत के सिवा ,
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा ,
अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तलिस्म
रेशमो-अतलसो-कमख्वाब के बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाजार में जिस्म
खाक में लिथडे़ हुए , खून में नहलाए हुए ।
जिस्म निकले हुए , अमराज के तन्नूरों से ,
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से ।
मुझसे पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग !

लौट जाती है उधर को भी नजर , क्या कीजै ?
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न , मगर क्या कीजै ?
और भी दुख हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा ,
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा ,
मुझसे पहली-सी मोहब्बत मेरी महबूब न मांग !

माना कि समस्याएं हैं , माना कि दुख हैं , माना कि तकलीफें हैं , लेकिन ये सदा से हैं और ये सदा रहेंगी ।
इस कारण प्रेम से अपने को बचा लेना खतरनाक है , महंगा है क्योंकि जो प्रेम से बचा वह प्रार्थना से बच जाएगा ।

क्योंकि प्रार्थना प्रेम के ही फूल की सुगंध है ।
और जो प्रार्थना से बचा वह क्या खाक परमात्मा को समझ पाएगा ! क्योंकि उस सुगंध में ही परमात्मा का पहला अनुभव होता है ।

रहने दो समस्याएं । प्रेम की धारा तो बहने दो ।
प्रेम की धारा समस्याओं को मिटाने में सहयोगी होगी ।
बिलकुल मिटा देगी , ऐसा तो नहीं ।
हां , नया तल देगी , नया आयाम देगी ।
और खयाल रखना सदा , नीचे तल की समस्याओं से 
ऊंचे तल की समस्याएं बेहतर होती हैं ।
जैसे मैं यह पसंद करूंगा कि आदमी को शरीर की समस्याएं न रह जाएं , मिट सकती हैं , क्योंकि अब विज्ञान पर्याप्त है ।
आदमी की शरीर की समस्याएं मिट सकती हैं ,
लेकिन तब मन की समस्याएं खडी़ होंगी ।

लेकिन भारतीय तथाकथित साधु-संत जो सारी दुनिया में
चक्कर मारते फिरते हैं , और सारी दुनिया को अध्यात्म का उपदेश देते फिरते हैं --- पता नहीं इनको किसने यह ठेका दिया है , इनको यह वहम है कि भारत को सारी दुनिया का सदगुरु होना है -- तो ये दुनिया में यह कहते फिरते हैं कि हमारा देश गरीब है , लेकिन फिर भी वहां पागलपन कम होता है । हमारा देश गरीब है , लेकिन लोग मानसिक तनाव से पीड़ित नहीं हैं ।

इन पागलों को पता नहीं कि मानसिक तनाव और पागलपन और विक्षिप्तता और आत्मघात भूख से बडी़ समस्याएं हैं ,ऊपर की समस्याएं हैं । पहले पेट तो भरा हो , तब आदमी के मन में तनाव हो सकता है । अभी पेट ही तना हो तो मन में कहां से तनाव होगा ? अभी पेट ही भूखा हो तो मन की चिंताएं कैसे हो सकती हैं ?

और जब मन की भी समस्याएं हल हो जाती हैं तो और नई समस्याएं खडी़ होंगी , और बडी़ -- आत्मा की समस्याएं ,अस्तित्व की समस्याएं , जीवन के अर्थ की समस्याएं । समस्याओं की ऊंचाई सभ्यता की ऊंचाई बताती है समस्याओं की नीचाई सभ्यता की नीचाई बताती है । भारत बहुत नीचे तल पर जी रहा है ।
लेकिन हम बडे़ होशियार हैं ।

ओशो

सांच सांच सो सांच
प्रवचन 7
जीवन चुनौती है , खतरा है !

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