ओशो : साक्षी होने के लिए परमात्मा कितने मौके देता है! रोज-रोज देता है! मगर तुम हो कि चूके जाते हो।

साक्षी होने के लिए परमात्मा कितने मौके देता है! रोज-रोज देता है! मगर तुम हो कि चूके जाते हो। तुम्हारी आदतें जड़ हो गई हैं। हां, मेरी बात सुन लेते हो। मेरी इस बगिया में गंध से पूरित हो जाते हो। ज्योतिर्मय लगते हो भीतर! आश्रम के द्वार से बाहर हुए कि फिर वही कोल्हू के बैल बन जाते हो, फिर आंखों पर पट्टियां चढ़ा लेते हो।

मैं जो कह रहा हूं इसे हृदय में डूब जाने दो। इसे सिर्फ समझो मत तार्किक रूप से। तर्क कोई समझने की ठीक-ठीक व्यवस्था नहीं है। इसे प्रेम से समझो। इसे श्रद्धा से लो। इसे हृदय का आंचल फैला कर भर लो। और फिर चौबीस घंटे के जीवन में जब भी मौका मिल जाए तब जरा इसकी फिर-फिर सुध लेना, ताकि कोल्हू के बैल में जब तुम जुत जाओ तो कभी-कभी साक्षी हो सको! धीरे-धीरे साक्षी का रस बढ़ेगा।
जरा अपनी जिंदगी को तो देखो!

सुबह से रात तक
वही वह! वही वह!

बंदरछाप दंतमंजन,
वही चाय, वही रंजन,
वे ही गाने, वे ही तराने,
वे ही मूर्ख, वे ही सयाने,
सुबह से रात तक
वही वह! वही वह!

भोजनालय भी बदल देखे
(जीभ बदलना संभव न था)
"महाराजिन' से "ताजमहल'
सभी जगह एक हाल।
नरम मसाला, गरम मसाला,
वही वही भाजीपाला,
वही वही बासी चटनी
वही वही खट्टा सांबर,
सुख थोड़े, दुख अपार!

संसार के वट पर
सपनों के चमगादड़!
इन सपनों के शिल्पकार
कवि एक, कपि अनेक
परदे पर की भूतचेष्टा
बासी शाक, नपुंसक विनोद;
भ्रष्ट कथा, नष्ट बोध,
नौ धागे, एक रंग,
व्यभिचार के सारे ढंग!

फिर-फिर से वही भोग,
आसक्ति का वही रोग।
वही मंदिर, वही मूर्ति
वही फूल, वही स्फूर्ति
वही होंठ, वही चितवन,
वही चाल, वही मटकन,
वही पलंग, वही नारी
सितार नहीं, एक तारी!

लगा करूं आत्महत्या,
रोमियो की आत्महत्या,
दधीचि की आत्महत्या!
आत्महत्या भी वही वह!
आत्मा भी वही वह
हत्या भी वही वह
कारण जीवन भी वही वह
और मरण भी वही वह!

जरा देखो, जिंदगी को गौर से देखो! जरा दूर खड़े होकर अपनी जिंदगी को देखो, एक फासला बनाओ। और तुम पाओगे: एक चक्कर है, जिसमें तुम घूम रहे हो! इस चक्कर में जागना है।

चलो--जाग कर चलो, ज्ञानरंजन! बैठो--जागते हुए बैठो, ज्ञानरंजन! सोओ बिस्तर पर तो भी जागते हुए लेटो, ज्ञानरंजन! और एक दिन वह घड़ी भी आ जाएगी कि रात शरीर सोएगा और तुम जागोगे। और एक दिन वह घड़ी भी आ जाएगी कि जीवन के सब काम भी तुम करोगे और फिर भी भीतर जागते रहोगे, साक्षी बने रहोगे। उस दिन ही जानना कि मेरी बात समझे। उसके पहले शब्द ही समझे, बात नहीं। बात में बात छिपी है। शब्दों के भीतर निःशब्द छिपा है।

मैं तुम्हें कोई उपदेश नहीं दे रहा हूं। मैं तुम्हें सिर्फ मैंने जो जाना है उसमें साझीदार बना रहा हूं। मेरी ज्योति में भागीदार बनो। मेरी सुगंध को अपनी सुगंध मत बनाओ। मेरी सुगंध को देख कर अपनी सुगंध को जगाओ। मेरे शब्दों को मत दोहराने लगना, अन्यथा पंडित हो जाओगे। अपने अनुभव को जगाओ।

मुझे हो सका है, तुम्हें भी हो सकता है। बस इतनी ही मेरी उदघोषणा है कि मुझ जैसे साधारण व्यक्ति को हो सकता है तो तुमको भी हो सकता है। ठीक वैसी ही हड्डी-मांस-मज्जा से मैं बना हूं जैसे तुम। वैसे ही अंधेरे रास्तों से मैं गुजरा हूं जिनसे तुम गुजर रहे हो। इतना ही अंधा मैं था जितने तुम हो। लेकिन मेरी आंख खुल सकी, अंधेरा टूट सका; तुम्हारा भी टूट सकता है। मुझे देख कर यह आस्था जगे तो तुम मुझे समझे। मुझे देख कर तुम्हें अपने पर यह श्रद्धा आ जाए तो तुम मुझे समझे।
मैं नहीं कहता किसी और पर श्रद्धा करो। मैं कहता हूं: आत्म-श्रद्धावान बनो। क्योंकि आत्म-श्रद्धा ही परमात्मा से जोड़ने वाला सेतु है।

ओशो

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