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Showing posts from 2021

ओशो : ऊर्जावान ध्यान कक्ष

 ऊर्जावान ध्यान कक्ष जिस कमरे में आप करें इस प्रयोग को, अगर उस कमरे को संभव हो सके आपके लिए, तो फिर इसी प्रयोग के लिए रखें, उसमें कुछ दूसरा काम न करें।  छोटी कोठरी हो, ताला बंद कर दें, उसमें सिर्फ यही प्रयोग करें। और अगर घर के दूसरे लोग भी उसमें आना चाहें तो वह प्रयोग करने के लिए आएं तो ही आ सकें, अन्यथा उसे बंद कर दें।  नहीं संभव हो सके तो बात अलग है। संभव हो सके तो इसके बहुत फायदे होंगे। वह कमरा चार्जड हो जाएगा। वह रोज आप जब उसके भीतर जाएंगे तो आपको पता चलेगा कि साधारण कमरा नहीं है।  क्योंकि हम पूरे समय अपने चारों तरफ रेडिएशन फैला रहे हैं। हमारे चारों तरफ हमारी चित्त—दशा की किरणें फिंक रही हैं। और कमरे और जगहें भी किरणों को पी जाती हैं। और इसीलिए हजारों—हजारों साल तक भी कोई जगह पवित्र बनी रहती है।  उसके कारण हैं। अगर वहां कभी कोई महावीर या बुद्ध या कृष्ण जैसा व्यक्ति बैठा हो, तो वह जगह हजारों साल के लिए और तरह का इम्पैक्ट ले लेती है, उस जगह पर खड़े होकर आपको दूसरी दुनिया में प्रवेश करना बहुत आसान हो जाता है। तो जो संपन्न हैं……. और संपन्न का मैं तो एक ही लक्षण म...

ओशो : कल्पना ध्यान

 कल्पना ध्यान "कल्पना द्वारा नकारात्मक को सकारात्मक में बदलना"एक ध्यान विधि सुबह उठते ही पहली बात, कल्पना करें कि तुम बहुत प्रसन्न हो। बिस्तर से प्रसन्न-चित्त उठें– आभा-मंडित, प्रफुल्लित, आशा-पूर्ण– जैसे कुछ समग्र, अनंत बहुमूल्य होने जा रहा हो। अपने बिस्तर से बहुत विधायक व आशा-पूर्ण चित्त से, कुछ ऐसे भाव से कि आज का यह दिन सामान्य दिन नहीं होगा– कि आज कुछ अनूठा, कुछ अद्वितीय तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है; वह तुम्हारे करीब है। इसे दिन-भर बार-बार स्मरण रखने की कोशिश करें। सात दिनों के भीतर तुम पाओगे कि तुम्हारा पूरा वर्तुल, पूरा ढंग, पूरी तरंगें बदल गई हैं। जब रात को तुम सोते हो तो कल्पना करो कि तुम दिव्य के हाथों में जा रहे हो…जैसे अस्तित्व तुम्हें सहारा दे रहा हो , तुम उसकी गोद में सोने जा रहे हो। बस एक बात पर निरंतर ध्यान रखना है कि नींद के आने तक तुम्हें कल्पना करते जाना है ताकि कल्पना नींद में प्रवेश कर जाए, वे दोनों एक दूसरे में घुलमिल जाएं। किसी नकारात्मक बात की कल्पना मत करें, क्योंकि जिन व्यक्तियों में निषेधात्मक कल्पना करने की क्षमता होती है, अगर वे ऐसी कल्पना करते हैं...

ओशो : शून्य का अर्थ

 *शून्य का अर्थ..शून्य का अर्थ है..मन को खाली छोड़ने की सामर्थ्य.*...... शून्य का अर्थ..शून्य का अर्थ है..मन को खाली छोड़ने की सामथ्र्य। एक व्यक्ति एक मंदिर में किसी दूर देश में हाथ जोड़कर बैठा हुआ है। परदेशी यात्री ने भीतर आकर उससे पूछा, क्या आप प्रार्थना कर रहे हैं? उस व्यक्ति ने कहाः कैसी प्रार्थना, किसकी प्रार्थना? परदेशी हैरान हुआ होगा। पूछा, भगवान की प्रार्थना करते होंगे। उसने कहाः मैं इतना छोटा हूं कि मुझे भगवान का कोई पता नहीं। किसी चीज को मांगने के लिए प्रार्थना करते होंगे? उसने कहाः कितना ही मांगें और कितना ही इकट्ठा करें, मौत सब छीन लेती है, इसलिए मांगने का मोह चला गया। क्या मांगें? जब सब छिन ही जाता है तो मांगने में कोई अर्थ न रहा। उस आदमी ने कहाः फिर भी आप प्रार्थना तो कर ही रहे हैं? उस आदमी ने कहाः कैसे कहूं कि मैं प्रार्थना कर रहा हूं? अब तक बहुत अपने भीतर खोजा, किसी मैं को तो पा ही नहीं सका।  *यह जो क्षण है, ऐसा चित्त की दशा का। न कोई परमात्मा का ख्याल है, न कुछ मांगने का, न अपना। यह शून्य, खाली, यह नॉन-बीइंग की अवस्था है, यह नथिंगनेस। जीवन में स्वतंत्रता आए, सरलत...

ओशो : लाओत्से के साधना-सूत्रों में एक गुप्त सूत्र ।

 संतुलन ध्यान -एक गुप्त ध्यान विधि लाओत्से के साधना-सूत्रों में एक गुप्त सूत्र आपको कहता हूं, जो उसकी किताबों में उलेखित नहीं है, लेकिन कानों-कान लाओत्से की परंपरा में चलता रहा है। वह सूत्र है लाओत्से की ध्यान की पद्धति का। वह सूत्र यह है। लाओत्से कहता है कि पालथी मार कर बैठ जाएं और भीतर ऐसा अनुभव करें कि एक तराजू है, बैलेंस, एक तराजू। उसके दोनों पलड़े आपकी दोनों छातियों के पास लटके हुए हैं और उसका कांटा ठीक आपकी दोनों आंखों के बीच, तीसरी आंख जहां समझी जाती है, वहां उसका कांटा है। तराजू की डंडी आपके मस्तिष्क में है। दोनों उसके पलड़े आपकी दोनों छातियों के पास लटके हुए हैं। और लाओत्से कहता है, चौबीस घंटे ध्यान रखें कि वे दोनों पलड़े बराबर रहें और कांटा सीधा रहे। लाओत्से कहता है कि अगर भीतर उस तराजू को साध लिया, तो सब सध जाएगा। लेकिन आप बड़ी मुश्किल में पड़ेंगे! जरा इसका प्रयोग करेंगे, तब आपको पता चलेगा। जरा सी श्वास भी ली नहीं कि एक पलड़ा नीचा हो जाएगा, एक पलड़ा ऊपर हो जाएगा। अकेले बैठे हैं, और एक आदमी बाहर से निकल गया दरवाजे से। उसको देख कर ही, अभी उसने कुछ किया भी नहीं, एक पलड़ा नी...

ओशो : शून्य कैसे हो ? एक सरल ध्यान विधि ।

 शून्य कैसे हों? ओशो एक ध्यान विधी। शून्य से पूर्ण का दर्शन होता है। और शून्य आता है विचार-प्रक्रिया के तटस्थ, चुनावरहित साक्षी-भाव से। विचार में शुभाशुभ का निर्णय नहीं करना है। वह निर्णय राग या विराम लाता है। किसी को रोक रखने और किसी को परित्याग करने का भाव उससे पैदा होता है। वह भाव ही विचार-बंधन है। वह भाव ही चित्त का जीवन और प्राण है। उस भाव के आधार पर ही विचार की श्रृंखला अनवरत चलती जाती है। विचार के प्रति कोई भी भाव हमें विचार से बांध देता है। उसके तटस्थ साक्षी का अर्थ है, विचार को निर्भाव के बिंदु से देखना। विचार को निर्भाव के बिंदु से देखना ध्यान है। बस, देखना है, “जस्ट सीइंग” और चुनाव नहीं करना है, और निर्णय नहीं लेना है। यह–“बस देखना”–बहुत श्रमसाध्य है। यद्यपि कुछ करना नहीं है, पर कुछ न कुछ करते रहने की हमारी इतनी आदत बनी है कि “कुछ न करने” जैसा सरल और सहज कार्य भी बहुत कठिन हो गया है। बस, देखने-मात्र के बिंदु पर स्थिर होने से क्रमशः विचार विलीन होने लगते हैं। वैसे ही, जैसे प्रभात में सूर्य के उत्ताप में दूब पर जमे ओसकण वाष्पीभूत हो जाते हैं। बस, देखने का उत्ताप विचारों के...
 #Osho से #Incest सबंधो पर पूछा गया एक सवाल का जवाब। *ओशो को फ्री सेक्स (मुक्त-यौन संबंध) के हिमायती बताएं जाते है। तो क्या वास्तव में ओशो मुक्त योन संबंध के हिमायती थे? और क्या अर्थ है मुक्त योन सबंध का?* ओशो से पूछा गया प्रश्न :  "मुक्त यौन-संबंध" के अंतर्गत क्या पिता-पुत्री और मां-बेटे के बीच भी यौन-संबंध हो सकता है? यदि नहीं तो क्यों नहीं? ओशो : - यह प्रश्न उन्होंने इतनी बार पूछा है कि मुझे शक है, तुम्हें अपनी मां से यौन-संबंध करना है कि अपनी बेटी से, किससे करना है? यह प्रश्न इतनी बार तुम क्यों पूछ रहे हो? और यही प्रश्न हेतु है उन्हें पूना लाने का! तो जरूर यह मामला निजी होना चाहिए, व्यक्तिगत होना चाहिए। किससे तुम्हें यौन-संबंध करना है--मां से कि अपनी बेटी से? सीधी-सीधी बात क्यों नहीं पूछते फिर? फिर इसको इतना तात्विक रंग-ढंग देने की क्यों कोशिश करते हो? कम से कम ईमानदार अपने प्रश्नों में होना चाहिए। मां-बेटे का संबंध या बेटे और मां का संबंध अवैज्ञानिक है। उससे जो बच्चे पैदा होंगे, वे अपंग होंगे, लंगड़े होंगे, लूले होंगे, बुद्धिहीन होंगे। इसका कोई धर्म से संबंध नहीं है। यह स...