ओशो : अंतर्यात्रा के मार्ग : ध्यान और प्रेम

अंतर्यात्रा के मार्ग : ध्यान और प्रेम


दुनिया के धर्म दो मार्ग खोजे हैं ।
एक मार्ग है , ध्यान ; और एक मार्ग है , प्रेम ।
दो ही मार्ग हैं ।
बुद्ध , महावीर , पतंजलि ध्यान को मार्ग मानते हैं ।
इसलिये उन तीनों ने प्रेम को काटने का सारा उपाय किया
है । क्योंकि जब तक तुम प्रेम में पडे़ हो ,
तब तक तुम कैसे ध्यान करोगे ?
ध्यान का अर्थ है --- अकेले होने की क्षमता ।
ध्यान का अर्थ है --- केवल्य भाव ! एकांत ! मैं ही हूं ,
कोई दूसरा नहीं । और मैं अपने से राजी हूं ।
कोई तड़पन नहीं , कोई पीडा़ नहीं , कोई विरह नहीं ,
कोई पाने की आकांक्षा , वासना नहीं ।
धन की ही नहीं , परमात्मा को भी पाने की वासना नहीं ;
तभी ध्यान होगा ।

इसलिए बुद्ध -- महावीर कहते हैं परमात्मा है ही नहीं ।
और पतंजलि कहते हैं , आवश्यक नहीं है ।
कोई मान न सके तो ठीक है , परमात्मा को मान ले ,
लेकिन जरूरी नहीं है ।
योगी के लिए परमात्मा की कोई जरूरत नहीं ।
क्योंकि योगी की सारी साधना दूसरे से मुक्त होने की है ।
ध्यान का अर्थ है -- दूसरे से मुक्त होने का प्रयास ।
इसलिए ध्यानी कभी भी प्रेम को जगह नहीं दे सकता ।
इसलिए बुद्ध के पास या महावीर के पास जाकर अगर
प्रेम की चर्चा करें तो वह कहेंगे , तुम नासमझ हो ।

तो बुद्ध , महावीर , पतंजलि तीनों ही प्रेम को काटते हैं ,
ताकि ध्यान पूर्ण हो सके । इसलिए सभी की साधना विराग
की साधना है । प्रेम है राग , काटना है प्रेम को ।
प्रेम को इतना काट देना है कि दूसरा बचे ही न ;
तुम अकेले बचो । दूसरे की स्मृति भी न आये , दूसरे का
विचार भी न उठे । जिस दिन तुम बिलकुल अकेले हो और
यह सारा जगत खो गया और इसमें कोई दूसरा न बचा ,
जिससे तुम्हारे संतोष का कोई भी संबंध है , जिससे तुम्हारे
सुख का कोई भी सेतु है , जिस पर तुम किसी भी तरह
निर्भर हो ; जिस दिन तुम परिपूर्ण स्वतंत्र हो गये ।
परिपूर्ण स्वतंत्र तो तुम तभी होओगे , जब प्रेम बिलकुल
कट जाये । क्योंकि प्रेम तो एक तरह की परतंत्रता है ।
दूसरा उसमें जरूरी है । और दूसरे का सुख तुम्हारे सुख का
आधार है । दूसरा दुखी हो तो तुम दुखी हो जाते हो ।
तो प्रेमी तो कैसे ध्यानी हो सकता है ?

एक तो मार्ग ध्यानियों का है ।
बुद्ध , महावीर , पतंजलि उनके शिखर हैं ।
एक मार्ग प्रेमियों का है ।
और प्रेमी कहते हैं कि जब तक तुम्हारे जीवन में प्रेम का
पागलपन न आया , प्रेम की मस्ती न आई ,
तब तक तुम्हारा अहंकार मिटेगा कैसे ?
ध्यानी का जोर है कि दूसरे पर तुम निर्भर रहो तो तुम
परतंत्र हो । प्रेमी का जोर है कि अगर तुम बिलकुल स्वतंत्र
होने की कोशिश किए तो , तुम्हारा अहंकार कैसे मिटेगा ?
तुम ही बचे रहोगे आखिर में , वही तुम्हारा शुद्ध अहंकार
होगा । और अहंकार ही बाधा है ।
प्रेम की कीमिया में ही अहंकार पिघलता है ।
प्रेम की आग में ही अहंकार जलता है ।
प्रेमी कहते हैं , दूसरे का उपयोग तुम निर्भरता के लिए
क्यों करते हो ? दूसरे का उपयोग  समर्पण के लिए करो ।
दूसरे पर निर्भर होने का सवाल ही नहीं ,
दूसरे में खो जाने का सवाल है ।
और जब तुम बचोगे ही नहीं तो कौन निर्भर ?
कौन परतंत्र ?

इसे जरा समझ लें ।
मिटाते दोनों हैं -- ध्यानी दूसरे को मिटाता है ,
प्रेमी अपने को मिटाता है ।
प्रेमी कहता है , दूसरा ही बचेगा ।
एक घडी़ आयेगी , जब मैं रहूंगा ही नहीं ।
फिर किसकी परतंत्रता ? किसका बंधन ?
फिर कौन दुख में ? दो हैं अभी , एक बचना चाहिए ।
ध्यानी दूसरे को मिटाकर अपने को बचा लेता है ;
प्रेमी अपने को मिटाकर दूसरे को बचा लेता है ।
जिस दिन एक बच जाता है , उसी दिन सत्य उपलब्ध हो
जाता है । क्योंकि सत्य यानी एक । सत्य यानी अद्वैत ।

अब इस अद्वैत को पाने के दो ढंग हो सकते हैं :
या तो मैं मिटूं , या तुम मिटो ।
तू ना रहे , या मैं ना रहूं । दोनों मार्ग हैं ।
मेरे देखे दोनों सही हैं । दोनों तरफ से लोग पहुंचे हैं ।
सूफी हैं , कृष्ण - भक्त हैं , मीरा है , चैतन्य है ,
ये प्रेम के रास्ते से पहुंचे ।
और इनकी ऊंचाई बुद्ध , महावीर और पतंजलि से जरा
भी कम नहीं ; इंच भर भी कम नहीं ।
क्योंकि जब एक बचता है तो फर्क ही नहीं रह जाता ,
कौन बचा ! उसे हम क्या कहें ? उसे आत्मा कहें ?
ध्यानी उसे आत्मा कहता है ; प्रेमी उसे परमात्मा कहता है
इसलिए ध्यानी परमात्मा की बात को छोड़ते हैं ,
क्योंकि परमात्मा में दूसरा आ जाता है ।
सिर्फ आत्मा ! इसलिए महावीर कहते हैं , आत्मा ही
परमात्मा है । और प्रेमी कहता है , तू ही मैं हूं ।

ओशो

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