ओशो : तथाता

तथाता 

तुम क्या कह रहे हो? तुम अपनी चिंता के द्वारा क्या कह रहे हो? तुम कह रहे हो कि यह जो हो रहा है, तुम स्वीकार नहीं कर सकते, यह ऐसा नहीं होना चाहिए। तुम ठीक इससे अन्यथा की आशा कर रहे थे ठीक इसके विपरीत? तुम चाहते थे कि यह पत्नी सदा- सदा के लिए तुम्हारी रहे और वह छोड़ कर जा रही है। लेकिन तुम क्या कर सकते हो?

जब प्रेम नहीं रहता तुम क्या कर सकते हो? कोई उपाय नहीं है तुम प्रेम के लिए जोर जबरदस्ती नहीं कर सकते हो। तुम इस पत्नी को अपने साथ रहने के लिए विवश नहीं कर सकते हो। हां, तुम जोर जबरदस्ती कर सकते हो- यही सब लोग कर रहे हैं- तुम जबरदस्ती कर सकते हो। वहां मृत शरीर होगा लेकिन जीवित आत्मा जा चुकी होगी। फिर वह तुम्हारे लिए तनाव बन जाएगी।

प्रकृति के विरुद्ध कुछ नहीं किया जा सकता है। प्रेम एक फूल की खिलावट थी, अब फूल मुर्झा गया है। एक हवा का झोंका तुम्हारे घर आया था, अब वह दूसरे घर में चला गया है। वस्तुओं की प्रकृति ऐसी ही है, वे आगे बढ़ती रहती हैं और परिवर्तित होती रहती हैं।

वस्तुओं का जगत परिवर्तनशील है वहां कुछ भी स्थायी नहीं है। आशा मत करो! अगर तुम इस संसार में जहां सब अस्थायी है स्थायित्व की अपेक्षा करते हो, तो तुम चिंता पैदा कर लोगे। तुम चाहोगे कि यह प्रेम सदा-सदा बना रहे। इस जगत में कुछ भी सदा के लिए नहीं हो सकता- जो भी इस जगत का है वह क्षणिक है। वस्तुओं की यही प्रकृति है ' तथाता। '

इसलिए तुम्हें अब पता है कि प्रेम समाप्त हो गया है। यह बात तुम्हें उदास कर देती है ठीक है उदासी को स्वीकार करो। तुम भयभीत हो रहे हो, भय को स्वीकार करो, उसको दबाओ मत। तुम्हारा रोने का मन हो रहा है रोओ। उसे स्वीकार करो! जबरदस्ती न करो, नकली चेहरा मत बनाओ। ऐसा दिखावा मत करो कि तुम चिंतित नहीं हो, क्योंकि इससे कोई सहायता मिलने वाली नहीं है। अगर तुम चिंतित हो तो तुम चिंतित हो। अगर पत्नी छोड्‌कर जा रही है तो वह जा रही है। अगर अब प्रेम नहीं रहा तो नहीं रहा। तुम वास्तविकता से लड़ नहीं सकते तुम्हें उसे स्वीकार करना ही पड़ेगा।

और अगर तुम उसे धीरे- धीरे स्वीकार करते हो तब तुम लगातार दुखी और पीड़ित रहोगे। अगर तुम उसे बिना किसी शिकायत के स्वीकार कर लेते हो असहाय अवस्था में नहीं बल्कि समझ पूर्वक स्वीकार कर लेते हो तो वह तथाता बन जाता है। तब तुम्हें कोई चिंता नहीं रही कोई समस्या नहीं रही- क्योंकि समस्या सच्चाई के कारण नहीं बल्कि इस कारण से उत्पन्न हो रही थी कि तुम जिस तरह वह घटित हो रही थी उसे स्वीकार नहीं कर सके। तुम चाहते थे कि वह तुम्हारा अनुसरण करे।

स्मरण रहे जीवन तुम्हारा अनुगमन नहीं करने वाला तुम्हें जीवन के पीछे चलना पड़ेगा--शिकायत करते हुए या प्रसन्नतापूर्वक वह तुम्हारा चुनाव है। अगर तुम शिकायत करते हुए जीवन जीते हो तो तुम दुख पाओगे। अगर प्रसन्नतापूर्वक जीवन का अनुसरण करते हो तो तुम एक बुब्दरुष हो जाओगे, तुम्हारा जीवन एक आनंद बन जाएगा।

ओशो

शूून्य की किताब–(Hsin Hsin Ming)-09
'अद्वैत' 
प्रवचन 9

ओशो की अंग्रेजी पुस्तक का हिंदी अनुवाद

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