ओशो : महावीर ने कहा, मौन हो जाओ; तो तुम्हें अपने संगीत का पहली दफा अनुभव हो। चुप हो जाओ, उस चुप्पी में ही, उस अनाहत का नाद शुरू होगा।
साज-शृंगार?
छोड़ दौड़ो सब साज-सिंगार,
रास की मुरली रही पुकार।
गयी सहसा किस रस से भींग
वकुल वन में कोकिल की तान?
चांदनी में उमड़ी सब ओर
कहां के मद की मधुर उफान?
गिरा चाहती भूमि पर इंदु
शिथिलवसना रजनी के संग;
सिहरते पग सकता न संभाल
कुसुम-कलियों पर स्वयं अनंग!
ठगी-सी रूठी नयन के पास
लिये अंजन उंगली सुकुमार,
अचानक लगे नाचने मर्म,
रास की मुरली उठी पुकार
साज-शृंगार?
छोड़ दौड़ो सब साज-सिंगार,
रास की मुरली रही पुकार।
खोल बांहें आलिंगन हेतु
खड़ा संगम पर प्राणाधार;
तुम्हें कंकन-कुंकुम का मोह,
और यह मुरली रही पुकार।
सनातन महानंद में आज
बांसुरी-कंकन एकाकार।
बहा जा रहा अचेतन विश्व,
रास की मुरली रही पुकार।
साज-शृंगार?
छोड़ दौड़ो सब साज-सिंगार,
रास की मुरली रही पुकार।
एक बार भी तुम्हें भीतर की किरणों का बोध हो जाए--सुन पड़ी मुरली, रास का निमंत्रण मिल गया। उस परम प्यारे की सुध आ गयी। वह तुम्हारे भीतर ही बैठा है। वह तुम्हें सदा से ही पुकारता रहा है। लेकिन तुम इतने व्यस्त हो दूसरों के साथ भाषा में, बोलने में, झगड़ने में, मित्रता-शत्रुता बनाने में; तुम इतने व्यस्त हो बाहर कि तुम्हारे भीतर अंतर्तम से उठी मुरली की पुकार तुम्हें सुनायी नहीं पड़ती।
महावीर ने कहा, मौन हो जाओ; तो तुम्हें अपने संगीत का पहली दफा अनुभव हो। चुप हो जाओ, उस चुप्पी में ही, उस अनाहत का नाद शुरू होगा। वह ध्वनिहीन ध्वनि, वह स्वरहीन स्वर तुम्हारे भीतर से उठने लगेगा। तुम्हारी अतल गहराइयों से, तुम्हारी चेतना की परम गहराइयों से तुम्हारे पास तक पहुंचने लगेगा। लेकिन, मौन उसकी अनिवार्य शर्त है। और मौन का अर्थ है ओंठ से मौन, कंठ से मौन, भीतर विचार से मौन--धीरे-धीरे सब तलों पर, सब पर्तों पर मौन। तब तुम मुनि हुए। मुनि का कोई संबंध बाह्य-आचरण से नहीं है। मुनि का संबंध उस अंतसदशा से है, मौन की दशा से है। और जो मौन को उपलब्ध हुआ, वही बोलने का हकदार है। जो अभी मौन को ही नहीं जाना, वह तो बाहर के ही कचरे को भीतर लेता है और बाहर फेंक देता है। उसका बोलना तो वमन जैसा है। जो मौन को उपलब्ध हुआ, उसके पास कुछ देने को है। उसके पास कुछ भरा है, जो बहना चाहता है, बंटना चाहता है। उसके पास कुछ आनंद की संपदा है, जो वह तुम्हारी झोली में डाल दे सकता है।ध्यान में दर्शन है। मौन में दर्शन है। चुप्पी में साक्षात्कार है।
ओशो
छोड़ दौड़ो सब साज-सिंगार,
रास की मुरली रही पुकार।
गयी सहसा किस रस से भींग
वकुल वन में कोकिल की तान?
चांदनी में उमड़ी सब ओर
कहां के मद की मधुर उफान?
गिरा चाहती भूमि पर इंदु
शिथिलवसना रजनी के संग;
सिहरते पग सकता न संभाल
कुसुम-कलियों पर स्वयं अनंग!
ठगी-सी रूठी नयन के पास
लिये अंजन उंगली सुकुमार,
अचानक लगे नाचने मर्म,
रास की मुरली उठी पुकार
साज-शृंगार?
छोड़ दौड़ो सब साज-सिंगार,
रास की मुरली रही पुकार।
खोल बांहें आलिंगन हेतु
खड़ा संगम पर प्राणाधार;
तुम्हें कंकन-कुंकुम का मोह,
और यह मुरली रही पुकार।
सनातन महानंद में आज
बांसुरी-कंकन एकाकार।
बहा जा रहा अचेतन विश्व,
रास की मुरली रही पुकार।
साज-शृंगार?
छोड़ दौड़ो सब साज-सिंगार,
रास की मुरली रही पुकार।
एक बार भी तुम्हें भीतर की किरणों का बोध हो जाए--सुन पड़ी मुरली, रास का निमंत्रण मिल गया। उस परम प्यारे की सुध आ गयी। वह तुम्हारे भीतर ही बैठा है। वह तुम्हें सदा से ही पुकारता रहा है। लेकिन तुम इतने व्यस्त हो दूसरों के साथ भाषा में, बोलने में, झगड़ने में, मित्रता-शत्रुता बनाने में; तुम इतने व्यस्त हो बाहर कि तुम्हारे भीतर अंतर्तम से उठी मुरली की पुकार तुम्हें सुनायी नहीं पड़ती।
महावीर ने कहा, मौन हो जाओ; तो तुम्हें अपने संगीत का पहली दफा अनुभव हो। चुप हो जाओ, उस चुप्पी में ही, उस अनाहत का नाद शुरू होगा। वह ध्वनिहीन ध्वनि, वह स्वरहीन स्वर तुम्हारे भीतर से उठने लगेगा। तुम्हारी अतल गहराइयों से, तुम्हारी चेतना की परम गहराइयों से तुम्हारे पास तक पहुंचने लगेगा। लेकिन, मौन उसकी अनिवार्य शर्त है। और मौन का अर्थ है ओंठ से मौन, कंठ से मौन, भीतर विचार से मौन--धीरे-धीरे सब तलों पर, सब पर्तों पर मौन। तब तुम मुनि हुए। मुनि का कोई संबंध बाह्य-आचरण से नहीं है। मुनि का संबंध उस अंतसदशा से है, मौन की दशा से है। और जो मौन को उपलब्ध हुआ, वही बोलने का हकदार है। जो अभी मौन को ही नहीं जाना, वह तो बाहर के ही कचरे को भीतर लेता है और बाहर फेंक देता है। उसका बोलना तो वमन जैसा है। जो मौन को उपलब्ध हुआ, उसके पास कुछ देने को है। उसके पास कुछ भरा है, जो बहना चाहता है, बंटना चाहता है। उसके पास कुछ आनंद की संपदा है, जो वह तुम्हारी झोली में डाल दे सकता है।ध्यान में दर्शन है। मौन में दर्शन है। चुप्पी में साक्षात्कार है।
ओशो
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