ओशो : आपने कहा कि आपके भीतर सोई हुई उर्जा जब विराट की ऊर्जा से मिलती है तब एक्सप्लोजन, विस्फोट होता है। तो एक्सप्लोजन या समाधि के लिए कुंडलिनी जागरण और ग्रेस का मिलन आवश्यक है या कुंडलिनी का सहस्रार तक विकास और ग्रेस की उपलब्धि एक बात है?

आपने कहा कि आपके भीतर सोई हुई उर्जा जब विराट की ऊर्जा से मिलती है तब एक्सप्लोजन, विस्फोट होता है। तो एक्सप्लोजन या समाधि के लिए कुंडलिनी जागरण और ग्रेस का मिलन आवश्यक है या कुंडलिनी का सहस्रार तक विकास और ग्रेस की उपलब्धि एक बात है?

असली में विस्फोट एक शक्ति से कभी नहीं होता, विस्फोट सदा दो शक्तियों का मिलन है। एक्सप्लोजन जो है, वह एक शक्ति से कभी नहीं होता। अगर एक शक्ति से होता तो कभी का हो जाता।

तुम्हारी माचिस भी रखी है, और तुम्हारी माचिस की काड़ी भी रखी है, वह रखी रहे अनंत-अनंत जन्मो तक--एक इंच के फासले पर, तो आग पैदा नही होगी। उस विस्फोट के लिए दोनों की रगड़ जरुरी है तो हीं आग पैदा होगी। वह छिपी है दोनों में, लेकिन किसी एक में भी अकेले पैदा होने का उपाय नहीं है। जो विस्फोट है, वह दो शक्तियों के मिलन पर पैदा हुई संभावना है।

तो जो हमारा अंतिम चरम बिंदु है कुंडलिनी का, सहस्रार, वह हमारा द्वार है, ग्रेस सदा हीं खड़ी हुई है, जिस द्वार पर परमात्मा निरंतर तुम्हारी प्रतिक्षा कर रहा है। लेकिन तुम हीं अपने द्वार पर नहीं हो, तो तुम्हें अपने द्वार तक आना है, वहां मिलन हो जाएगा। और वह मिलन विस्फोट होगा।
विस्फोट इसलिए कह रहा हूं उसे कि उस मिलन में तुम तत्काल विलीन हो जाओगे, उस मिलन के बाद तुम बचोगे नहीं, जो द्वार पर खड़ा था वही बचेगा, तुम उसी के हिस्से हो जाओगे।


ओशो

जिन खोजा तिन पाइयां

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