ओशो : सत्य को जानना

सत्य को जानना

मनुष्य सत्य के प्रति अनजान और अज्ञानी है।

और सत्य को जानना भी कठिन है,
क्योंकि सत्य को जानने के लिए पहले तुम्हें प्रामाणिक और सच्चा बनना होगा।

केवल समान ही समान को जान सकता है।

मनुष्य झूठा और नकली है, वह गहरे में छली और बहानेबाज है।

वह स्वयं अपने लिए ही प्रामाणिक नहीं है।

उसका मौलिक चेहरा पूरी तरह से मिट चुका है।

उसके पास कई चेहरे हैं, वह अनेक चेहरों का प्रयोग करता है.,,

लेकिन वह स्वयं अपने ही मौलिक चेहरे के प्रति सचेत नहीं है।

मनुष्य अनुकरण करने वाला एक प्राणी है।

वह दूसरों का अनुकरण किए चले जाता है, और धीमे- धीमे वह यह भूल ही जाता है कि उसके अपने स्वयं के पास एक अद्वितीय और अनूठा अस्तित्व है।

सत्य को केवल तभी जाना जा सकता है जब तुम सच्चे और प्रामाणिक बनो।

इसके लिए अत्यधिक प्रयास करना होगा,
पहाड़ पर चढ़ने जैसा इसका पथ दुर्गम है,
इसलिए मनुष्य चालाकी करने की कोशिश करता है।

वह सत्य के सम्बन्ध में विचार करना शुरू कर देता है। 

सत्य के बारे में, दार्शनिकता से विचार करना, बौद्धिक और सैद्धांतिक व्यवस्थाएं निर्मित करना, 

यही है सब कुछ दर्शन शास्त्र:..,.

एक व्यक्ति द्वारा सत्य के सम्बन्ध में न
जाकर, अपने अज्ञान के बारे में स्वयं को धोखा देने वाली मन की एक चाल।

इसी कारण दार्शनिक विचार-धाराओं की बाढ़ सी आई हुई है...और पूरा संसार धारणाओं और सिद्धान्तों में जी रहा है। 

हिंदू मुस्लिम, ईसाई, जैन और बौद्ध लोगों की यहां लाखों विचारधाराएँ हैं। 

और वे सभी बहुत सस्ती हैं, तुम्हें अपने आपको बदलने की जरूरत नहीं है।

तुम्हें केवल सामान्य बुद्धि के औसत दर्जे के मन की जरूरत है।

उच्च बौद्धिक क्षमता की कोई आवश्यकता नहीं है....

तुम कोई भी विचारधारा चुन सकते हो, इसमें कहीं कोई भी कठिनाई नहीं है...

और स्वयं अपने आप से, अपने अज्ञान को छिपा सकते हो।

दर्शनशास्त्र, इसे केवल छिपाने की ही एक विधि है...

एक व्यक्ति को बिना कुछ भी जाने हुए यह अनुभव होना शुरू हो जाता है,कि वह जानता है।

बिना पहला कदम ही उठाए हुए एक व्यक्ति को यह अनुभव होना शुरू हो
जाता है, कि वह पहुंच गया है।

दर्शनशास्त्र, सबसे बड़ी एक बीमारी है..

और एक बार तुम उसके जाल में पड़ गए तो उससे बाहर आना बहुत कठिन होता है,क्योंकि वह इतनी अधिक सघनता से अहंकार की प्रतिपूर्ति करता है कि एक व्यक्ति को जब अपने अज्ञान के बारे में पता चलता है, तो उसे बहुत चोट
लगती है।

और अज्ञान है पूरी तरह सम्पूर्ण: तुम कुछ भी नहीं जानते।

तुम पूरी तरह से अज्ञान के अंधेरे में भटक रहे हो, और यही बात चोट करती है। एक व्यक्ति कम से कम कुछ तो जानना ही चाहता है

ओशो

ऋतु आये फल होय
प्रवचन 7

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