ओशो : रोओ! रोने की कला सीखो!

रोओ! रोने की कला सीखो!


रोओ, रोना सज्दा है।
कभी रो दिये नाम लेकर तुम्हारा।
कभी हमने. राहों में सज्दे बिछाये
मगर तुम न आये।
अगर रो सको, तो उससे सुंदर फिर कुछ और नहीं है।
रोओ! रोने की कला सीखो! कभी—कभी अकारण रोओ। रोने के मजे के लिए ही रोओ। कभी शांत बैठ जाओ और आने दो आंसुओ को। तुम सोचोगे ऐसे कसे आ जाएँगे, कोई कारण तो चाहिए, ऐसे कैसे आ जाएँगे? मैं तुमसे कहता हूँ तुम जरा प्रतीक्षा तो करो किसी दिन बैठकर! तुम चकित होओगे, आते हैं। क्योंकि......
कारण तो जिंदगी भर रहे हैं, तुम आंसू रोक कर बैठे हो। कारण तो कितने आए और चले गये, तुम नहीं रोए हो। और हर बार आँसू भरे थे और निकलना चाहते थे। उनके बाँध तुमने बाँध दिये हैं। बाँध को टूटने दो।

बैठो और रोओ। सौंदर्य को देखो परमात्मा के और रोओ। संगीत को सुनो परमात्मा के और रोओ। आह्लाद में रोओ। रोओ और नाचो। नृत्य तुम्हारे शरीर को पवित्र कर जाएगा। आँसू तुम्हारी आँखों को पवित्र कर जाएँगे। रोओ, विरह में रोओ,
परमात्मा नहीं मिला है अब तक इसलिए रोओ। और फिर जब मिल जाए तो इसलिए रोना कि परमात्मा मिल गया है। रोना दोनों समय काम आता है। जब नहीं मिला तब भी, और जब मिल जाता है तब भी।

आँसू हृदय से आते हैं। इसलिए तुम रोओगे तो दूसरे समझेंगे दुख में हो, पीड़ा में हो। समझाएँगे, सांत्वना देंगे। उनसे कहना कि तुम दुख के कारण नहीं रो रहे हो। क्योंकि परमात्मा का विरह भी बड़ा आनंदपूर्ण है। धन्यभागी हैं वे जो उसके विरह में जलते हैं। क्योंकि उन्हीं का मिलन भी होगा। उसकी याद में बितायी गयी घड़ियाँ कीमती घड़ियाँ हैं। उसके इंतजार में बिताये पल बहुमूल्य हैं।

कट तो गयी है हिज की रात
कैसे कटी यह और है बात

ओशो

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