ओशो : ध्यान क्या है?

ध्यान क्या है? 

तुम जो भी होशपूर्वक करते हो वह ध्यान है-

ध्यान का अंतरतम और सार तत्व है यह सीखना कि कैसे साक्षी हों। 

एक कौआ आवाज दे रहा है... तुम सुन रहे हो। यहां दो है —विषय - वस्तु (आब्जेक्ट) और विषयी (सब्जेक्ट) लेकिन क्या तुम उस दृष्टा को देख सकते हो जो इन दोनों को देख रहा है? —कौआ —सुनने वाला —और फिर एक 'कोई और' जो इन दोनों को देख रहा है। यह एक सीधी - सरल घटना है। 

तुम एक वृक्ष को देखते हो —तुम हो और वृक्ष है, लेकिन क्या तुम एक और तत्व को नहीं पाते? —कि तुम वृक्ष को देख रहे हो और फिर एक दृष्टा है जो देख रहा है कि तुम वृक्ष को देख रहे हो। 

साक्षी ध्यान है। तुम क्या देखते हो, यह बात गौण है। तुम वृक्ष को देख सकते हो, तुम नदी को देख सकते हो, बादलों को देख सकते हो, तुम बच्चों को आसपास खेलता हुआ देख सकते हो। साक्षी होना ध्यान है। तुम क्या देखते हो यह बात नहीं है, विषय-वस्तु की तुम जो कुछात नहीं है। 

देखने की गुणवत्ता, होशपूर्ण और सजग होने की गुणवत्ता —ध्यान है। 

एक बात ध्यान रखें, ध्यान का अर्थ है होश। तुम जो भी होशपूर्वक करते हो वह ध्यान है। कर्म क्या है, यह प्रश्न नहीं, किंतु गुणवत्ता जो तुम कर्म में ले आते हो, उसकी बात है। चलना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक चलो। बैठना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक बैठ सको। पक्षियों की चहचहाहट को सुनना ध्यान हो सकता है, यदि तुम होशपूर्वक सुन सको। या केवल अपने भीतर मन की आवाजों को सुनना ध्यान बन सकता है, यदि तुम जाग्रत और साक्षी रह सको। 

सारी बात यह है कि तुम सोये - सोये मत रहो। फिर जो भी हो, ध्यान होगा। 

ओशो 

ध्यान योग

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