ओशो : शांति, परम शांति वह है, जहां कोई उत्तेजना नहीं है–न सुख की, न दुख की। जहां सुख भी नहीं, जहां दुख भी नहीं, ऐसा जहां परम शांत हुआ चित्त, वहीं आनंद फलित होता है, वहीं प्रभु का द्वार खुलता है, वहीं परम सत्य में प्रवेश होता है।

सुना है मैंने, नादिर एक स्त्री को प्रेम करता था। लेकिन उस स्त्री ने नादिर की तरफ कभी ध्यान नहीं दिया। नादिरशाह साधारण आदमी नहीं था, असाधारण आदमी था। हत्यारों में उस जैसा असाधारण दूसरा नहीं है। अभी-अभी हमने कुछ रिकार्ड तोड़े हैं–हिटलर, स्टैलिन के साथ। लेकिन हिटलर और स्टैलिन का जो हत्यारापन है, वह बड़ा परोक्ष है। उन्हें कभी ठीक पता नहीं चलता कि वे मार रहे हैं। नादिरशाह का हत्यारापन सीधा, प्रत्यक्ष था; वही मार रहा था सामने छाती में।

नादिरशाह को उस स्त्री ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन जब नादिरशाह को पता चला कि वह उसके ही एक पहरेदार को, साधारण सिपाही को प्रेम करती है, तो पागल हो गया। अपने बुद्धिमानों को उसने बुलाया और कहा कि सजा बताओ, क्या सजा दूं? बुद्धिमान हैरान हुए, क्योंकि नादिरशाह सजा इनवेंट करने में इतना कुशल था कि वह बुद्धिमानों से पूछे? बुद्धिमान थोड़े हैरान हुए! उन्होंने कहा, आपकी कुशलता हम न पा सकेंगे। आपसे ज्यादा कुशल और कौन है? सताने में आप ऐसी-ऐसी तरकीबें निकालते हैं! आपसे ज्यादा हम कुछ न बता सकेंगे। लेकिन नादिरशाह ने कहा कि नहीं; मैं जो भी सोच सका, सब कम पड़ता है। तुम कुछ ऐसा सोचकर आओ कि जैसा कभी किसी ने किसी को न सताया हो।
उसके विद्वानों में से एक मनसशास्त्री ने कहा कि अगर मेरी मानें, तो मैं आपको बताऊं। नादिरशाह मान गया, जो उसने बताया। और सजा दी गई। ऐसी सजा पहली दफा दी गई; और अगर बहुत दफे दी जाए, तो दुनिया में बड़ी मुसीबत हो जाए। सजा बड़ी अजीब थी। सोच भी नहीं सकते, ऐसी थी।

दोनों को नग्न करके, आलिंगन में बांधकर रस्सियों से, और एक खंभे में बांध दिया गया। न खाना, न पीना। दोनों के चेहरे एक-दूसरे की तरफ। क्षणभर को तो उन्हें लगा कि हमारे जीवन का स्वर्ग मिल गया। इसी के लिए आतुर थे कि एक-दूसरे की बांह में पहुंच जाएं! पहुंच गए! थोड़े हैरान हुए कि नादिर को यह क्या हुआ है! लेकिन उन्हें पता नहीं कि एक मनोवैज्ञानिक ने सलाह दी है। और राजनीतिज्ञों को जब भी मनोवैज्ञानिक सलाहकार मिल जाएंगे, तब दुनिया में जितनी दुर्घटनाएं होंगी, उतनी और कभी नहीं हो सकतीं।
मिनट, दो मिनट, फिर घबड़ाहट शुरू हुई।

क्योंकि कोई किसी को आलिंगन में ले ले, तो क्षणभर में आलिंगन टूट जाए, तो सुख का खयाल रह जाता है। दस मिनट रह जाए, तो घबड़ाहट और बेचैनी शुरू हो जाती है। पंद्रह मिनट, आधा घंटा…। जिन ओंठों में समझा था कि गुलाब के फूल खिलते हैं, उनसे बदबू आने लगी। कहीं खिलते नहीं, किन्हीं ओंठों में गुलाब के फूल नहीं खिलते। सिर्फ उन कवियों की कविताओं में खिलते हैं, जिन्हें ओंठों का कोई पता नहीं है। जिनको भी ओंठों का थोड़ा अनुभव है, वे जानते हैं, फूल नहीं खिलते। सब तरह की बदबू मुंह से उठती है। उठने लगी।

दिन बीता, चौबीस घंटे हो गए। सोए नहीं। रातभर की तंद्रा आंखों में, शरीर में भर गई। ऐसा लगने लगा कि दोनों लाश हो गए हैं। आदमी जिंदा नहीं हैं। फिर मल-मूत्र भी बहने लगा; क्योंकि दो दिन बीत गए। फिर तो गंदगी भारी हो गई। फिर तो वे चीखने-चिल्लाने लगे कि हमें छुड़ा दो; माफ करो। लेकिन नादिर रोज आकर देख जाता कि प्रेमियों की क्या हालत है!

फिर तो ऐसा मन होने लगा कि अगर हाथ खुले हों, तो एक-दूसरे की गर्दन दबा दें। उस जगत में उन दोनों को उन क्षणों में जैसी शत्रुता अनुभव हुई होगी, ऐसी किन्हीं प्रेमियों को कभी नहीं हुई है।
प्रेमियों का सबसे बड़ा सौभाग्य यह है कि वे कभी मिल न पाएं। मिल जाएं, तो उपद्रव शुरू होते हैं। और इस भांति मिल जाएं, इस पूरी तरह मिल जाएं, तब तो बहुत कठिनाई है। पंद्रह दिन बाद सोच सकते हैं कि क्या हालत हुई होगी! दो लाशों की तरह मुर्दा, पागल, विक्षिप्त!

कहते हैं कि जब पंद्रह दिन बाद मनोवैज्ञानिक ने सलाह दी कि अब छोड़ दो, अब दूसरा मजा देखो, उन दोनों को छोड़ दिया। वे दोनों एक-दूसरे की तरफ पीठ करके जो भागे, तो दोबारा जिंदगी में फिर कभी नहीं मिले। फिर कभी एक-दूसरे को देखा भी नहीं। बड़ी कठिन रही होगी सजा।

सब सुख दुख हो जाते हैं। और सब दुख भी अभ्यास से सुख हो जाते हैं। सुख भी उत्तेजना, दुख भी उत्तेजना, इसलिए उत्तेजनाएं एक-दूसरे में बदल सकती हैं, बदल जाती हैं।

शांति, परम शांति वह है, जहां कोई उत्तेजना नहीं है–न सुख की, न दुख की। जहां सुख भी नहीं, जहां दुख भी नहीं, ऐसा जहां परम शांत हुआ चित्त, वहीं आनंद फलित होता है, वहीं प्रभु का द्वार खुलता है, वहीं परम सत्य में प्रवेश होता है।

ओशो

गीता-दर्शन

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