ओशो : प्रेम भक्ति का प्राण है

प्रेम भक्ति का प्राण है

होरी खेलत हैं गिरधारी।

कृष्ण हैं अकेले, जिनमें रस है और रास है; जिनमें रहस्य है, सौंदर्य है, शृंगार है। जीवन की बड़ी गरिमा, महिमा कृष्ण में प्रकट हुई है। सब रंगों में, सब कलाओं में जीवन कृष्ण में प्रकट हुआ है।
होरी खेलते हैं गिरधारी।
मुरली चंग बजत डफ न्यारो, संग जुवति व्रजनारी।
चंदन केसर छिड़कत मोहन, अपने हाथ बिहारी।
ऐसा चंदन और केसर छिड़कता हुआ परमात्मा पृथ्वी पर कहीं किसी ने कल्पना भी नहीं की है।
भरि—भरि मूठि गुलाल लाल चहुं देत सवन पै डारी।
यह रसमुग्ध दशा, यह समाधि, यह जीवन के साथ अविरोध! भक्त के लिए कृष्ण के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। भक्त बुद्ध के पास नहीं जा सकता। वहां मुरली नहीं बजती, चंग नहीं बजता, डफ नहीं बजता। वहां ध्यानी बैठ सकता है चुप, मगर प्रेमी क्या करे? भक्त क्राइस्ट के पास भी नहीं जा सकता। वहां करुणा है अपार, बलिदान है महान, जगत के लिए अपने को समर्पित करने की बड़ी कुर्बानी है; मगर उदासी है, सन्नाटा है। चंदन—केसर वहां कोई नहीं छिड़कता। वहां चंदन—केसर की सुगंध नहीं। और कोई नहीं है कि गुलाल फेंक दे। कोई नहीं है जो तुम्हें गैरिक रंग में रंग दे।
खयाल रखना, गैरिक रंग, गुलाल का रंग, बहुत बातों का प्रतीक है। सूरज का। सुबह का ऊगता सूरज गैरिक होता है—जीवन का, रोशनी का, फूलों का—सारे फूल हरियाली में लाल होते हैं...रक्त का, लहू का। वही जीवन की धारा है। उल्लास का रंग है लाल। आनंद का रंग है लाल।
भरि—भरि मूठि गुलाल लाल चहुं देत सवन पै डारी।
छैल—छबीले नवल कान्ह, संग...
परमात्मा की ऐसी छैल—छबीली प्रतिमा जिन्होंने खोजी, जिन्होंने सोची, जिन्होंने विचारी, उन्होंने अपूर्व रूप से प्रेम किया होगा, तभी यह हो पाया। इस रूप में परमात्मा का अवतरण तभी हो सकता है, जब इस रूप में हजारों—लाखों लोग परमात्मा को पुकारे हों। इस रूप में अवतरण तभी हो सकता है, जब लाखों इस रूप में स्वागत करने को तैयार रहे हों। परमात्मा उसी रूप में उतरता है, जिस रूप में हम पुकारते हैं। हमारी पुकार ही उसे लाती है।
छैल—छबीले नवल कान्ह, संग...
नये हैं कृष्ण—सदा नये हैं! छैल—छबीले हैं! बड़े सुंदर हैं! सारे जगत का सौंदर्य उनमें समाया हुआ है। सारे जगत का सौंदर्य जैसे संगठित हो आया है, एक जगह हो गया है, एक स्थान पर एकत्रित हो गया है! जैसे सारे फूलों की गंध और सारे पक्षियों के गीत और सारे तारों की रोशनी और सारी नदियों का कलरव, सारे वाद्यों का संगीत, सारी आंखों की गरिमा, सारे चेहरों का रूप एक जगह संगृहीत हो गया है!
छैल—छबीले नवल कान्ह, संग स्यामा प्राण प्यारी।
और "श्यामा' उनके आस—पास नाच रही है। मीरा राधा के लिए अक्सर "श्यामा' शब्द का उपयोग करती है; वह बड़ा प्यारा है। क्योंकि जो श्याममय हो गई, अब उसका अलग नाम क्या! इसलिए "राधा' न कह कर मीरा अक्सर "श्यामा' कहती है। श्याम जैसी ही हो गई जो। श्याममय हो गई। श्याम हो गई।
और कृष्ण के पास नाचना हो तो श्यामा हुए बिना और कोई उपाय भी नहीं। जिसे भी नाचना हो, उसे श्यामा होना ही पड़ेगा।
अब यह खयाल रखना, भक्त को पुरुष की कठोरता छोड़नी पड़ती है। भक्त को स्त्रैण...सौंदर्य, सरलता ग्राहकता ग्रहण करनी पड़ती है। भक्त तो स्त्री ही होता है। वह पुरुष हो कि स्त्री, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। भक्ति स्त्रैण है। क्योंकि भक्त के लिए तो सिर्फ एक ही प्यारा है—वह कृष्ण है। एक ही प्रीतम है।
श्याम के पास श्यामा होने की तैयारी हो, तो ही भक्त गति कर पाता है। अहंकार छोड़ना पड़ेगा। स्त्री को तो इतना कठिन नहीं है भक्त होना, पुरुष को बहुत कठिन है। क्योंकि उसे पुरुष होने का अहंकार भी छोड़ना पड़ेगा।
इसलिए कभी—कभी ऐसा हुआ है कि जब पुरुष कोई भक्त हुआ है तो स्त्रियों से भी बाजी मार ले गया है। मीरा का भक्त होना तो बिलकुल ठीक, सुगम है; लेकिन चैतन्य का? चैतन्य का भक्त होना...! मीरा को तो अहंकार छोड़ना है, चैतन्य को दो अहंकार छोड़ने हैं। अहंकार तो छोड़ना ही है, फिर पुरुष होने का भाव भी छोड़ना है। वह और भी गहन अहंकार है। लेकिन श्यामा हुए बिना कोई मार्ग नहीं है। भक्त बनना हो तो श्यामा बनना पड़ेगा।


ओशो

पग घुंघुरु बांध
प्रवचन  11
    

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