ओशो : ध्यान किसलिए करते हैं ?
ध्यान किसलिए करते हैं ?
अगर कोई आपसे पूछे, प्रेम किसलिए करते हैं? तो क्या कहेंगे? कहेंगे, प्रेम स्वयं अपने आप आनंद है। वह किसी के लिए नहीं, कोई परपज नहीं है और आगे। प्रेम अपने में ही आनंद है।
उसके बाहर और कोई कारण नहीं जिसके लिए प्रेम करते हों। और अगर कोई किसी कारण से प्रेम करता हो तो हम फौरन समझ जाएंगे कि गड़बड़ है, यह प्रेम सच्चा नहीं है।
मैं आपको इसलिए प्रेम करता हूं कि आपके पास पैसा है, वह मिल जाएगा। तो फिर प्रेम झूठा हो गया। मैं इसलिए प्रेम करता हूं कि मैं परेशानी में हूं, अकेला हूं, आप साथी हो जाएंगे। वह प्रेम झूठा हो गया। वह प्रेम न रहा। जहां कोई कारण है वहां प्रेम न रहा, जहां कुछ पाने की इच्छा है वहां प्रेम न रहा। प्रेम तो अपने आप में पूरा है।
ठीक वैसे ही, ध्यान के आगे कुछ पाने को जब हम पूछते हैं—क्या मिलेगा? वह हमारा लोभ पूछ रहा है। मोक्ष मिलेगा कि नहीं? आत्मा मिलेगी कि नहीं? वह पूछ रहा है हमारा लोभ। वही जो हमारी हमेशा लाभ, लोभ की जो चिंतना है, वह काम कर रही है।
नहीं, मैं आपसे कहता हूं, कुछ भी नहीं मिलेगा। और जहां कुछ भी नहीं मिलता वहीं वह मिल जाता है, सब कुछ जिसे हम कहें। जिसे हमने कभी खोया नहीं, जिसे हम कभी खो नहीं सकते, जो हमारे भीतर मौजूद है।
अगर उसको पाना हो जो हमारे भीतर मौजूद है तो कुछ और पाने की चेष्टा सार्थक नहीं हो सकती है।
सब पाने की चेष्टा छोड़ कर जब हम मौन, चुप रह जाएंगे, तो उसके दर्शन होंगे जो हमारे भीतर निरंतर मौजूद है।
कुछ वहां मौजूद है, उसे पाने के लिए अक्रिया में हो जाना जरूरी है, सारी क्रियाएं छोड़ कर अक्रिया में हो जाना जरूरी है।
ओशो
अगर कोई आपसे पूछे, प्रेम किसलिए करते हैं? तो क्या कहेंगे? कहेंगे, प्रेम स्वयं अपने आप आनंद है। वह किसी के लिए नहीं, कोई परपज नहीं है और आगे। प्रेम अपने में ही आनंद है।
उसके बाहर और कोई कारण नहीं जिसके लिए प्रेम करते हों। और अगर कोई किसी कारण से प्रेम करता हो तो हम फौरन समझ जाएंगे कि गड़बड़ है, यह प्रेम सच्चा नहीं है।
मैं आपको इसलिए प्रेम करता हूं कि आपके पास पैसा है, वह मिल जाएगा। तो फिर प्रेम झूठा हो गया। मैं इसलिए प्रेम करता हूं कि मैं परेशानी में हूं, अकेला हूं, आप साथी हो जाएंगे। वह प्रेम झूठा हो गया। वह प्रेम न रहा। जहां कोई कारण है वहां प्रेम न रहा, जहां कुछ पाने की इच्छा है वहां प्रेम न रहा। प्रेम तो अपने आप में पूरा है।
ठीक वैसे ही, ध्यान के आगे कुछ पाने को जब हम पूछते हैं—क्या मिलेगा? वह हमारा लोभ पूछ रहा है। मोक्ष मिलेगा कि नहीं? आत्मा मिलेगी कि नहीं? वह पूछ रहा है हमारा लोभ। वही जो हमारी हमेशा लाभ, लोभ की जो चिंतना है, वह काम कर रही है।
नहीं, मैं आपसे कहता हूं, कुछ भी नहीं मिलेगा। और जहां कुछ भी नहीं मिलता वहीं वह मिल जाता है, सब कुछ जिसे हम कहें। जिसे हमने कभी खोया नहीं, जिसे हम कभी खो नहीं सकते, जो हमारे भीतर मौजूद है।
अगर उसको पाना हो जो हमारे भीतर मौजूद है तो कुछ और पाने की चेष्टा सार्थक नहीं हो सकती है।
सब पाने की चेष्टा छोड़ कर जब हम मौन, चुप रह जाएंगे, तो उसके दर्शन होंगे जो हमारे भीतर निरंतर मौजूद है।
कुछ वहां मौजूद है, उसे पाने के लिए अक्रिया में हो जाना जरूरी है, सारी क्रियाएं छोड़ कर अक्रिया में हो जाना जरूरी है।
ओशो
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