ओशो : मन
मन
संसार को दोष मत दो ! अपने मन को समझो।
मन ही तुम्हारा असली संसार है।
लेकिन मन की तो हम चिंता नहीं करते, मन को तो लिए फिरते है, मन को तो सजाते है, संसार को गालियां देते है।
संसार जिसने तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ा नहीं।
यह वृक्षों का संसार, यह चांद - तारों का संसार, ये आकाश में सूरज ये बदलियां, इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा ?
यह विराट की अदभुत लीला, इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा ?
इसको गाली देते हो, कहते हो, यह सब माया।
और भीतर तुम्हारे जो माया का मूल स्रोत है, तुम्हारी कल्पनाओं का जाल, तुम्हारी आकांक्षाओं का जाल, तुम्हारी तृष्णाओं का अनंत - अनंत फैलाव, उसको गटके बैठे हो।
उसको उगलो, उसको थूको, वही है भूल।
मैं तुम्हारे मन को संसार कहता हूं।
ओशो
संसार को दोष मत दो ! अपने मन को समझो।
मन ही तुम्हारा असली संसार है।
लेकिन मन की तो हम चिंता नहीं करते, मन को तो लिए फिरते है, मन को तो सजाते है, संसार को गालियां देते है।
संसार जिसने तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ा नहीं।
यह वृक्षों का संसार, यह चांद - तारों का संसार, ये आकाश में सूरज ये बदलियां, इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा ?
यह विराट की अदभुत लीला, इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा ?
इसको गाली देते हो, कहते हो, यह सब माया।
और भीतर तुम्हारे जो माया का मूल स्रोत है, तुम्हारी कल्पनाओं का जाल, तुम्हारी आकांक्षाओं का जाल, तुम्हारी तृष्णाओं का अनंत - अनंत फैलाव, उसको गटके बैठे हो।
उसको उगलो, उसको थूको, वही है भूल।
मैं तुम्हारे मन को संसार कहता हूं।
ओशो
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