ओशो : ध्यान दर्शन

ओशो

एक मकान बदलने में तीन सप्ताह लग जाते हों, तो चित्त बदलने में तीन महीने को बहुत ज्यादा तो नहीं कहिएगा न! तीन महीने बहुत ज्यादा नहीं हैं। बहुत थोड़ी सी बात है। तीन महीने सतत, इसका संकल्प लेकर जाएं कि तीन महीने सतत करेंगे।

नहीं लेकिन बड़ा मजा है! कोई कहता है कि नहीं, आज थोड़ा जरूरी काम आ गया। कोई कहता है, आज किसी मित्र को छोड़ने एयरपोर्ट जाना है। कोई कहता है, आज स्टेशन जाना है। कोई कहता है, आज मुकदमा आ गया।

लेकिन न तो आप खाना छोड़ते हैं, न आप नींद छोड़ते हैं, न आप अखबार पढ़ना छोड़ते हैं, न आप सिनेमा देखना छोड़ते हैं, न सिगरेट पीना छोड़ते हैं। जब छोड़ना होता है तो सबसे पहले ध्यान छोड़ते हैं, तो बड़ी हैरानी होती है। क्योंकि और भी चीजें छोड़ने की हैं आपके पास। और भी चीजें छोड़ने की हैं, उनमें से कभी नहीं छोड़ते। तो ऐसा लगता है कि जिंदगी में यह ध्यान और परमात्मा, हमारी जो फेहरिस्त है जिंदगी की, उसमें आखिरी आइटम है। जब भी जरूरत पड़ती है, पहले इस बेकार को अलग कर देते हैं, बाकी सब को जारी रहने देते हैं।

नहीं; ध्यान केवल उन्हीं का सफल होगा, जिनकी जिंदगी की फेहरिस्त पर ध्यान नंबर एक बन जाता है। अन्यथा सफल नहीं हो सकता है। सब छोड़ दें, ध्यान मत छोड़ें। एक दिन खाना न खाएं, चलेगा; थोड़ा लाभ ही होगा, नुकसान नहीं होगा। क्योंकि चिकित्सक कहते हैं कि सप्ताह में एक दिन खाना न खाएं तो लाभ होगा। एक दिन दो घंटे न सोएं तो बहुत फर्क नहीं पड़ेगा। कब्र में सोने के लिए बहुत घंटे मिलने वाले हैं।

और कितना सोते हैं, कुछ थोड़ा सोते हैं! एक आदमी साठ साल जीता है, तो बीस साल सोता है। आठ घंटे के हिसाब से अगर गिनती कर लें, तो बीस साल सोता है। अगर सारा हिसाब लगाया जाए साठ साल जीने वाले आदमी का, तो बहुत मुश्किल होती है यह जान कर कि वह जीता कब है। बीस साल सोने में गंवाता है, कुछ साल खाने में गंवाता है, कुछ साल सिगरेट पीने में, सिनेमा देखने में, अखबार पढ़ने में गंवाता है, कुछ साल मौसम अच्छा है कि नहीं है अच्छा, इसकी बकवास में गंवाता है। न मालूम क्या-क्या करने में गंवा देता है। और आखिर में हाथ में पूंजी क्या होती है? मरते वक्त हाथ बिलकुल खाली होते हैं। बच्चे के हाथ से भी ज्यादा खाली होते हैं।

कभी खयाल किया कि बच्चे मुट्ठी बांधे पैदा होते हैं और बूढ़े मुट्ठी खोल कर मरते हैं। बच्चे पोटेंशियली मुट्ठी बांध कर आते हैं, अभी बड़ी आशाएं हैं, अभी मुट्ठी बंधी है। बूढ़ों की सब आशाएं भी खत्म हो जाती हैं। सब चुक गया, हाथ खुल जाता है।,,,,,,,,,

-ध्यान दर्शन

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