ओशो : गुरुप्रसाद क्या है ?
गुरुप्रसाद क्या है ?
अगर तुम अपनी ही तरफ से कोशिश करते रहोगे, करीब करीब असंभव है कि तुम तर जाओ।
कोई चाहिए जागा हुआ जो तुम्हें सतत सचेत करता रहे। उसका ही अर्थ है गुरुप्रसाद।
गुरुप्रसाद ???...प्रसाद इसलिए कि वह तुमसे कुछ लेता नहीं।
तुम्हारे पास कुछ है भी नहीं कि तुम उसे दे सको।
प्रसाद इसलिए कि वह बेशर्त दान है। वह तुम्हें दे रहा है; तुम ले लो, बस इतना ही काफी है, कुछ और उत्तर में चाहिए नहीं।
इसलिए गुरु जो भी देता है, वह प्रसाद है। तुम उसको कभी भी उत्तर चुका नहीं सकते।
कहावत है पुरानी: पिता का ऋण चुकाए जा सकता है, मां का ऋण चुकाया जा सकता है, शिक्षक का ऋण चुकाया जा सकता है;
लेकिन तुम गुरु का ऋण कैसेचुकाओगे ???तुम क्या दोगे वापिस ???
जिससे गुरु का ऋण चुक गए ???
बुद्ध से उनके शिष्य आनंद ने पूछा कि हम क्या दें कि हम उऋण हो जाएं ???
बुद्ध ने कहा, तुम एक ही काम करो, तुम जाओ और जो सोये हैं उनको जगाओ। और कोई उपाय नहीं है।
गुरु से उऋण होने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए हम उसे प्रसाद कहते हैं।
वह जो भी दे, वह प्रसाद।
वह राख उठाकर दे देता है, तो प्रसाद। उसके स्पर्श से राख भी स्वर्ण हो जाती है। वह दे रहा है, उसका देना ही हर चीज को मूल्यवान बना देता है।
"जो जागा हुआ है, उसके हाथ की राख भी मूल्यवान है। जो सोया हुआ है, उसके हाथ का स्वर्ण भी राख है।"
सुनो भई साधो
ओशो
अगर तुम अपनी ही तरफ से कोशिश करते रहोगे, करीब करीब असंभव है कि तुम तर जाओ।
कोई चाहिए जागा हुआ जो तुम्हें सतत सचेत करता रहे। उसका ही अर्थ है गुरुप्रसाद।
गुरुप्रसाद ???...प्रसाद इसलिए कि वह तुमसे कुछ लेता नहीं।
तुम्हारे पास कुछ है भी नहीं कि तुम उसे दे सको।
प्रसाद इसलिए कि वह बेशर्त दान है। वह तुम्हें दे रहा है; तुम ले लो, बस इतना ही काफी है, कुछ और उत्तर में चाहिए नहीं।
इसलिए गुरु जो भी देता है, वह प्रसाद है। तुम उसको कभी भी उत्तर चुका नहीं सकते।
कहावत है पुरानी: पिता का ऋण चुकाए जा सकता है, मां का ऋण चुकाया जा सकता है, शिक्षक का ऋण चुकाया जा सकता है;
लेकिन तुम गुरु का ऋण कैसेचुकाओगे ???तुम क्या दोगे वापिस ???
जिससे गुरु का ऋण चुक गए ???
बुद्ध से उनके शिष्य आनंद ने पूछा कि हम क्या दें कि हम उऋण हो जाएं ???
बुद्ध ने कहा, तुम एक ही काम करो, तुम जाओ और जो सोये हैं उनको जगाओ। और कोई उपाय नहीं है।
गुरु से उऋण होने का कोई उपाय नहीं है। इसलिए हम उसे प्रसाद कहते हैं।
वह जो भी दे, वह प्रसाद।
वह राख उठाकर दे देता है, तो प्रसाद। उसके स्पर्श से राख भी स्वर्ण हो जाती है। वह दे रहा है, उसका देना ही हर चीज को मूल्यवान बना देता है।
"जो जागा हुआ है, उसके हाथ की राख भी मूल्यवान है। जो सोया हुआ है, उसके हाथ का स्वर्ण भी राख है।"
सुनो भई साधो
ओशो
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