ओशो : जो चुनावरहित हो जाता, जो निर्विकल्प हो जाता, उसे आत्मा का दर्शन होता है।

रामकृष्ण के जीवन में बड़ी प्यारी घटना है। रामकृष्ण बचपन से ही ईश्वर की तरफ दौड़े हुए चित्त के व्यक्ति थे। मंदिर के सामने से निकलते थे तो फिर उनका घर पहुंचना मुश्किल हो जाता; वहीं नाचने लगते; वहीं लेट जाते, सीढ़ियों पर पड़े रहते। कोई राम का नाम ले दे, तो भाव में आ जाते। तो घर के लोग जानते थे कि यह लड़का संसार में नहीं जाएगा। कोई आशा नहीं थी। लेकिन फिर भी मां—बाप का फर्ज था, तो जब उम्र हुई तो उन्होंने पूछा कि राम—उनका नाम था गजाधर—शादी करोगे? सोचा था, रामकृष्ण इनकार कर देंगे। रामकृष्ण बहुत प्रफुल्लित हो गए। उन्होंने कहा, शादी कैसी होती है? जरूर करेंगे! घर के लोगों को भी सदमा हुआ, कि सोचा था कि यह संन्यासी वृत्ति का है, शादी नहीं करेगा, यह क्या हुआ!
फिर लड़की की तलाश हुई। फिर लड़की खोजी गई। लड़की बहुत छोटी थी। कोई आठ—दस साल का अंतर था दोनों की उम्र में। रामकृष्ण लड़की को देखने गए। उनके साथ ही परिवार के और लोग गए। रामकृष्ण की माँ ने एक तीन रुपए रामकृष्ण के खीसे में रख दिए कि कोई जरूरत पड़े, खर्च इत्यादि। पास ही गांव था ऐसे। रामकृष्ण सज—धज कर—जैसा सजा— धजा दिया—पहुंच गए।
लड़की बहुत प्यारी थी। रामकृष्ण ने वे तीनों रुपए उसके पैर में रख कर उसके पैर छू लिए! तो सब मुश्किल में पड़ गए। और सबने कहा कि पागल, यह तेरी पत्नी होने वाली है! और तूने पैर छू लिए! और ये तीन रुपए किसलिए चढ़ा दिए? तो रामकृष्ण ने कहा, मेरी मां जैसी प्यारी लगती है। क्योंकि रामकृष्ण एक ही प्रेम जानते थे, वह मां जैसा प्रेम। बहुत प्यारी लगती है, मां जैसी! इसको मैं मां ही कहूंगा, पत्नी भी हो तो हर्ज क्या!
फिर शादी भी हो गई, लेकिन रामकृष्ण शारदा को मां ही कहते रहे, उसके पैर ही छूते रहे। और जब काली की पूजा का दिन आता, तो वे काली की पूजा न करके शारदा को बिठा लेते सिंहासन पर और उसकी पूजा कर लेते। और वे कहते, जब जिंदा मां है, तो फिर मूर्ति की क्या जरूरत?
पत्नी बंधन न रही। उसे बंधन की तरह देखा ही नहीं। हाथ बढ़ा दिया, जंजीर ले ली।
आपकी भाव—दशा में निर्भर करता है। दुख दुख है, क्योंकि आप दुख को नहीं चाहते और सुख को चाहते हैं —इसलिए दुख है। दुख इसलिए है कि उसके विपरीत को आप चाहते हैं। नहीं तो क्या दुख है? विपरीत की मांग में छिपा है दुख। अशांति क्या है? क्योंकि आप शांति को चाहते हैं, इसलिए अशांति है। हमारे चुनाव में हमारा संसार है।
उपनिषद का यह सूत्र कहता है, जो चुनावरहित हो जाता, जो निर्विकल्प हो जाता, उसे आत्मा का दर्शन होता है। क्योंकि जो बाहर चुनाव नहीं करता—न चुनता है सुख को, न दुख को, न प्रेम को, न घृणा को; न संसार को, न मोक्ष को, न पदार्थ को, न परमात्मा को—जो बाहर चुनता ही नहीं, जिसके सब चुनाव क्षीण हो जाते हैं, वह तत्काल भीतर पहुंच जाता है; क्योंकि चुनाव में ही चेतना अटकती है बाहर। जिसे हम चुनते हैं, उसमें हम अटक जाते हैं। जब कोई चुनता ही नहीं तो अटकाव नष्ट हो गया, उसका संबंध किनारे से छूट जाता है, उसका संबंध भीतर की मझधार से जुड़ जाता है, वह भीतर की धारा में लीन हो जाता है।

ओशो
अध्यात्म उपनिषद

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