ओशो : डायनेमिक मेडिटेशन
ओशो : डायनेमिक मेडिटेशन
यह ध्यान शरीर और मन के भीतर पुराने गहरे हुए ढाँचे को तोड़ने के लिए है जो व्यक्ति को अतीत के कारागृह में बंद रखते हैं; और साथ ही उन कारागृहों की दीवालों के पीछे छिपी हुई स्वतंत्रता, साक्षीभाव, मौन और शांति को अनुभव करने का यह तीव्र, सघन और गहन मार्ग है।
इस ध्यान को सुबह-सुबह करना है, जब "पूरी प्रकृति जीवंत हो उठी है, रात जा चुकी है, सूरज उग आया है, और सब-कुछ चेतन और सजग हो गया है।"
इस ध्यान को आप अकेले कर सकते हैं लेकिन शुरुआत में इसे समूह में करना मददगार हो सकता है।
यह एक व्यक्तिगत अनुभव है, इसलिए अपने आस-पास के अन्य लोगों के प्रति बेखबर बने रहें। ढीले और आरामदेह वस्त्र पहनें।
यह एक घंटे का ध्यान है और इसमें पांच चरण हैं। पूरे समय अपनी आंखें बंद रखें। यदि आवश्यक हो तो आंखों पर पट्टी का उपयोग कर सकते हैं।
यह एक ऐसा ध्यान है जिसमें आपको सतत जागरूक, सचेत और होशपूर्ण रहना है, चाहे आप जो भी करें। साक्षी बने रहें। और जब--चौथे चरण में आप पूर्णतः निष्क्रिय हो जाएं, जैसे जम गए हों, तब यह जागरूकता अपने चरम शिखर पर पहुंचेगी।
प्रथम चरण : 10 मिनट
नाक से अराजक श्वास लें और ज़ोर हमेशा श्वास बाहर फेंकने पर हो। शरीर स्वयं श्वास भीतर लेने की चिंता ले लेगा। श्वास फेफड़ों तक गहरी जानी चाहिये। श्वास जितनी शीघ्रता से ले सकें, लें और ध्यान रहे कि श्वास गहरी रहे। इसे यथाशक्ति अपनी अधिकतम समग्रता से करें - और फिर थोड़ी और शक्ति लगायें, जब तक कि आप वस्तुत: श्वास ही न हो जाएं। ऊर्जा को ऊपर ले जाने के लिये अपनी स्वाभाविक दैहिक क्रियाओं को प्रयोग में लायें। ऊर्जा को बढ़ता हुआ अनुभव करें परंतु पहले चरण में अपने को ढीला मत छोड़ें।
दूसरा चरण : 10 मिनट
विस्फोट हो जाएं! उस सब को अभिव्यक्त करें जो बाहर फेंकने जैसा है। पूर्णतया पागल हो जायें। चीखें, चिल्लाएं, रोएं, कूदें, शरीर हिलायें-डुलायें, नाचें, गाएं, हंसें; स्वयं को खुला छोड़ दें। कुछ भी न बचाएं; अपने पूरे शरीर को प्रवाहमान होने दें। कई बार थोड़ा सा अभिनय भी आपको खुलने में सहायता देता है। जो भी हो रहा है उसमें मन को हस्तक्षेप करने की अनुमति न दें। समग्र हो रहें, पूरे प्राण लगा दें, जान लगा दें।
तीसरा चरण: 10 मिनट
पूरा समय अपने बाजू ऊपर उठा कर रखें और जितनी गहराई से संभव हो "हू! हू! हू!" की ध्वनि करते हुए ऊपर नीचे कूदें । प्रत्येक बार जब आपके पांव धरती पर आयें तो पूरे पांव के तलवे को धरती को छूने दें, ताकि ध्वनि आपके काम-केंद्र पर गहराई से चोट कर सके। आप अपना सर्वस्व लगा दें, कुछ भी पीछे बचायें नहीं।
चौथा चरण: 15 मिनट
रुक जायें! जहाँ भी, जिस स्थिति में भी स्वयं को पायें, उसी में स्थिर हो रहें। शरीर को किसी तरह से भी संभालें नहीं। खांसी अथवा कोई भी क्रिया - कुछ भी, आपकी ऊर्जा की गति में बिखराव ले आयेगा और आपका अब तक का पूर्ण प्रयास व्यर्थ चला जायेगा। जो भी आपके साथ घट रहा है उसके प्रति साक्षी रहें।
पांचवां चरण: 15 मिनट
अस्तित्व के प्रति अपना अनुग्रह प्रगट करते हुए नृत्य करें, उत्सव मनायें। इस अनुभव को दिन भर की अपनी चर्या में फैलने दें।
ध्यान दें:
आप जिस जगह ध्यान कर रहे हैं, वहां यदि आवाज करना संभव न हो, तो यह मौन विकल्प प्रयोग में ला सकते हैं: दूसरे चरण में आवाजें निकालने की अपेक्षा रेचन को अपनी शारीरिक गतियों से होने दें। तीसरे चरण में ‘हू’ ध्वनि की चोट मौन रूप से भीतर ही भीतर की जा सकती है। पांचवां चरण अभिव्यक्तिपूर्ण नृत्य बन सकता है।
ओशो इस ध्यान के बारे में समझाते हैं:
"साक्षी बनें रहें। भटक मत जायें। खो जाना आसान है। जब आप तीव्र श्वास ले रहे हैं तो संभव है आप भूल जायें - श्वास के साथ इतना तादात्मय कर लें कि साक्षी होना भूल जायें। तब आप चूक गये। लेकिन फिर आप मुख्य बिंदु से चूक गए। तीव्र से तीव्र श्वास लें, गहरे से गहरा; अपने पूरे प्राण लगा दें, लेकिन साक्षी भी बने रहें। जो भी घट रहा है उसे ऐसे देखें जैसे आप मात्र दर्शक हैं, जैसे यह सब किसी और को घट रहा हो, जैसे यह सब शरीर में घट रहा हो और चेतना सिर्फ केंद्रित हो कर देख रही है। साक्षी को तीनों चरणों तक लेकर जाना है और जब सब रुक जाता है और चौथे चरण में आप पूर्णतः शिथिल हो जाते हैं, थम जाते हैं और आपकी सजगता अपने चरम शिखर को छू लेती है।”
"इसमें समय लगता है - कम से कम तीन हफ्ते चाहियें इसके एहसास के लिए, और तीन माह एक अलग दुनिया में जाने के लिए। लेकिन वह भी तय नहीं है। हर व्यक्ति के लिए भिन्न होता है। अगर आपकी तीव्रता बहुत सघन है तो यह तीन दिन में भी हो सकता है।"
यह ध्यान शरीर और मन के भीतर पुराने गहरे हुए ढाँचे को तोड़ने के लिए है जो व्यक्ति को अतीत के कारागृह में बंद रखते हैं; और साथ ही उन कारागृहों की दीवालों के पीछे छिपी हुई स्वतंत्रता, साक्षीभाव, मौन और शांति को अनुभव करने का यह तीव्र, सघन और गहन मार्ग है।
इस ध्यान को सुबह-सुबह करना है, जब "पूरी प्रकृति जीवंत हो उठी है, रात जा चुकी है, सूरज उग आया है, और सब-कुछ चेतन और सजग हो गया है।"
इस ध्यान को आप अकेले कर सकते हैं लेकिन शुरुआत में इसे समूह में करना मददगार हो सकता है।
यह एक व्यक्तिगत अनुभव है, इसलिए अपने आस-पास के अन्य लोगों के प्रति बेखबर बने रहें। ढीले और आरामदेह वस्त्र पहनें।
यह एक घंटे का ध्यान है और इसमें पांच चरण हैं। पूरे समय अपनी आंखें बंद रखें। यदि आवश्यक हो तो आंखों पर पट्टी का उपयोग कर सकते हैं।
यह एक ऐसा ध्यान है जिसमें आपको सतत जागरूक, सचेत और होशपूर्ण रहना है, चाहे आप जो भी करें। साक्षी बने रहें। और जब--चौथे चरण में आप पूर्णतः निष्क्रिय हो जाएं, जैसे जम गए हों, तब यह जागरूकता अपने चरम शिखर पर पहुंचेगी।
प्रथम चरण : 10 मिनट
नाक से अराजक श्वास लें और ज़ोर हमेशा श्वास बाहर फेंकने पर हो। शरीर स्वयं श्वास भीतर लेने की चिंता ले लेगा। श्वास फेफड़ों तक गहरी जानी चाहिये। श्वास जितनी शीघ्रता से ले सकें, लें और ध्यान रहे कि श्वास गहरी रहे। इसे यथाशक्ति अपनी अधिकतम समग्रता से करें - और फिर थोड़ी और शक्ति लगायें, जब तक कि आप वस्तुत: श्वास ही न हो जाएं। ऊर्जा को ऊपर ले जाने के लिये अपनी स्वाभाविक दैहिक क्रियाओं को प्रयोग में लायें। ऊर्जा को बढ़ता हुआ अनुभव करें परंतु पहले चरण में अपने को ढीला मत छोड़ें।
दूसरा चरण : 10 मिनट
विस्फोट हो जाएं! उस सब को अभिव्यक्त करें जो बाहर फेंकने जैसा है। पूर्णतया पागल हो जायें। चीखें, चिल्लाएं, रोएं, कूदें, शरीर हिलायें-डुलायें, नाचें, गाएं, हंसें; स्वयं को खुला छोड़ दें। कुछ भी न बचाएं; अपने पूरे शरीर को प्रवाहमान होने दें। कई बार थोड़ा सा अभिनय भी आपको खुलने में सहायता देता है। जो भी हो रहा है उसमें मन को हस्तक्षेप करने की अनुमति न दें। समग्र हो रहें, पूरे प्राण लगा दें, जान लगा दें।
तीसरा चरण: 10 मिनट
पूरा समय अपने बाजू ऊपर उठा कर रखें और जितनी गहराई से संभव हो "हू! हू! हू!" की ध्वनि करते हुए ऊपर नीचे कूदें । प्रत्येक बार जब आपके पांव धरती पर आयें तो पूरे पांव के तलवे को धरती को छूने दें, ताकि ध्वनि आपके काम-केंद्र पर गहराई से चोट कर सके। आप अपना सर्वस्व लगा दें, कुछ भी पीछे बचायें नहीं।
चौथा चरण: 15 मिनट
रुक जायें! जहाँ भी, जिस स्थिति में भी स्वयं को पायें, उसी में स्थिर हो रहें। शरीर को किसी तरह से भी संभालें नहीं। खांसी अथवा कोई भी क्रिया - कुछ भी, आपकी ऊर्जा की गति में बिखराव ले आयेगा और आपका अब तक का पूर्ण प्रयास व्यर्थ चला जायेगा। जो भी आपके साथ घट रहा है उसके प्रति साक्षी रहें।
पांचवां चरण: 15 मिनट
अस्तित्व के प्रति अपना अनुग्रह प्रगट करते हुए नृत्य करें, उत्सव मनायें। इस अनुभव को दिन भर की अपनी चर्या में फैलने दें।
ध्यान दें:
आप जिस जगह ध्यान कर रहे हैं, वहां यदि आवाज करना संभव न हो, तो यह मौन विकल्प प्रयोग में ला सकते हैं: दूसरे चरण में आवाजें निकालने की अपेक्षा रेचन को अपनी शारीरिक गतियों से होने दें। तीसरे चरण में ‘हू’ ध्वनि की चोट मौन रूप से भीतर ही भीतर की जा सकती है। पांचवां चरण अभिव्यक्तिपूर्ण नृत्य बन सकता है।
ओशो इस ध्यान के बारे में समझाते हैं:
"साक्षी बनें रहें। भटक मत जायें। खो जाना आसान है। जब आप तीव्र श्वास ले रहे हैं तो संभव है आप भूल जायें - श्वास के साथ इतना तादात्मय कर लें कि साक्षी होना भूल जायें। तब आप चूक गये। लेकिन फिर आप मुख्य बिंदु से चूक गए। तीव्र से तीव्र श्वास लें, गहरे से गहरा; अपने पूरे प्राण लगा दें, लेकिन साक्षी भी बने रहें। जो भी घट रहा है उसे ऐसे देखें जैसे आप मात्र दर्शक हैं, जैसे यह सब किसी और को घट रहा हो, जैसे यह सब शरीर में घट रहा हो और चेतना सिर्फ केंद्रित हो कर देख रही है। साक्षी को तीनों चरणों तक लेकर जाना है और जब सब रुक जाता है और चौथे चरण में आप पूर्णतः शिथिल हो जाते हैं, थम जाते हैं और आपकी सजगता अपने चरम शिखर को छू लेती है।”
"इसमें समय लगता है - कम से कम तीन हफ्ते चाहियें इसके एहसास के लिए, और तीन माह एक अलग दुनिया में जाने के लिए। लेकिन वह भी तय नहीं है। हर व्यक्ति के लिए भिन्न होता है। अगर आपकी तीव्रता बहुत सघन है तो यह तीन दिन में भी हो सकता है।"
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