ओशो : जीवन जब शून्य हो जाता, तभी कृत्य शून्य होता है।

जीवन जब शून्य हो जाता, तभी कृत्य शून्य होता है।

कृत्य तो जारी रहेगा; जीवन का अनिवार्य अंग है। जीवन जब शून्य हो जाता, तभी कृत्य शून्य होता है। और जब कुछ करोगे तो कुछ विचार भी चलते रहेंगे। अब संन्यासी बैठा है, उसे भूख लगी है तो विचार न उठेगा कि भूख लगी? महावीर को भी उठता होगा कि भूख लगी, नहीं तो भिक्षा मांगने क्यों जाते? विचार तो स्वाभाविक है, उठेगा कि अब भूख लगी। रास्ते पर अंगारा पड़ा हो तो महावीर भी हों तो बच कर निकलेंगे, उनको भी तो विचार उठेगा कि अंगारा पड़ा है, इस पर पैर न रखूं पैर जल जाएगा। तुम पत्थर महावीर की तरफ फेंकोगे तो उनकी आंख भी झप जाएगी। इतना तो विचार होगा न, इतनी तो तरंग होगी न, कि पत्थर आ रहा है, आंख फूटी जाती है, आंख झपा लो!

विचार तो उठता रहेगा, क्योंकि विचार भी जीवन का अनुषंग है। जब तक श्वास चलती है, तब तक विचार भी उठता रहेगा। इसका क्या अर्थ हुआ? क्या इसका अर्थ हुआ कि आदमी के शांत होने का कोई उपाय नहीं? नहीं, उपाय है। उसी उपाय की तरफ इंगित करने के लिए अष्टावक्र कहते हैं कि पहले यह समझ लो कि कौन—कौन से उपाय काम नहीं आएंगे। छोड़ कर भागना काम नहीं आएगा। कर्म से बचना काम नहीं आएगा। विचार से लड़ना काम नहीं आएगा।

कृताकृते च द्वंद्वानि कदा शांतानि कस्य वा।
तू मुझे बता जनक, किसके कब विचार शांत हुए हैं? किसके कब द्वंद्व, दुख शांत हुए?

जीवन है तो द्वंद्व है। दिन को जागोगे, तो रात सोओगे न? द्वंद्व शुरू हो गया, दोहरी प्रक्रियाएं हो गईं। श्रम करोगे तो विश्राम करोगे। सुख होगा तो उसके पीछे दुख आएगा, जैसे दिन के पीछे रात आती है। रात के पीछे फिर दिन चला आ रहा है। हर सुख के पीछे दुख है, हर दुख के पीछे सुख है—श्रृंखला बंधी है। श्वास भीतर लोगे तो फिर बाहर भी तो छोड़ोगे न? नहीं तो फिर भीतर न ले सकोगे। बाहर लोगे श्वास तो भीतर जाएगी, भीतर लोगे तो बाहर जाएगी—द्वंद्व जारी रहेगा।

इस जीवन की सारी गति द्वंद्वात्मक है। दो पैर से आदमी चलता है। सब चलने में दो की जरूरत है। दो पंख से पक्षी उड़ता है। उड़ने में दो की जरूरत है। एक पंख काट दो, पक्षी गिर जाएगा। एक पैर काट दो, आदमी गिर जाएगा।

जीवन द्वंद्व से चलता है। जो निर्द्वंद्व हुआ वह तत्‍क्षण गिर जाएगा। इसलिए तो परमात्मा तुम्हें कहीं दिखाई नहीं पड़ता। जो भी दिखाई पड़ता है, वह द्वंद्व से घिरा होगा। जहां द्वंद्व गया, वहां दृश्य भी गया; वहां व्यक्ति अदृश्य हो जाता है। जीवन तो उसी अदृश्य का दृश्य होना है।

इसलिए अष्टावक्र कहते हैं. किया—अनकिया कर्म, द्वंद्व किसके कब शांत हुए! तो तू इस उलझन में मत पड़ जाना कि इनको शांत करना है।

मेरे पास लोग आते हैं। वे कहते हैं, मन में बड़ा क्रोध है, इसे कैसे शांत करें? मैं उनसे कहता हूं झंझट में मत पड़ो। क्रोध को कौन कब शांत कर पाया है? तुम तो साक्षी— भाव से देखो—जों है सो है—और देखते से ही शांत होना शुरू हो जाता है। लेकिन यह शांति बड़ी और है।

इसका यह अर्थ नहीं है कि तरंगें नहीं उठेंगी; तरंगें उठती रहेंगी, लेकिन तुम तरंगों से दूर हो जाओगे। तरंगें उठती रहेंगी, लेकिन इन तरंगों से तुम्हारा तादात्म्य टूट जाएगा। तुम ऐसा न समझोगे. ये तरंगें मेरी हैं। भूख लगेगी तो तुम ऐसा न समझोगे : मुझे भूख लगी; तुम समझोगे. शरीर को भूख लगी। पैर में कांटा चुभेगा तो तुम समझोगे : शरीर को पीड़ा हुई। विचार तो उठेगा—तुम में भी उठता है, महावीर में भी उठता है। तुममें उठता है : अरे, मुझे पीड़ा हुई! महावीर को उठता है : अरे, शरीर को कांटा गड़ा! जब तुम मरोगे तो तुम्हें विचार उठता है. मैं मरा! जब रमण मरते हैं, तो उन्हें विचार उठता है यह शरीर के दिन पूरे हुए। मृत्यु तो होगी ही। वह तो जन्म के साथ ही बंधा है द्वंद्व।

प्रत्येक के भीतर एक ऐसी जगह है जहां कोई तरंग नहीं पहुंचती; वही तुम्हारा केंद्र है; वही तुम्हारा स्वरूप है। उस गहराई में ही तुम्हारा वास्तविक 'होना' है।

ज्ञान मुफ्त नहीं मिलता और उधार भी नहीं मिलता—जीवन के कड़वे—मीठे अनुभव से मिलता है; जीवन जी कर मिलता है; जीवन को जीने में जो पीड़ा है, तप है, उस सबको झेल कर मिलता है। 'ऐसा निश्चित जान कर आदमी इस संसार में उदासीन हो जाता है। '
'उदासीन' शब्द बड़ा प्यारा है। आसीन का मतलब तो तुम समझते ही हो. बैठ जाना; आसन। उदासीन का अर्थ है अपने में बैठ जाना, अपनी गहराई में बैठ जाना; ऐसे सरक जाना अपने भीतर कि जहां बाहर की कोई तरंग न पहुंचती हो।

ओशो
अष्‍टावक्र महागीता--(प्रवचन--27)
वासना संसार है, बोध मुक्‍ति है—प्रवचन—बारहवां
दिनांक: 7 अक्‍टूबर, 1976;
श्री रजनीश आश्रम, पूना।

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