ओशो : माया:एक विस्तीर्ण स्वप्न है।

माया:एक विस्तीर्ण स्वप्न है।

जीवन के यथार्थ को समझने में बड़ी सरलता हो सकती थी यदि दो ही रूप होते अस्तित्व के--सत् और असत्। हम कह सकते किसी चीज को कि है, और कह सकते कि नहीं है, ऐसे दो स्पष्ट विभाजन होते जीवन के, अस्तित्व के, तो कठिनाई जरा भी नहीं थी। लेकिन एक और कोटि भी है अस्तित्व की, जिसे हम कह नहीं सकते कि है, और यह भी नहीं कह सकते कि नहीं है, उससे ही सारा उलझाव पैदा होता है।

इसलिए भारत ने एक नये शब्द का आविष्कार किया, वह है : 'माया।'
माया न तो सत् है, न असत्; माया दोनों के मध्य में है। वह एक अर्थ में नहीं है और एक अर्थ में है।

माया उसे नाम दिया है इसीलिए, क्योंकि माया का अर्थ वस्तुत: होता है : जैसे एक जादूगर एक वृक्ष को बड़ा करता है। आंखों के सामने, हजारों आंखों  के सामने वृक्ष बड़ा होने लगता है। हजारों आंखों  के सामने क्षण भर में ही उसमें फल लगने लगते हैं, फल बड़े हो जाते हैं। जो देख रहे हैं वे सभी जानते हैं यह हो नहीं सकता; यह है नहीं। और फिर भी दिखाई तो पड़ता है!

माया का मौलिक अर्थ है : भ्रांति की कला। माया का मौलिक अर्थ है : जादू मैजिक। उसका अर्थ है कि जो नहीं है वह भी दिखाई पड़ सकता है, इसकी संभावना है और इससे उलटी संभावना भी है कि जो है, वह नहीं दिखाई पड़ सकता है, इसकी भी संभावना है। जो है वह छिप सकता है और जो नहीं है वह प्रकट हो सकता है।

तीन स्थितियां हैं--जो नितांत नहीं हैं, जिसकी भ्रांति भी नहीं हो सकती। जो नितांत है, उसकी भी भ्रांति नहीं हो सकती। लेकिन जो एक दृष्टि से है और एक दृष्टि से नहीं है, उसकी भ्रांति हो सकती है। वह तीसरा अस्तित्व का रूप भी है; उस रूप का नाम माया है। यह तो माया का शाब्दिक अर्थ है। इसकी परिधि को हम ठीक से समझ लें तो फिर इसके जीवन में क्या-क्या आयाम खुलते हैं वे हमारे खयाल में आ जाएं।
जो है, वह सदा से है। उसका कोई आदि नहीं है, उसका कोई प्रारंभ नहीं है, और उसका कोई अंत भी नहीं है, क्योंकि वह सदा रहेगा। जो नहीं है, नितांत नहीं है, उसका भी कोई आदि नहीं; क्योंकि जो है ही नहीं उसका प्रारंभ कैसे होगा! और उसका कोई अंत भी नहीं होगा; क्योंकि जो है ही नहीं उसकी समाप्ति क्या होगी! माया का प्रारंभ नहीं है, अंत है। यह दोनों के बीच की कोटि है। इसका प्रारंभ नहीं है, यह सदा से है; लेकिन इसका अंत है। इसे हम ऐसा समझें।

अंधेरा है... अंधेरा सदा से है; लेकिन अंधेरे का अंत हो सकता है। प्रकाश जला और अंधेरा नहीं हो जाता है। प्रकाश जलता है और अंधेरा नहीं हो जाता है। अंधेरे का प्रारंभ कोई भी नहीं है.. कि अंधेरा कब प्रारंभ हुआ; वह अनादि है, वह सदा से है; लेकिन उसका अंत होता है--प्रकाश जलता है, उसका अंत हो जाता है।

माया की जो तीसरी श्रेणी है अस्तित्व में, वह सदा से है अंधेरे की तरह। जब व्यक्ति जागता है चैतन्य में, तो उसका अंत हो जाता है; जब प्रकाशित होती है चेतना, तो वह अंधेरा कट जाता है।

यह जो माया है, यह एक विस्तीर्ण स्वप्न है।

ओशो

सर्वसार-उपनिषद--प्रवचन-14
अनादि अंतवती माया—चौदहवां प्रवचन
ध्‍यान योग शिविर
15 जनवरी 1972 प्रात:
माथेरान।

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