ओशो : आनापानसती
आनापानसती: किमती प्रयोग है
आनापानसती जो है, वह जो प्रयोग है, वह बहुत कीमती प्रयोग है। वह श्वांस पर ध्यान देने का प्रयोग है। श्वांस को घटाना - बढ़ाना नही है, श्वांस जैसी चल रही है, उसे देखना है। लेकिन तुम्हारे देखते हीं वह बढ़ जाती है। तुमने देखा, तुम आब्जर्वर हुए कि श्वांस की गति बढ़ी। वह अनिवार्य है उसका बढ़ना। तो उसके बढ़ जाने से परिणाम होंगे। और उसके देखने के भी परिणाम होंगे। लेकिन आनापानसती का मूल लक्ष्य उसको बढ़ाना नहीं है, उसका मूल लक्ष्य तो उसको देखना है। क्योंकि जब तुम अपनी श्वांस को देख पाते हो, धिरे - धिरे, निरंतर - निरंतर देखने से श्वांस तुमसे अलग होती जाती है। क्योंकि जिस चीज़ को भी तुम दृश्य बना लेते हो, तुम गहरे मे उससे भिन्न हो जाते हो।
असल में, दृश्य से द्रष्टा एक हो हीं नहीं सकता, उससे वह तत्काल भिन्न होने लगता है। तो श्वांस को अगर तुमने दृश्य बना लिया, और चौबीस घंटे, चलते, उठते, बैठते, तुम उसको देखने लगे - जा रही, आ रही, तो तुम देखते रहे, देखते रहे, तो तुम्हारा फासला अलग होता जाएगा। एक दिन तुम अचानक पाओगे कि तुम अलग खड़े हो और वह श्वांस चल रही है। बहुत दूर तुमसे उसका आना - जाना हो रहा है। तो इससे वह घटना घट जाएगी, तुम्हारे शरीर से पृथक होने का अनुभव उससे हो जाएगा।
इसलिए किसी भी चीज को..... अगर तुम शरीर की गतियों को देखने लगे - रास्ते पर चलते वक्त खयाल रखो कि बायां पैर उठा, दांया पैर उठा। बस तुम अपना पैर हीं देखते रहो पंद्रह दिन, तुम अचानक पाओगे कि तुम पैर से अलग हो गये, अब तुम्हें पैर अलग से उठते हुए मालुम पड़ने लगेंगे और तुम बिल्कुल देखने वाले रह जाओगे
इसलिए ऐसा आदमी कह सकता है कि चलता हुआ चलता नहीं, बोलता हुआ बोलता नहीं, सोता हुआ सोता नहीं, खाता हुआ खाता नही, ऐसा आदमी कह सकता है। उसका दावा गलत नही है, मगर उसका दावा समझना मुश्किल है। अगर वह खाने में साक्षी है तो वह खाते हुए खाता नही, ऐसा उसे पता चलता है, अगर वह चलने में साक्षी है तो वह चलते हुए चलता नहीं, क्योंकि वह उसका साक्षी है....
ओशो
जिन खोजा तिन पाइयां
आनापानसती जो है, वह जो प्रयोग है, वह बहुत कीमती प्रयोग है। वह श्वांस पर ध्यान देने का प्रयोग है। श्वांस को घटाना - बढ़ाना नही है, श्वांस जैसी चल रही है, उसे देखना है। लेकिन तुम्हारे देखते हीं वह बढ़ जाती है। तुमने देखा, तुम आब्जर्वर हुए कि श्वांस की गति बढ़ी। वह अनिवार्य है उसका बढ़ना। तो उसके बढ़ जाने से परिणाम होंगे। और उसके देखने के भी परिणाम होंगे। लेकिन आनापानसती का मूल लक्ष्य उसको बढ़ाना नहीं है, उसका मूल लक्ष्य तो उसको देखना है। क्योंकि जब तुम अपनी श्वांस को देख पाते हो, धिरे - धिरे, निरंतर - निरंतर देखने से श्वांस तुमसे अलग होती जाती है। क्योंकि जिस चीज़ को भी तुम दृश्य बना लेते हो, तुम गहरे मे उससे भिन्न हो जाते हो।
असल में, दृश्य से द्रष्टा एक हो हीं नहीं सकता, उससे वह तत्काल भिन्न होने लगता है। तो श्वांस को अगर तुमने दृश्य बना लिया, और चौबीस घंटे, चलते, उठते, बैठते, तुम उसको देखने लगे - जा रही, आ रही, तो तुम देखते रहे, देखते रहे, तो तुम्हारा फासला अलग होता जाएगा। एक दिन तुम अचानक पाओगे कि तुम अलग खड़े हो और वह श्वांस चल रही है। बहुत दूर तुमसे उसका आना - जाना हो रहा है। तो इससे वह घटना घट जाएगी, तुम्हारे शरीर से पृथक होने का अनुभव उससे हो जाएगा।
इसलिए किसी भी चीज को..... अगर तुम शरीर की गतियों को देखने लगे - रास्ते पर चलते वक्त खयाल रखो कि बायां पैर उठा, दांया पैर उठा। बस तुम अपना पैर हीं देखते रहो पंद्रह दिन, तुम अचानक पाओगे कि तुम पैर से अलग हो गये, अब तुम्हें पैर अलग से उठते हुए मालुम पड़ने लगेंगे और तुम बिल्कुल देखने वाले रह जाओगे
इसलिए ऐसा आदमी कह सकता है कि चलता हुआ चलता नहीं, बोलता हुआ बोलता नहीं, सोता हुआ सोता नहीं, खाता हुआ खाता नही, ऐसा आदमी कह सकता है। उसका दावा गलत नही है, मगर उसका दावा समझना मुश्किल है। अगर वह खाने में साक्षी है तो वह खाते हुए खाता नही, ऐसा उसे पता चलता है, अगर वह चलने में साक्षी है तो वह चलते हुए चलता नहीं, क्योंकि वह उसका साक्षी है....
ओशो
जिन खोजा तिन पाइयां
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