ओशो : स्वयं का स्वीकार

जब तक स्वयं का स्वीकार न हो, कि मैं जैसा भी हूँ , जो भी मेरा होना है, उसका पूर्ण स्वीकार , तब ही कोई स्वयं को प्रेम कर सकता है,

जिसे स्वयं से ही प्रेम नही है , वो किसी को भी प्रेम नही कर सकता, और उसे भी कोई प्रेम न कर सकेगा।

इस दुनिया मे सबसे बड़ा यदि कोई अधार्मिक कृत्य है, तो वो है स्वयं से घृणा, स्वयं से घृणा करने से बड़ा कोई पाप इस धरती पर नही है, और व्यक्ति ये पाप कर रहा है, उसे स्वयं से प्रेम नही है।

लेकिन व्यक्ति गाता फिर रहा है, कि
उसे अपने देश से प्रेम है,
समाज से प्रेम है,
मानवता से प्रेम है,

ये सब घोषणाएँ खोखली है, थोथी है, कोई मूल्य नही है इनका, ये कोरी , झूठी बकवास है, जब स्वयं से ही प्रेम नही है, तो किसी से भी प्रेम हो ही नही सकता।

जो अस्तित्व से यानि परमात्मा से लगातार शिकायत कर रहा है, कि उसे जो मिला है, वह कम है, उससे क़तई संतुष्ट नहीं है, धर्मस्थलों मे जा रहा है,
किसी अहोभाव के कारण नही, परमात्मा को धन्यवाद देने के लिए नही,

अपितु माँगने के लिए, प्रार्थना मे मांग है, अहोभाव नही, कोई धन्यवाद का भाव नही, कि तुने जो दिया है, वह मेरी पात्रता से कहीं अधिक है, बस परमात्मा से सदैव मांग , और मिल जाये , और मिल जाये की रटन,

ये कौन कर रहा है, जो भी ऐसा कर रहा है, उसे स्वयं का स्वीकार नही है, वह स्वयं को स्वीकार नही कर रहा है, और जो स्वयं को स्वीकार नही कर रहा है, वह स्वयं को प्रेम  कैसे कर सकता है।

स्वयं से प्रेम यानि अस्तित्व से प्रेम , यानि समग्र से प्रेम , यानि परमात्मा से प्रेम

ओशो


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