ओशो : साक्षी
साक्षी
साक्षी का प्रयोग शुरु करना होता है शरीर को चलते हुए, बैठे हुए, बिस्तर पर जाते हुए, या खाते हुए देखने से!
स्थूलतम चीजों से व्यक्ति को शुरु करना चाहिए, क्योंकि यह सरल है। और फिर उसे सूक्ष्म अनुभवों की ओर जाना चाहिए -- विचारों को देखना शुरु करना चाहिए।
और जब व्यक्ति विचारों को देखने में कुशल हो जाता है, तो उसे अनुभूतियों को देखना शुरु करना चाहिए। जब तुम्हें लगे कि तुम अपनी अनुभूतियों को भी देख सकते हो, तो फिर अपनी भाव-दशाओं को देखना शुरु करो, जो कि अनुभूतियों से अधिक सूक्ष्म भी हैं, और स्पष्ट भी।
द्रष्टा होने का चमत्कार यह है कि जब तुम शरीर को देखते हो, तो तुम्हारा द्रष्टा अधिक मजबूत होता है। जब तुम अपने विचारों को देखते हो, तो तुम्हारा द्रष्टा और भी मजबूत होता है। और जब अनुभूतियों को देखते हो, तो तुम्हारा द्रष्टा फिर और मजबूत होता है। जब तुम अपनी भाव-दशाओं को देखते हो, तो द्रष्टा इतना मजबूत हो जाता है कि स्वयं बना रह सकता है -- स्वयं को देखता हुआ, जैसे कि अंधेरी रात में जलता हुआ एक दीया न केवल अपने आस-पास प्रकाश करता है, बल्कि स्वयं को भी प्रकाशित करता है!
लेकिन लोग बस दूसरों को देख रहे हैं, वे कभी स्वयं को देखने की चिंता नहीं लेते। हर कोई देख रहा है -- यह सबसे उथले तल पर देखना है -- कि दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है, दूसरा व्यक्ति क्या पहन रहा है, वह कैसा लगता है। हर व्यक्ति देख रहा है -- देखने की प्रक्रिया कोई ऐसी नई बात नहीं है, जिसे तुम्हारे जीवन में प्रवेश देना है। उसे बस गहराना है -- दूसरों से हटाकर स्वयं की आंतरिक अनुभूतियों, विचारों और भाव-दशाओं की ओर करना है -- और अंततः स्वयं द्रष्टा की ओर ही इंगित कर देना है।
लोगों की हास्यास्पद बातों पर तुम आसानी से हंस सकते हो, लेकिन कभी तुम स्वयं पर भी हंसे हो? कभी तुमने स्वयं को कुछ हास्यास्पद करते हुए पकड़ा है? नहीं, स्वयं को तुम बिलकुल अनदेखा रखते हो -- तुम्हारा सारा देखना दूसरों के विषय में ही है, और उसका कोई लाभ नहीं है।
अवलोकन की इस ऊर्जा का उपयोग अपने अंतस के रूपांतरण के लिए कर लो। यह इतना आनंद दे सकती है, इतने आशीष बरसा सकती है कि तुम स्वप्न में भी नहीं सोच सकते। सरल सी प्रक्रिया है, लेकिन एक बार तुम इसका उपयोग स्वयं पर करने लगो, तो यह एक ध्यान बन जाता है।
किसी भी चीज को ध्यान बनाया जा सकता है!
अवलोकन तो तुम सभी जानते हो, इसलिए उसे सीखने का कोई प्रश्न नहीं है, केवल देखने के विषय को बदलने का प्रश्न है। उसे करीब पर ले आओ। अपने शरीर को देखो, और तुम चकित होओगे।
अपना हाथ मैं बिना द्रष्टा हुए भी हिला सकता हूं, और द्रष्टा होकर भी हिला सकता हूं। तुम्हें भेद नहीं दिखाई पड़ेगा, लेकिन मैं भेद को देख सकता हूं। जब मैं हाथ को द्रष्टा-भाव के साथ हिलाता हूं, तो उसमें एक प्रसाद और सौंदर्य होता है, एक शांति और एक मौन होता है।
तुम हर कदम को देखते हुए चल सकते हो, उसमें तुम्हें वे सब लाभ तो मिलेंगे ही जो चलना तुम्हें एक व्यायाम के रूप में दे सकता है, साथ ही इससे तुम्हें एक बड़े सरल ध्यान का लाभ भी मिलेगा।
- ओशो ,
ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति
साक्षी का प्रयोग शुरु करना होता है शरीर को चलते हुए, बैठे हुए, बिस्तर पर जाते हुए, या खाते हुए देखने से!
स्थूलतम चीजों से व्यक्ति को शुरु करना चाहिए, क्योंकि यह सरल है। और फिर उसे सूक्ष्म अनुभवों की ओर जाना चाहिए -- विचारों को देखना शुरु करना चाहिए।
और जब व्यक्ति विचारों को देखने में कुशल हो जाता है, तो उसे अनुभूतियों को देखना शुरु करना चाहिए। जब तुम्हें लगे कि तुम अपनी अनुभूतियों को भी देख सकते हो, तो फिर अपनी भाव-दशाओं को देखना शुरु करो, जो कि अनुभूतियों से अधिक सूक्ष्म भी हैं, और स्पष्ट भी।
द्रष्टा होने का चमत्कार यह है कि जब तुम शरीर को देखते हो, तो तुम्हारा द्रष्टा अधिक मजबूत होता है। जब तुम अपने विचारों को देखते हो, तो तुम्हारा द्रष्टा और भी मजबूत होता है। और जब अनुभूतियों को देखते हो, तो तुम्हारा द्रष्टा फिर और मजबूत होता है। जब तुम अपनी भाव-दशाओं को देखते हो, तो द्रष्टा इतना मजबूत हो जाता है कि स्वयं बना रह सकता है -- स्वयं को देखता हुआ, जैसे कि अंधेरी रात में जलता हुआ एक दीया न केवल अपने आस-पास प्रकाश करता है, बल्कि स्वयं को भी प्रकाशित करता है!
लेकिन लोग बस दूसरों को देख रहे हैं, वे कभी स्वयं को देखने की चिंता नहीं लेते। हर कोई देख रहा है -- यह सबसे उथले तल पर देखना है -- कि दूसरा व्यक्ति क्या कर रहा है, दूसरा व्यक्ति क्या पहन रहा है, वह कैसा लगता है। हर व्यक्ति देख रहा है -- देखने की प्रक्रिया कोई ऐसी नई बात नहीं है, जिसे तुम्हारे जीवन में प्रवेश देना है। उसे बस गहराना है -- दूसरों से हटाकर स्वयं की आंतरिक अनुभूतियों, विचारों और भाव-दशाओं की ओर करना है -- और अंततः स्वयं द्रष्टा की ओर ही इंगित कर देना है।
लोगों की हास्यास्पद बातों पर तुम आसानी से हंस सकते हो, लेकिन कभी तुम स्वयं पर भी हंसे हो? कभी तुमने स्वयं को कुछ हास्यास्पद करते हुए पकड़ा है? नहीं, स्वयं को तुम बिलकुल अनदेखा रखते हो -- तुम्हारा सारा देखना दूसरों के विषय में ही है, और उसका कोई लाभ नहीं है।
अवलोकन की इस ऊर्जा का उपयोग अपने अंतस के रूपांतरण के लिए कर लो। यह इतना आनंद दे सकती है, इतने आशीष बरसा सकती है कि तुम स्वप्न में भी नहीं सोच सकते। सरल सी प्रक्रिया है, लेकिन एक बार तुम इसका उपयोग स्वयं पर करने लगो, तो यह एक ध्यान बन जाता है।
किसी भी चीज को ध्यान बनाया जा सकता है!
अवलोकन तो तुम सभी जानते हो, इसलिए उसे सीखने का कोई प्रश्न नहीं है, केवल देखने के विषय को बदलने का प्रश्न है। उसे करीब पर ले आओ। अपने शरीर को देखो, और तुम चकित होओगे।
अपना हाथ मैं बिना द्रष्टा हुए भी हिला सकता हूं, और द्रष्टा होकर भी हिला सकता हूं। तुम्हें भेद नहीं दिखाई पड़ेगा, लेकिन मैं भेद को देख सकता हूं। जब मैं हाथ को द्रष्टा-भाव के साथ हिलाता हूं, तो उसमें एक प्रसाद और सौंदर्य होता है, एक शांति और एक मौन होता है।
तुम हर कदम को देखते हुए चल सकते हो, उसमें तुम्हें वे सब लाभ तो मिलेंगे ही जो चलना तुम्हें एक व्यायाम के रूप में दे सकता है, साथ ही इससे तुम्हें एक बड़े सरल ध्यान का लाभ भी मिलेगा।
- ओशो ,
ध्यानयोग: प्रथम और अंतिम मुक्ति
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