ओशो : अहोभाव

अहोभाव

अहोभाव की इस दशा को
थिर रखना , इससे बड़ी कोइ
प्रार्थना नही है !
अहोभाव से बड़ा कोई सेतु
नही है परमात्मा से जोड़ने
वाला ! जो कृतज्ञ है वह
धन्यभागी है ! और जितने तुम
कृतज्ञ होते चले जाओगे
उतनी ही वर्षा सघन होगी
अमृत की ! इस गणित को
ठीक से हृदय मे सम्हाल
कर रख लेना
जितना धन्यवाद दें
सकोगे उतना पाओगे !
शिकायत भूलकर ना करना !
और ऐसा नही है की
शिकायत करने के अवसर
न आयेंगे ! मन की
अपेक्षाये बड़ी है ,
तो हर पल हर क़दम
पर शिकायतें उठती आती है ;
ऐसा होना था , नही हुआ !
जब भी ऐसा लगे ऐसा
होना था नही हुआ ,
तभी स्मरण करना की
भूल होती है क्योंकि
शिकायत अवरोध बन जाती है !
शिकायत का अर्थ हुआ तुम
परमात्मा पर अपनी आकांक्षा
आरोपित करना चाहते हो !
और ऐसा मत सोचना
शिकायत तुमसे न होगी ,
जीसस जैसे परम पुरुष
से भी शिकायत हो गयी थी !
आखिरी घड़ी मे सूली मे
लटके हुए एक क्षण को
निकल गयी थी पुकार ,
आकाश की तरफ़ सिर
उठाकर जीसस ने कहा था :
हे प्रभू , यह तू क्या दिखला रहा है ?
सोचा नही होगा की सूली लगेगी !
सोचा नही होगा की
परमात्मा इस तरह से
असहाय छोड़ देगा !
पर तत्क्षण अपनी
गलती पहचान गये ,
फ़िर आँखे झुका ली
और क्षमा माँगी और कहा :
तेरी मर्जी पूरी हो !
तू कर रहा है तो
ठीक कर रहा होगा !
अहोभाव को बनाये रखना !
उसकी तरफ़ से थोड़ा
भी प्रकाश मिले ,
नाचना , मस्त होना !
ऊर्जा उठे धन्यवाद
मे बह जाना ! और
उठेगी ऊर्जा !
और फूल खिलेंगे !
जितना तुम्हारा धन्यवाद
का भाव बढेगा ,
उतने ही फूलों
पर फूल खिलेंगे !

ओशो
जीवन - संगीत - 4

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