ओशो : ध्यान

ध्यान

                     
ध्यान हो तो धन भी सुंदर है । ध्यानी के पास धन होगा , तो जगत का हित ही होगा , कल्याण ही होगा । क्योंकि धन ऊर्जा है । धन शक्ति है । धन बहुत कुछ कर सकता है । मैं कहता हूं -- जियो धन में , लेकिन ध्यान का विस्मरण न हो । ध्यान भीतर रहे , धन बाहर । फिर कोई चिंता नहीं है । तब तुम कमल जैसे रहोगे , पानी में रहोगे और पानी तुम्हें छुएगा भी नहीं....!
ध्यान रहे -- धन तुम्हारे जीवन का सर्वस्व न बन जाए । तुम धन को ही इकट्ठा करने में न लगे रहो । धन साधन है , साध्य न बन जाए । धन के लिए तुम अपने जीवन के अन्य मूल्य गंवा न बैठो । तब धन में कोई बुराई नहीं है ।
लेकिन धन सब कुछ नहीं है । कुछ और भी  धन हैं ।
 प्रेम का , सत्य का , ईमानदारी का , सरलता का , निर्दोषता का , निर - अहंकारिता का ।

ओशो

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