ओशो : परमात्मा

एक परमात्मा को माननेवाले ने दूसरे परमात्मा की मूर्तियां तोड़ दी हैं। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। सदा से ही ऐसा होता रहा है। मनुष्य ही एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं है, उनके परमात्मा भी हैं। असल में मनुष्य जिन परमात्माओं का सृजन करता है, वे स्वयंं उससे बहुत भिन्न नहीं हो सकते हैं। एक मंदिर दूसरे मंदिर के विरोध में खड़ा है, क्योंकि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के विरोध में है। एक शास्त्र दूसरे शास्त्र का शत्रु है, क्योंकि मनुष्य, मनुष्य का शत्रु है। मनुष्य जैसा होता है, वैसा ही उसका धर्म होता है। मनुष्य मैत्री लाने के बजाए शत्रुता के गढ़ बन गए हैं और जगत को प्रेम से भरने के बजाए उन्होनें बैर-वैमनस्य के विष से भर दिया है।

-ओशो
(मिट्टी के दीये)

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